इनमें अधिकांश टिकटार्थी दोनों नेताओं के देवरे पर हाजिरी लगा रहे हैं। यह अलग बात हैं कि अधिकांश नेताओं को मिलकर अपने मन की बात बताना तो दूर उनसे हाथ तक मिलाना नसीब नहीं होता। इसके बावजूद टिकटार्थियों की टिकट को लेकर उम्मीद बाकी है। कुछ नेता तो अपनी झेप यह कहकर मिटाते दिखे कि साब! को मैं नजर नहीं आया, अन्यथा मुझसे जरूर बात करते। वैसे भी मेरा तो टिकट पक्का है, मुझे तो उन्होंने चुनाव की तैयारी शुरू करने के लिए कह रखा है। वहीं कुछ ऐसे भी कहते दिखे कि यहां तो बस नौटंकी हो रही है, टिकट का फैसला तो हाइकमान ही करेगा। साब मिल नहीं रहे हैं, क्योंकि उनके हाथ में कुछ नहीं है।