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कोटा . शहर में श्वान का आतंक लोगों का दुश्मन बन रहा है। हालात ऐसे हैं कि पिछले एक साल में औसतन हर चार घंटे में सात लोग श्वान के शिकार होकर अस्पताल पहुंच रहे हैं। मेडिकल कॉलेज के अस्पतालों में ही सालभर में 15395 लोग उपचार के लिए पहुंचे।
गंभीर बात यह कि कोटा में ही हर महीने एक व्यक्ति की हाइड्रोफोबिया से मौत हो रही है। इसके बाद भी नगर निगम अदालतों के आदेश की आड़ में आम लोगों के जीवन और सेहत से खिलवाड़ करने से नहीं चूक रहा। निगम की लापरवाही शहर के लोगों पर भारी पड़ रही है।
एमबीएस में वर्ष 2017 में 9714 मामले श्वान से काटने के आए, जिसमें 9701 रोगियों को प्राथमिक उपचार के बाद घर भेज दिया गया। 13 जने इतने गंभीर जख्मी हुए कि उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। वहीं जनवरी से अब तक 2899 लोगों को श्वान ने काटा, जिसमें 3 लोग भर्ती हुए। वहीं न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में पिछले एक वर्ष में 5694 लोगों को श्वान ने काटा है।
लोगों को श्वान काट रहे हैं, निगम क्यों नहीं पकड़ता
निगम की कार्य समिति की बैठक में शहर में श्वानों के काटने का मुद्दा भी छाया रहा। पार्षद पवन अग्रवाल ने कहा कि विज्ञान नगर में श्वानों का आतंक है। कई लोग शिकार हो चुके। श्वान पकडऩे से निगम क्यों पीछे हट रहा है। आईएल टाउनशिप में कुत्ते मोरों को मार डालते हैं। बैठक में आयुक्त ने कहा कि श्वानों की समस्या को नियंत्रित करने के लिए उनकेबधियाकरण का प्रोजेक्ट प्रारंभ करने के प्रयास किए जाएंगे।
एक मिमी रोजाना की रफ्तार से बढ़ता है वायरस
श्वान के काटने के बाद उसकी लार में मौजूद वायरस इंसान के रक्त में मिल जाता है। यह वायरस एक मि.मी. प्रति दिन की रफ्तार से मस्तिष्क की ओर आगे बढ़ता है। इसलिए ही पैर में काटने पर मौत देर से होती है और चेहरे अथवा सीने पर काटने पर वायरस तेजी से मस्तिष्क तक पहुंचता है। एनसेफेलाइटिस होने के बाद मरीज की मौत निश्चित होती है।
मेडिकल कॉलेज में मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. मनोज सलूजा ने बताया कि यदि जानवर की लार रक्त या शरीर के अंदर जाती है तो रेबीज का इंजेक्शन लगाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि श्वान के काटने से व्यवहार में बदलाव, उत्तेजना, पागलपन, लार गिरना, पानी से डर इसके लक्षण हैं। इसका कोई इलाज नहीं है। सरकारी अस्पतालों में रेबीज के इंजेक्शन नि:शुल्क लगाए जाते हैं।
कार्रवाई : नौ दिन चले अढाई कोस
नगर निगम द्वारा श्वान पकड़कर जंगल में नहीं छोड़ा जाता। इसके लिए उन्होंने कोटा एनिमल वेलफेयर ट्रस्ट को पकडऩे की जिम्मेदारी दी हुई हैं। वहां से पशु चिकित्सालय ले जाया जाता है और नसबंदी कर 5 से 7 दिन बाद उसे वहीं छोड़ दिया जाता है। संस्था द्वारा एक वर्ष में अब तक 111 श्वान की नसबंदी की गई है।
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गाडिय़ों के पीछे भागते हुए करते हैं जख्मी
मोटर साइकिल सवार लोग इनकी चपेट में सबसे अधिक आते हैं। चलती गाड़ी पर ये किसी का भी पैर पकड़ लेते हैं। कई बार मोटर साइकिल सवार गाड़ी से गिरकर घायल हो जाता है। चौपहिया वाहन के पीछे भी ये दूर तक भागते रहते हैं। ये हालात पूरे शहर व हाइवे के हैं। निगम उपायुक्त राजेश डागा ने बताया कि हाईकोर्ट की रोक लगी हुई है कि किसी भी श्वान को पकड़कर उसे जंगल में नहीं छोड़ सकते। इनकी नसबंदी कर वापस वहीं छोडऩे पर कार्य चल रहा है।
एफआईआर तक दर्ज कराने पहुंचे लोग
छा वनी निवासी कर सहायक फजलुर्रहमान को कुछ माह पहले छावनी में एक श्वान ने काट लिया था। उन्होंने इस सम्बन्ध में एक शिकायत निगम आयुक्त के खिलाफ गुमानपुरा थाने में दी, लेकिन वहां शिकायत दर्ज नहीं की गई। इस पर शहर पुलिस अधीक्षक को परिवाद दिया गया। इस पर मामला दर्ज कर जांच की जा रही है। रिपोर्ट में कहा कि उन्हें श्वान ने काट लिया। इसका जिम्मेदार निगम आयुक्त को माना, उनका कार्य शहर से आवारा मवेशियों को हटाने का है।
Published on:
21 Apr 2018 10:40 am
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