
पत्रिका डिजिटल डेस्क (कोटा). राम जन्म भूमि विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जल्द सुनवाई से इनकार के बाद यह मुद्दा दोबारा चर्चा में आ गया है। एक ओर जहां नाराज संत समाज केंद्र की मोदी सरकार से अध्यादेश लाने की मांग पर अड़ गया है वहीं मस्जिद के पक्षकारों ने कोर्ट के निर्णय का सम्मान करने की बात कही है। सालों के लंबित इस मामले में लगतार राजनीति होती आई है, लेकिन इससे सर्वाधिक लाभ भारतीय जनता पार्टी को हुआ । अयोध्या विवाद के बाद राजस्थान की राजनीति में किस तरह बदलाव हुआ उस पर पढिय़े यह रिपोर्ट
नवंबर, 1990…जब अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा को बिहार में रोककर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया तो इसकी तीखी प्रतिक्रिया में भाजपा ने वीपी सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया । वीपी सिंह सरकार अल्प मत में आ गई। परिणाम स्वरूप राजस्थान में भैरोसिंह की सरकार गिराने क़े लिए जनता दल के सदस्यों को वही खेल खेलने को कहा गया । इस पर राजस्थान में दो धड़े हो गए। शेखावत मंत्रिमंडल के 11 सदस्यों ने त्यागपत्र दे दिए। किन्तु जनता दल (दिग्विजयसिंह) धड़े ने शेखावत का साथ दिया। इससे सरकार गिरने से बच गई और जनता दल में बिखराव हो गया । जो धड़ा बाहर रहा उसके भी तीन टुकड़े हो गए। ज्यादातर नेताओं ने भाजपा का दामन थाम लिया।
Rajasthan Ka Ran : गढ़ बचाने के लिए भाजपा ने
खेला ‘बाहर वालों’ पर दांव
जनता दल के बिखराव से और भैरो सिंह शेखावत की राजनीतिक कुशलता से सरकार तो बच गई लेकिन फिर आई वो तारीख जिसने भारतीय राजनीति को पूरी तरह से बदल कर रख दिया। 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा गिरा दिया गया। पूरे देश में सांप्रदायिक दंगे शुरू हो गए। कांग्रेस के समर्थन से केंद्र में चल रही चंद्रशेखर सरकार ने भैरोंसिंह शेखावत सरकार को अपदस्थ कर दिया लेकिन इसके बाद अलग-अलग जातियों में बिखरा हुआ हिंदु वोट बैंक भाजपा के साथ हो गया। इसके बाद उत्तर भारत में हुए ज्यादातर चुनावों में भाजपा की जीत हुई।
Rajasthan Ka Ran : भाजपा और सीएम राजे का सिरदर्द बन सकती है यह सीट..
फिर आए 1993 के विधानसभा चुनाव, इन चुनावों में भाजपा ने अकेले ही अपने दम पर 95 सीटें हासिल की और और जनता दल जो कि 90 के चुनावों में 55 सीटें जीतने में कामयाब रहा था इस बार केवल 6 सीटों पर ही सिमट गया। भैरोंसिंह सरकार गिराने और आयोध्या विवाद के बाद राजस्थान में जनता दल की राजनीति का एक तरह से अंत हो गया और आजादी के बाद पहली बार भाजपा को राजस्थान में जनता दल नाम की बैसाखी से मुक्ति मिल गई।
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