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World Population Day 2019: कोटा में हर साल बढ़ जाते हैं 93 हजार लोग, 10 साल बाद आबादी होगी 20 लाख पार

kota News, Kota Hindi News, World Population Day 2019: कोटा शहर इंजीनियर और मेडिकल शिक्षा में पूरे देश को नई राह दिखा रहा है, लेकिन तेजी से बढ़ती आबादी के मुकाबले रहने, खाने-पीने और पेट पालने के साधन नहीं बढ़ पा रहे हैं।

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कोटा

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Zuber Khan

Jul 11, 2019

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कोटा. छह दशक पहले बड़े बुजुर्ग दूधो नहाओ, पूतो फलो का आशीर्वाद देती नहीं अघाते थे। यह वह दौर था जब कोटा में महज 65,107 बाशिंदों की ही आबादी मौजूद थे। ( World population day 2019 ) अस्सी के दशक में जब आबादी की रफ्तार ने तेजी पकड़ी तो हम दो, हमारे दो का जुमला चल निकला, लेकिन तब तक खासी देर हो चुकी थी। यानी शहर की जितनी आबादी 1951 में थी, उतने लोग तो अब हर साल बढऩे लगे थे। अब हाल यह है कि 3,62,342 लोग अपनी छत तक के लिए तरस रहे हैं। 12,303 बच्चों को स्नातक ( PG Collage ) तक में प्रवेश नहीं मिल पा रहा है। अस्पताल ( Hospital ) में वेटिंग लिस्ट टंगने लगी और सुरक्षा के लिए तैनात जाप्ता तक आधा पड़ गया है। नतीजतन, तमाम पढ़े-लिखे परिवार अब खानदान का नाम रोशन करने की कल्पना को परे धकेल सिंगल चाइल्ड ( Single child ) की अवधारणा को अपनाने के लिए मजबूर हो गए हैं।

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आज विश्व जनसंख्या दिवस है। ( World Population Day 2019 ) एक ऐसा दिन जब हम तेजी से बढ़ती आबादी से जुड़ी चिंताओं और संभावनाओं को तलाशने की कोशिश करते हैं। कोटा के लिहाज से बात करें तो युवाओं का यह शहर इंजीनियर और मेडिकल शिक्षा (engineering And Medical Education ) में सफलता के झंडे गाड़कर पूरे देश को नई राह दिखा रहा है, लेकिन जिस तेजी से कोटा की आबादी बढ़ रही है, उस रफ्तार से रहने, खाने-पीने, आने जाने और पेट पालने के साधन नहीं बढ़ पा रहे हैं। वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम ( World Economic Forum ) की रिपोर्ट के मुताबिक कोटा के प्रति वर्ग किमी क्षेत्रफल में 12,100 लोग रहते हैं, यानी दुनिया की सातवीं सबसे घनी आबादी वाला शहर बन चुका है हमारा शहर।

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हालात विस्फोटक
छह दशक के आंकड़ों पर नजर डालें तो शहर में हर साल औसतन 93,625 लोग बढ़ जाते हैं, लेकिन छत सिर्फ 1,111 लोगों को ही मुहैया हो पाती है। अच्छी सेहत से लेकर शिक्षा के अधिकार तक की बात की जाए तो अस्पताल में बेड और कॉलेज में सीटें दशकों से नहीं बढ़ सकी है। शहर में अशिक्षितों की संख्या 70,402 का आंकड़ा पार कर चुकी है। रही बात बेरोजगारी की तो 1,32,662 कुशल कामगार पूरी साल खाली बैठे रह जाते हैं। हालांकि इन सबके बीच सुकून की बात यह है कि कोचिंग संस्थानों में रखी जा रही सफलता की नींव पूरे जिले को रोजी रोटी भी मुहैया करा रही है।

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बेहाल खाकी

सुकून की बात यह है कि जिस तेजी से रहने और कमाने के मौके कम हुए हैं उस रफ्तार से जरायम पेशे ने तेजी नहीं पकड़ी है। नहीं तो करीब चार हजार लोगों का पुलिस जाप्ता ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित होता। पुलिस व्यवस्था के मुताबिक कोटा दो जिलों में बंटा है। कोटा सिटी पुलिस में 2466 पुलिसकर्मियों के पद स्वीकृत हैं, लेकिन करीब हजार खाली पड़े हैं, जबकि आबादी के मुताबिक जरूरत 20 हजार के जाप्ते की है। वहीं ग्रामीण पुलिस की बात करें तो स्वीकृत पद 1394 हैं, लेकिन जरूरत करीब 9 हजार पुलिस कर्मियों की है।

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183 चिकित्सा संस्थानों में 6600 बेड
कोटा जिले में कुल 79 निजी और 104 सरकारी चिकित्सा संस्थान हैं। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के अधीन रामपुरा अस्पताल, 20 अरबन डिस्पेंसरी, 13 सामुदायिक व 45 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं। इनकी क्षमता करीब 900 बेड की है। वहीं मेडिकल कॉलेज के तीनों अस्पतालों में करीब 1300 बेड स्वीकृत हैं, लेकिन इन अस्पतालों में इससे कई गुना मरीज भर्ती रहते हैं। दूसरी तरफ 39 निजी अस्पताल 15 बेड से अधिक और 40 में 14 बेड से कम की सुविधा है। इन अस्पतालों में करीब 4400 बेड उपलब्ध हैं। भविष्य की बात तो छोडि़ए आज के लिहाज से भी यह हथेली पर सरसों जमाने जैसा है।

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उच्च शिक्षा हुई बद्तर

दस साल पहले कोटा शहर में पांच राजकीय महाविद्यालय थे। जिनकी संख्या बढ़कर अब आठ हो गई, लेकिन सीट एक भी नहीं बढ़ सकी। हाल ही सम्पन्न हुई प्रवेश प्रक्रिया के आंकड़ों पर गौर करें तो एक सीट के लिए औसतन पांच आवेदन आए और दाखिलों के बाद करीब 28,933 अभ्यार्थी खाली हाथ लौटने को मजबूर हो गए। सबसे ज्यादा मारामारी राजकीय विज्ञान महाविद्यालय में मचती है। यहां मौजूद एक सीट के लिए करीब छह छात्रों के बीच घमासान होता है।

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सुविधाओं के लिए तरसा शहर
आबादी के बोझ तले कोटा शहर का हाल यह है कि अब भी 86 फीसदी इलाका सीवरेज, 34 फीसदी इलाका पेयजल और लगभग पूरा शहर डे्रनेज सिस्टम की कमी से जूझ रहा है। परिवहन विभाग के कागजों में शहर के बाशिंदों को सार्वजनिक परिवहन सेवा मुहैया कराने के लिए 17 रूटों पर 254 सिटी बसें सड़कों पर दौड़ रही हैं, लेकिन आलम यह है कि इन रूटों पर रह रहे लोगों ने करीब 220 बसों की तो कभी शक्ल ही नहीं देखी। प्रदूषण का आलम यह है कि एक दशक पहले चंबल में गिर रहे नालों की संख्या 22 से बढ़कर 46 हो गई है। नान्ता ट्रेंचिंग ग्राउंड ओवर फ्लो होकर 10 किमी के इलाके में कैंसर की सौगात बांट रहा है। बायो मेडिकल वेस्ट उठाने के लिए शहर में पिछले डेढ़ साल से कोई अधिकृत ठेकेदार नहीं है और ई वेस्ट डिस्पोजल प्लांट की बात तो छोडि़ए, यहां अभी तक कलेक्शन सेंटर तक नहीं खुल सका।