कोटा. नगर विकास न्यास की ओर से कोटा की देवनारायण योजना में करीब 30 करोड़ रुपए की लागत से बनाए गए बायो गैस प्लांट में अव्यवस्थाओं और अनियमितताओं के चलते लगातार प्लांट का उत्पादन घटता जा रहा है। ऐसे में खुद नगर विकास न्यास की संयुक्त शासन सचिव ने मामले की तथ्यात्मक रिपोर्ट तलब की है। इसके चलते नगर विकास न्यास में हडकंप मच गया है।
देवनारायण योजना में बनाए गए भारत के सबसे बड़े बायो गैस प्लांट की क्षमता प्रतिदिन 3,000 किलोग्राम सीबीजी गैस, 21 टन फॉस्फेट रिच आर्गेनिक फर्टिलाइजर (प्रोम खाद) और 1 लाख लीटर तरल जैविक खाद बनाने की है। लेकिन प्लांट को बेहद कम क्षमता से चलाए जाने से महज 700 किलो, सीबीटी, 3-4 टन खाद और नाममात्र का तरल जैविक बन रहा है।
प्लांट खराब कर रहे जुगाड़ के ठेकेदार
प्लांट का निर्माण करते समय इसमें जर्मनी की मशीनें लगाई गई, लेकिन इसकी सही तरीके से मरम्मत करवाने के स्थान पर लोकल स्तर पर जुगाड़ से इसकी मरम्मत करवाई जा रही है। इसके अलावा ठेकेदार ने पर्याप्त और अनुभवी श्रमिक भी नहीं रखे। ऐसे में प्लांट पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। ऐसे में उत्पादन कम होने के साथ प्लांट भी खराब हो रहा है। इसकी मरम्मत कुशल कारीगरों से करवानी चाहिए। कुशल व पूरे श्रमिक लगाए जाने चाहिए।
जर्मनी कर रहा अध्ययन, पूरे देश में 500 प्लांट लगाने की योजना
प्लांट बनने के बाद खुद जर्मनी की टीम इस पर अध्ययन कर रही है। इस आधार पर जर्मनी के फाइनेंस के आधार पर पूरे देश में ऐसे 500 प्लांट लगाने की योजना है, लेकिन ठेकेदार व न्यास के अधिकारियों की मिलीभगत से प्लांट की हालत खराब हो रही है। इसका उत्पादन भी प्रभावित हो रहा है। यदि इसे नियमानुसार नहीं चलाया गया, तो इससे जुड़ी पूरी चैन खराब हो जाएगी और योजना पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।
पूरे हाड़ौती को जैविक बनाने की क्षमता
प्लांट की क्षमता पूरे हाड़ौती (कोटा, बूंदी, बारां और झालावाड़) में उपयोग होने वाले डीएपी को जैविक खाद से रिप्लेस करने की है। इसके खाद, तरल खाद व गैस के लिए एमओयू भी है। ऐसे में बस प्लांट को सही तरीके से चलाना ही है, लेकिन अनुभवी नहीं होने से ठेकेदार इसका सही संचालन नहीं कर पा रहा है।
ऐसे काम करता है प्लांट
प्लांट में 40-40 टन गोबर क्षमता के दो अनलोडिंग टैंक है। इनमें सबसे पहले गोबर पहुंचता है। इसके बाद यह गोबर सेडिमेंटेंशन टैंक में पहुंचता है, जहां गोबर से मिट्टी अलग होती है। इसके बाद फीडिंग टैंक में पहुंचे गोबर से अन्य गंदगियां दूर हो जाती है, यहां से गोबर 50-50 लाख लीटर के दो डाइजेस्टर में पहुंचता है, जहां 30 दिनों की प्रकिया के बाद इसमें से गोबर गैस निकलती है। इसमें मीथेन गैस से कम्प्रेस्ड बायो गैस बनाई जाती है। यह बिल्कुल सीएनजी जैसी है। शेष पदार्थ से तरल व ठोस दो तरह का खाद बनता है।
-कोटा नगर विकास न्यास के बायो गैस सलाहकार पूर्व कृषि प्रोफेसर व महेन्द्र कुमार गर्ग ने बताया कि प्लांट को ढंग से चलाया जाना चाहिए ताकी कोटा का नाम हो। इसके आधार पर केंद्र सरकार की देश में 500 प्लांट लगाने की योजना है। जर्मनी की टीम इसका अध्ययन कर रही है, लेकिन कुछ लोगों इसे बिगाड़ रहे है। इसकी उचित व्यवस्था होनी चाहिए।
फेक्ट फाइल –
1200 पशुपालक परिवार के 5 हजार सदस्य देवनारायण योजना में
1 रुपए किलो खरीद रहे गोबर, पशुपालकों को 2 से 20 हजार तक भुगतान की क्षमता
21 टन फॉस्फेट रिच आर्गेनिक फर्टिलाइजर प्रतिदिन बनाने में समक्ष
1 लाख लीटर प्रतिदिन जैविक तरल खाद बनाने की क्षमता
3 हजार लीटर कम्प्रेस्ड बायो गैस (सीबीजी) बनाने की क्षमता