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450 साल बाद भी महाराणा प्रताप को दिए वचनों को निभा रहे गाड़िया लुहार

हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप का साथ देने वाले गाडिय़ा लुहार परिवारों पर आज भी चरितार्थ होती दिखती हैं।

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maharana pratap jayanti

450 साल बाद भी महाराणा प्रताप को दिए वचनों को निभा रहे गाड़िया लुहार

कोटा.

रुण-झुण, रुण-झुण
बज उठी बैलों की घंटियां
गाड़ी चरमर चरमर करती
पहिये घरमर घरमर करते
है तेज धूप लूएं चलती
धरती जलती
फिर भी अधनंगे पैरों से
ये कौन चले, ये कौन चले
राणा के वीर पहरुए हैं...

कभी प्राथमिक-उच्च प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों के मुख से गर्व के साथ 15 अगस्त व 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्वों स्वर पाती ख्यातनाम कवि ये पंक्तियां हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप का साथ देने वाले गाडिय़ा लुहार परिवारों पर आज भी चरितार्थ होती दिखती हैं। चित्तौड़ से निकलने के दौरान प्रताप से किए वादे साढ़े 400 साल बाद भी बखूबी निभा रहे। वे हर विषम परिस्थिति में संकल्प पर अटल हैं। हां, बदलती फिजां और मशीनीकरण ने उनका रहन-सहन और व्यवसाय प्रभावित जरूर किया।

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कोटा में डीसीएम रोड स्थित गाडिय़ा लुहार बस्ती के बाबूलाल बताते हैं कि पूर्वजों द्वारा किए गए संकल्पों को हमने परम्परा, रीति रिवाज के रूप में माना, निर्वहन कर रहे हैं। डिसीएम रोड स्थित बस्ती में रहने वाले गाडिय़ा लुहार महेंद्र, घांसी बताते हैं कि तीन दशक पहले तक तो लोहे के कृषि उपकरण बनते थे, अब सब मशीनों से बनने लगे हैं। हमारे काम की पूछ परख कम हो गई। लोहे का धंधा नहीं मिलता। ऐसे में अब लोहे की जालियां, किवाड़, फाटक बनाना शुरू कर दिया है। कई परिवार कबाड़ी का काम भी करते हैं।

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बच्चों के भविष्य पर ध्यान
ये परिवार अब बच्चों की पढ़ाई पर भी ध्यान देने लगे हैं। कंसुआ क्षेत्र के निजी स्कूल संचालक विशाल केजरीवाल बताते हैं कि उनके विद्यालय में गाडिय़ा लुहार परिवार के दो दर्जन से अधिक बच्चे नियमित स्टूडेंट हैं। ये अन्य बच्चों के साथ क्लासरूम में बैठते हैं, फर्राटे से हिंदी, अंग्रेजी पढ़ते हैं। रहन-सहन भी सामान्य परिवारों सा हो गया है।

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याद है प्रताप का साथ
गाडिया़ लुहार दिनेश ने बताया कि उन्हें याद है कि शनिवार को महाराणा प्रताप की जयंती है। उन्होंने भी छोटे स्तर पर कार्यक्रम की तैयारी की है। प्रताप जयंती की पूर्वसंध्या पर शुक्रवार को डीसीएम रोड पर राहगीरों को शर्बत पिलाया। बस्ती के लोगों से चंदा एकत्र किया।


कॉलोनियां बसी, साधन भी आए
समय के साथ गाडिय़ा लुहार परिवारों का रहन-सहन भी बदला है। कई परिवार शहरों में बस गए हैं। कोटा में डीसीएम रोड पर वर्ष 2008 में आवंटित गाडिय़ा लुहार बस्ती में 210 भूखंडों कई परिवार रह रहे। वहीं डाबी, बिजोलिया, भीलवाड़ा, चित्तौड़, बीकानेर आदि शहरों में भी गाडिय़ा लुहारों ने स्थाई मकान बना लिए। घरों में टीवी, कूलर, पंखे, फ्रिज, एलईडी, मोटरसाइकिल आदि आ गए हैं।


प्रताप को दिए वचन...
1. रास्ते में पड़ी हुई वस्तु नहीं उठाएंगे।
2. किसी का खेत नहीं काटना है।
3. मेहनत की कमाई से परिवार का पालन पोषण करेंगे।
4. बैलगाड़ी में खटिया उलटी रखकर यात्रा करेंगे।
(जैसे बजुर्ग गाडिय़ा लुहारों ने बताया)