
atul chaturvedi
डॉ. अतुल चतुर्वेदी
बड़ा कठिन समय था बच्चों के लिए। बड़े बड़े बाल मनोवैज्ञानिकों को समझ नहीं आ रहा था कि माजरा क्या है ? राजा भी इस मसले को लेकर बहुत गंभीर नहीं था । उनका मानना था कि बच्चे आजकल बहुत मूडी होते हैं बल्कि कुछ तो बदतमीजी की हद तक जिद्दी इसलिए देर सबेर वे मान जाएंगे । आखिर कब तक मुंह लटकाए बैठे रहेंगे ? एक दिन उनके चेहरों पर हंसी आ ही जाएगी । हमने पूरी प्रजा के मनोरंजनार्थ कई चैनल चला रखे हैं जो दिन भर फूहड़ किस्म का हास्य परोसते रहते हैं। मैं स्वयं ही किसी भीषण त्रासदी से आता हूं तो इन्हें देखकर हंसते हंसते लोटपोट हो जाता हूं।
नाग-नागिन , बाबा-बाबिन ,भूत-प्रेत के कार्यक्रम देख सारी करूणा हास्य में बदल जाती है । लेकिन मामला बढ़ता देख कर राजा ने मंत्री को बुलाया । मंत्री राजा का चेहरा देख कर ही समझ गया कि कोई पेचीदा मामला है । वरना राजा या तो सिंहवत् दहाड़ता है या राजनयिक शिष्टाचारवश मुस्कुराता है ।
चिंतनशील मुखमुद्रा तो उसे मजबूरन बुद्धजीवियों की सभा में ही धारण करनी पड़ती है । मंत्री ने हाथ जोड़कर अभिवादन करते हुए पूछा – सब कुशल मंगल तो है महाराज ? दयानिधान ने इस समय अचानक कैसे याद किया ...? - तुम्हें पता है , राज्य में क्या हो रहा है ? – हां महाराज , सब पता है । पल-पल का ,चप्पे - चप्पे का पता है । पूंजीपति घर भर रहे हैं , किसान आत्महत्या कर रहे हैं । सीमा पर जवान और सदन में नेता लड़ रहे हैं । गाएं और सांड इंसानों पर रेलें एक दूसरे पर चढ़ रही हैं । मंत्री ने काव्यात्मक अंदाज में एक सांस में सब हाल सुना अपनी योग्यता दिखानी चाही ।
- बस , बस । बंद करो ये तुक्कड़बाजी । तुम्हें पता है मैं व्यवस्था विरोधी दरबारी पसंद नहीं करता । - महाराज क्षमा करें । मंत्री घबराया । - हमने सुना है कि कई दिनों से हमारे राज्य में बच्चे हंस नहीं रहे हैं ? – मंत्री बोला – हां महाराज , खबर तो मुझ तक भी आयी थी लेकिन बच्चों का मसला समझ मैंने खास ध्यान नहीं दिया । आप कहें तो उनके लिए एक सप्ताह तक कार्टून चैनल मुफ्त चलवा दें । उनको चाकलेट और गिफ्ट स्कूलों में बटंवा दें । देखिएगा उनकी आंखों में हंसी की चमक दौड़ जाएगी और वो जोर जोर से खिल खिलाकर हंसने लगेंगे।
राजा ने योजना को तुरंत लागू करने की सहमति दे दी। लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात निकला । बच्चों की हंसी बादस्तूर गायब थी। यहां तक कि कुछ बच्चे हंसना तो दूर रत्ती भर मुस्कुरा भी नहीं रहे थे। बच्चों की यह हालत देख मां-बाप बेहाल होते जा रहे थे। प्रजा में रोष व्याप्त हो रहा था। विरोधी मौके की तलाश में थे और चैनल मनमानी व्याख्या कर रहे थे । कोई इसे मनोवैज्ञानिक रोग का फैलना बता रहा था तो कोई दैवीय प्रकोप । वे दिन भर शिक्षाविदों और ज्योतिषियों को बैठाकर चिक चिक करते ।
उन्ही दिनों एक अखबार ने खबर छापी कि चूंकि बच्चे बेमौत मारे जा रहे हैं । स्कूलों में उनके साथ पाशविक घटनाएं हो रही हैं कहीं हत्या हो रही है , कहीं बलात्कार हो रहा है इसलिए उनमें भय व्याप्त हो गया है । दूसरे बच्चे बस्तों से लेकर मां-बाप की उम्मीदों के बोझ तले दब गए हैं इसलिए वे सहमे सहमें से रहते हैं । उनकी सहजता महात्वाकांक्षाओं का शिकार हो गयी है । वे गहरे अवसाद में हैं इन दिनों ।
गुप्तचरों ने ये खबर राजा तक पहुंचायी । राजा को अत्यन्त क्रोध आया और उसने आनन फानन में मंत्रिपरिषद् की बैठक बुलायी । राजा ने संबोधित करते हुए कहा – मुझे बच्चों के संवेदनशील व्यवहार से बहुत आश्चर्य हुआ है । कल ये विचारशील युवा बनकर देश के लिए खतरा हो जायेंगे । हमें सबसे पहले इन बड़े स्कूलों पर कार्रवाई करनी होगी । तभी मंत्री ने राजा के कान में फुसफुसाया – महाराज संबंधित स्कूल तो आपके साले के बेटे का है । - तो ठीक है प्रिन्सिपल पर कार्रवाई करो , अधिकारियों पर करो ...। कुछ भी हो दुर्घटना की पुनरावृत्ति न हो । बच्चों के लिए हैप्पीनेस स्कीम लागू करो । प्रत्येक माता-पिता को बच्चे का हंसता हुआ चेहरा लगाकर एक आवेदन करना होगा जिससे उस परिवार को एक हजार रूपए प्रतिमाह भत्ता मिलेगा ।
शिक्षा और महिला बाल विकास के कर्मचारियों को इस सर्वे पर लगाओ कि वे पता लगाएं कि कितने बच्चे अभी भी नहीं हंस रहे हैं ? उनके न हंसने के पीछे क्या सामाजिक , आर्थिक , मनोवैज्ञानिक कारण हैं ? अंतिम बार वे कब हंसे थे , और कितनी देर तक हंसे थे आदि । राजा ने हैप्पीनेस विभाग को स्वायत्तशासी बना कर ढेर सारा बजट दे दिया । राज परिवार के एक हंसोड़ व्यक्ति को उसका अध्यक्ष बना दिया गया । जो देर तक हंसता रहता था । यहां तक कि वो किसी की शव यात्रा में भी हंसता रहता था और अस्पताल के आई सी यू वार्ड में भी ।
बहरहाल हैप्पीनेस एलाउंस से माता-पिताओं का गुस्सा शांत हो गया । एक हजार रूपए का भत्ता घर की साग-सब्जी के टेका लगाने के काम आ रहा था । अभिभावक अब बच्चो की हंसी की कम उनके कैरियर की चिंता में अधिक व्याकुल दिखते । मीडिया को प्यार से बुलाकर समझा दिया गया । कुछ टटके उदाहरणों से उसका पत्रकारिता का भूत भी उतर गया । बच्चे आज भी वहीं के वहीं थे । रैलियों में नारे लगाते । रियलटी शो में करतब दिखाते । किताबों से सबक याद करते । मां-बाप की उम्मीदों की डोर पर पतंगों से गोता लगाते । उनकी लुप्त हंसी शोध का विषय थी अब चिंता या खतरे का विषय नहीं ।
Published on:
14 Sept 2017 03:22 am
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