
मथुराधीश जी बूंदी होते हुए कोटा आए , महाप्रभुजी गागरोन से पधारे
कोटा. चंबल किनारेे बसे शहर में चंबल की लहरों के साथ धर्म व आध्यात्म की लहरें भी बहती है। कोटा शहर कृष्ण मंदिरों के लिए भी ख्यात है। कोटा रियासत के तत्कालीन शाासक महाराव भीम सिंह प्रथम ने तो कोटा का नाम ही नंदग्राम कर दिया था। शुद्धाद्वैत प्रथम पीठ के श्री मथुराधीश भी यहां विराज मान हैं और महाप्रभु जी व बृजनाथ जी, फूल बिहारी, गोविंद देव,नवनीत प्रियाजी, बृजरायजी, घरुमथुरेश जी, छोटे मथुराधीश, समेत कई नवीन व प्राचीन कृष्ण मंदिर यहां हैं। इन सभी मंदिरों की कहानियां व इतिहास रोचक है। मथुराधीश जी बूंदी होते हुए कोटा आए थे। प्रहाप्रभुजी गागरोन से कोटा आए।
श्रीमद् वल्लभाचार्य के समक्ष प्रकट हुए थे मथुराधीशजी
पाटनपोल नंदग्राम क्षेत्र में मथुराधीशजी विराजमान है। मथुरा जिले के गोकुल के करनावल ग्राम में सूर्यास्त के समय फाल्गुन शुक्ल एकादशी के दिन श्रीमद् वल्लभाचार्यजी के समक्ष मथुराधीशजी प्रकट हुए थे। श्री बड़े मथुरेश टेंपल बोर्ड में मंत्री महेश व्यास बताते हैं कि कोटा में मथुराधीश के प्रति भक्ति का एेसा भाव रहा कि परिस्थिति वश मथुराधीशजी को सन 1937 में मथुराधीशजी को कोटा लाया गया।
इससे पहले लगभग 60 वर्ष मथुराधीश बूंदी में विराजे। तत्कालीन रियासत के मंत्री द्वारकाप्रसाद भटनागर ने पाटनपोल स्थित अपनी हवेली मथुराधीश जी को पधराने के लिए भेंट कर दी, जहां ठाकुरजी को विराजमान किया गया। 1953 में बड़े मथुराधीश जी को एक मनोरथ के लिए बृज ले गए,लेकिन तत्कालीन आचार्य गोस्वामी रणछोड़ाचार्यजी प्रथमेश मथुराधीश जी को 1975 में कोटा ले आए। देशभर से श्रद्धालु दर्शन को यहां आते हैं।
महाप्रभुजी के साथ विराजमान है नवनीत प्रियाजी
पाटन पोल नंद ग्राम क्षेत्र में महाप्रभु जी का बड़ा मंदिर है। मंदिर के गोस्वामी विनय बाबा बताते हैं यह मंदिर करीब 350 वर्ष पुराना है। वल्लभ सम्प्रदाय के आचार्य जगन्नाथ राय ने इसे स्थापित किया। महाराज शत्रुसाल प्रथम के समय का यह मंदिर है। यहां महाप्रभुजी के साथ नवनीत प्रियाजी का विग्रह विराजमान है। गोस्वामी विनय बाबा बताते हैं कि महाप्रभुजी को पहले जतीपुरा मथुरा से लाकर गागरोन में स्थापित किया गया, जहां से कोटा के तत्कालीन नरेश के आग्रह पर नंदग्राम स्थित हवेली में विराजमान किया गया।
मथुराधीश जी की तरह ही महाप्रभुजी के बड़े मंदिर में भी वल्लभ सम्प्रदाय के अनुसार ठाकुरजी की बाल स्वरूप में सेवा होती है। जन्माष्टमी पर पन्द्रह दिन पहले से बधाई गायन शुरू हो जाता है। जन्माष्टमी पर जन्म के दर्शन के बाद दूसरे दिन नंदोत्सव में विशेष उल्लास बिखरता है। जन्माष्टमी से एक दिन पहले छठी पूजन किया जाता है। महाप्रभुजी वल्लभाचार्य,वि_लनाथजी महाराज,गोस्वामी पुरुषोत्तम महाराज का प्राट्योत्सव विशेष रूप से मनाया जाता है।
Published on:
30 Aug 2021 03:31 pm
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