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व्यंग्य : मलाई के उपासकों को हर समय मलाई चाहिए

कुछ लोग मलाई के उपासक होते हैं उनको हर समय मलाई चाहिए होती है। उनका खुरचन से काम नहीं चलता । खुरचन के लिए खुरचने का श्रम जो करना पड़ता है और श्रम करते हुए बुजुर्ग पार्टी के कारिंदों को शर्म आती है ।

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कोटा

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Deepak Sharma

Apr 22, 2024

Political satire by Famous Writer Dr. Atul Chaturvedi

Political satire by Famous Writer Dr. Atul Chaturvedi

डॉ अतुल चतुर्वेदी


कुछ लोग मलाई के उपासक होते हैं उनको हर समय मलाई चाहिए होती है। उनका खुरचन से काम नहीं चलता । खुरचन के लिए खुरचने का श्रम जो करना पड़ता है और श्रम करते हुए बुजुर्ग पार्टी के कारिंदों को शर्म आती है । मलाई का क्या है ऊपर ऊपर इकट्ठा होती है, अंगुली डालो चाट लो। मलाई की ख़ासियत यह है कि इसमें चिकनाई भले ही ज्यादा हो, लेकिन ज़ुबान को सुख मिलता है। आजकल ज़ुबान का सुख बड़ा सुख है सारे झगड़े ही ज़ुबान की वजह से होते रहे हैं।

नेताओं की ज़ुबान तो बावन गज की होती है। खूब फिसल रही है इन दिनों। क्या क्या नहीं कहा जा रहा इतिहास से लेकर खानदान तक को गरियाया जा रहा है। ज़ुबान कैंची की तरह चल रही है। और ज़ुबान चलाने में जाता भी क्या है भला? इसके बाद तो बस पांच साल आराम ही करना है।

एक अनुभवी कार्यकर्ता से पूछा - भाई ऐसे अंतरात्मा कैसे मान जाती है ? जनता को कल कैसे मुंह दिखायेंगे ? वो हंसते हुए बोले - नेता में अंतरात्मा नाम की चीज़ ही नहीं होती। वो ईमान, शर्म, मूल्य बेचकर ही इस क्षेत्र में आता है। रही बात जनता की तो उसे ‘कोऊ नृप होय हमें का हानि’ वाले सिद्धांत में यक़ीन है। जनता का ईमान और चेतना जागृत होती तो क्या ऐसा मृत प्रायः समाज बनता ?

हमारे नेता हमारे सिस्टम की उपज हैं जो हमने बोया है हम वही काट रहे हैं। हम उनको ही चुन रहे हैं, जो हमें पसंद हैं। प्रेक्टिकल बनो के उद्घोष वाले देश में नैतिक होने के ख़तरे कौन उठाएगा? क्योंकि जो नैतिक बनेगा, वही सबसे पहले अभिमन्यु की तरह कौरवों द्वारा मारा जाएगा। इसलिए भविष्य हित में यही सही है पार्थ! कि दोनों हाथों और दसों अंगुलियों से मलाई चाटो और उससे भी पेट न भरे तो जूते में खीर बांटो।