
126th Kota Dussehra mela : लोकप्रियता ऐसी की विज्ञापन के लिए फ्री में खिलाई थी देसी घी की पूड़ी-सब्जी
कोटा में आधुनिक दशहरा मेला महाराव भीमसिंह द्वितीय (1889 से 1940 ई.) के शासन में शुरू हुआ। तब मेला देश की प्रमुख व्यापारिक गतिविधियों में शामिल रहा। आमजन की सहभागिता बढ़ाने के लिए मेले में सांस्कृतिक गतिविधियों को जोडऩे की बात हुई तो 1951 में पहली बार अखिल भारतीय भजन-कीर्तन प्रतियोगिता के साथ इसका सूत्रपात हुआ। तीन साल बाद अखिल भारतीय कवि सम्मेलन और मुशायरा आ जुड़े। धीरे धीरे कार्यक्रम बढ़ते गये। 1960 में पहली बार फिल्मी कार्यक्रम हुआ।
विज्ञापन के लिए फ्री बांटी थी पूड़ी-सब्जी
मेले की व्यावसायिक लोकप्रियता ऐसी थी कि देश की मशहूर वनस्पति घी निर्माता कंपनी ने अपने उत्पाद् का प्रचार करने के लिए पूरे मेले में फ्री पूड़ी-सब्जी बांटी थी। 1968 में दाऊदयाल जोशी नगर परिषद अध्यक्ष थे। मेला प्रांगण में स्थायी मंच की बात हुई तो स्मारिका का प्रकाशन किया गया। इसके विज्ञापन से हुई आय से श्रीराम रंगमंच बना, जहां आज सभी बड़े कार्यक्रम होते हैं।
27 दिन का मेला, 10 लाख लोगों का रेला
एक अनुमान के मुताबिक 27 दिन चलने वाले इस मेले में 10 लाख से अधिक लोग आते हैं। ऐसे में इसका आर्थिक महत्व भी बहुत ज्यादा है। लोगों को सालभर इसका इंतजार रहता है। बड़े व्यापारियों से लेकर फुटकर दुकानदार तक सालभर मेले में आने की तैयारी करते हैं। आर्थिक जानकारों का दावा है कि यह सालाना आयोजन करीब 100 करोड़ का होता है। राम कथा से शुरू होने वाला मेला रावण दहन के साथ परवान चढ़ता है।
(जैसा कि साहित्यकार अतुल कनक ने संवाददाता विनीत सिंह को बताया)
Published on:
08 Oct 2019 06:05 pm
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