
तरक्की के साइड इफैक्ट : कैमिकल लोचे का शिकार हुआ दिमाग, असल जिंदगी पर भारी पड़ी काल्पनिक दुनिया
विनीत सिंह @ कोटा.
टैक्नोलॉजी एडिक्शन ( Technology Addiction ) का चाबुक पड़ते ही बेलगाम हो रहे दिमागी घोड़े कैमिकल लोचे ( chemical locha ) के दलदल में जा फंसते हैं। डिजिटल गेमिंग ( Digital gaming ) और वीडियोस्ट्रीमिंग ( video streaming ) ने सोए हुए ख्वाबों को ऐसे जगाया कि काल्पनिक दुनिया ( Imaginary Worlds ) ही हकीकत लगती है। सधे हुए फैसले लेने के लिए जिम्मेदार दिमाग का बायां हिस्सा जब तक कोई फैसला करता है, उससे पहले ही बायां हिस्से की जिद और जल्दबाजी हावी हो जाती है। ऊपर से एड्रिनल हार्मोन की बाढ़ आवेश के वेग की बची कमी को पूरा कर वरदान बनकर जिंदगी में दाखिल हुई तकनीकी की तरक्की को अभिशाप में तब्दील कर दे रही है।
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डॉ. शकुंतला मिश्रा नेशनल रिहेबिलेशन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एवं चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट डॉ. रजनी रंजन सिंह बताते हैं कि हमारा दिमाग दो हिस्सों, बायां गोलाद्र्ध और दायां गोलाद्र्ध में बंटा होता है। दोनों हिस्से अपनी दिशा के विपरीत के शारीरिक अंगों को नियंत्रित करते हैं। आमतौर पर दिमाग का बायां गोलाद्र्ध ज्यादा सक्रिय होता है। जबकि दायां गोलाद्र्ध अचानक हुई घटनाओं और आवेश के लिए जिम्मेदार माना जाता है। इसकी प्रतिक्रिया इतनी तेज होती है कि दूसरा हिस्सा समझ ही नहीं पाता कि क्या हुआ।
फैसलों के लिए जिम्मेदार
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डॉ. सिंह बताते हैं कि जब कोई बच्चा लेफ्टी होने की कोशिश करता है तो उसके माता-पिताउसे अव्यावहारिक मान सीधे हाथ से काम कराने की आदत डलवाने लगते हैं, लेकिन कभी किसी ने सोचा है हमारे परंपरागत व्यवहार में यह कब और क्यों शुमार हुआ। तो, जान लीजिए इसकी वजह है सही और गलत का फैसला। दिमाग का बायां हिस्सा हमें हमेशा विकल्प सुझाता है। कोई भी फैसला करने से पहले सोचने के लिए मजबूर करता है, जबकि दायां दिमाग इस कदर डोमिनेटिंग होता है कि जो एक बार ठान लिया उसे पूरा करके ही दम लेते हैं। जिद्दी बनाने के साथ ही आवेश के वेग में बहा ले जाने के लिए यही जिम्मेदार माना जाता है। इसे हम यूं समझ सकते हैं कि जब कोई बच्चा गेमिंग या वीडियो स्ट्रीमिंग के साइबर जाल में उतरता है तो उसके दोनों हाथ की अंगुलियां तेजी से मोबाइल पर तैरती नजर आती हैं। पता ही नहीं चलता कि दिमाग का कब कौन सा हिस्सा कितनी तेजी से विकसित हो रहा है।
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कैमिकल लोचे की बाढ़
प्रो. रजनी रंजन सिंह के मुताबिक 17 साल की उम्र तक तेजी से हो रहे शारीरिक और मानसिक बदलाव के लिए जिम्मेदार तमाम हार्मोन्स बन और बिगड़ रहे होते हैं। मानसिक और शारीरिक ऊर्जा की बाढ़ खपना चाहती है, लेकिन बदलती जीवन शैली में इन दोनों में से किसी को किनारा नहीं मिलता। इसी बीच बड़ों के जैसे अधिकार चाहने की तमन्ना आजादी की चाहत जगाती है, तेजी से पैर पसारती ख्वाबों की दुनिया एडवेंचर की ओर खींचने लगती और मानसिक परिपक्वता की ओर बढ़ते इसी दौर में पैदा होने लगती है हीरोइज्म यानी दूसरों को प्रभावित करने की इच्छा शक्ति। वीडियो और गेमिंग की दुनिया में जैसे ही यह मेंटल एनर्जी खपने लगती है तो दिमाग को खासी राहत मिलती है, लेकिन इसी बीच पैदा हुए एड्रिनल हॉर्मोन्स दिमाग के एवेयरनेस पार्ट को पीछे धकेल एक्साइटमेंट स्वैगशिप को जगाने में लग जाते हैं। धीरे-धीरे गेमिंग एडिक्शन के शिकार होने लगते हैं और एक ऐसी स्टेज आ जाती है कि यह कैमिकल काल्पनिक दुनिया से बाहर निकलने का सैकिंड थॉट भी नहीं आने देता। यही वो क्षण होता है जब वीडियो या गेम बच्चे को पूरी तरह कंट्रोल करने लगते हैं और वह उनमें दिखाए जाने वाले स्टेप्स पर्सनली उठाने लगता है। जिसका अंत मौत के मुहाने पर आकर होता है।
इमोशन थैरेपी ही बचाव का जरिया
डॉ. सिंह बताते हैं कि भारतीय समाज बदलाव के बेहद गंभीर मोड़ से गुजर रहा है। टैक्नोलॉजी की ऐसी बमबार्डिंग हो रही है कि अभिभावक समझ ही नहीं पा रहे कि क्या जरूरी है और क्या बदलना है? वहीं शारीरिक और मानसिक ऊर्जा से लबालब बच्चा कर लो दुनिया मु_ी में वाला फील लेकर एक दूसरे पर हावी होने के लिए लड़ रहे दिमाग के दोनों गोलाद्धों और हार्मोन्स के साथ तकनीकी में संतुष्टि तलाशने लगता है। यह वो समय होता है जब हमें हैंडल विद केयर और हुक का इस्तेमाल न करने वाली चेतावनियों के साथ बच्चे को संभालना होता है, लेकिन इसके उलट लताड़ के साथ ही पिटाई की डोज दे ज्यादातर अभिभावक जिम्मेदारी के झंझट से मुक्ति पा लेते हैं।
अभिभावकों को अब समझना होगा कि बच्चों के जीने का तरीका बदल गया तो उन्हें सुधारने का तरीका भी बदलना होगा। आवेश के वेग को रोकने के लिए सिर्फ इमोशन थैरेपी ही अब तक कारगर साबित हो पाई है। इसलिए बच्चे को आहिस्ते आहिस्ते टैक्नोलॉजी एडिक्शन से बाहर निकालें और किताबों एवं प्रकृति के खुले सान्निध्य में ले जाएं। प्राइवेसी के नाम पर उसे अकेला न छोड़ें। उसके स्कूल और बाकी पेयर ग्रुप पर नजर रखें और उसे उसका दायरा भावनात्मक तरीके से समझाएं। बच्चा जब तक कल्पनाओं की दुनिया से बाहर नहीं निकलेगा उसके दिमाग का सकारात्मक हिस्सा जाग्रत नहीं होगा और एड्रिनल जैसे कैमिकलों का लोचा बंद नहीं हो पाएगा।
Published on:
23 Jun 2019 12:30 pm
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