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किसानों के लिए अच्छी खबर : अब फसलों में नहीं लगेंगे कीड़े, काश्तकारी क्षेत्र में हुआ क्रांतिकारी बदलाव….

गामा किरणों के रेडिएशन से अरहर, उड़द, दलहन, सरसों व मूंगफली, तिलहन की 42 किस्म के ' रेडिएंट म्यूटेंस सीड ' किए विकसित

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Bhabha Atomic Research Center (BARC)

किसानों के लिए अच्छी खबर : अब फसलों में नहीं लगेंगे कीड़े, काश्तकारी क्षेत्र में हुआ क्रांतिकारी बदलाव....

कोटा/रावतभाटा. अब फसलों में कीड़े नहीं लगेंगे। उत्पादन कई गुना ज्यादा और गुणवत्ता पूर्ण होगा। हर साल बुवाई के लिए बाजार से बीच खरीदने की मजबूरी भी खत्म होगी। काश्तकारी की दुनिया में यह क्रांतिकारी बदलाव कर दिखाया है भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (बार्क) के न्यूक्लियर एग्रीकल्चर एंड बायोटेक्नोलॉजी डिवीजन ने। जहां गामा किरणों के रेडिएशन से अरहर, उड़द, दलहन, सरसों व मूंगफली, तिलहन की 42 किस्म के ' रेडिएंट म्यूटेंस सीड ' विकसित किए हैं। बड़ी बात यह है कि इन बीजों के इस्तेमाल के बाद किसानों की जेब पर नाहक पडऩे वाला खाद और रसायनों के छिड़काव का खर्च भी खत्म होगा।

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राजस्थान पत्रिका से विशेष मुलाकात करते हुए बार्क के सीनियर साइंटिस्ट डॉ. जे सुब्रहमन्यम ने बताया कि आमतौर पर म्यूटेशन ब्रीडिंग में 15 साल या उससे भी ज्यादा का समय लगता है, लेकिन गामा रेडिएशन के जरिए म्यूटेशन की प्रक्रिया तेज हो जाती है और 10 साल में ही नया 'रेडिएंट म्यूटेंस सीडÓ तैयार हो जाता है। ऐसा करने से बीज के मूल गुणों में कोई फर्क नहीं आता, बल्कि गुणवत्ता और आकार बढ़ जाता है। सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि प्रक्रिया के जरिए बीज पूरी तरह से रोग प्रतिरोधक हो जाते हैं।
नहीं लगा पाएंगे सेंध
खेतों में खड़ी फसलें अक्सर कीड़ों और मौसमी बीमारियों का शिकार हो जाती हैं। फसल को बचाने के लिए किसान खाद एवं यूरिया का छिड़काव करते हैं। महंगे होने से आर्थिक बोझ तो बढ़ता है ऊपर से हानिकारक होने के कारण खाने वाले लोगों के स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचाते हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद फसलें बच भी जाएं तो कोल्ड स्टोरेज या फिर बेहद सुरक्षित सिक्योरिटी पैकिंग में रखने के बावजूद घुन और सुड़ी जैसे जीव चट कर जाते हैं, लेकिन गामा रेडिएशन प्रोसेसिंग के बाद फसल चाहे खेत में खड़ी हो या घर पर पड़ी हो कीड़े छू तक नहीं पाएंगे।

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सुरक्षित रहेगी गुणवत्ता
उन्होंने बताया कि फसल पूरी तरह गुणवत्ता पूर्ण होगी। दाने भी मोटे और स्वस्थ होंगे। उत्पादन भी पहले से कई गुना बेहतर मिलेगा। सबसे ज्यादा बड़ी बात यह है कि बीजों का इस्तेमाल करने वाले किसानों को हर साल नई फसल बोने के लिए बीज बाजार से नहीं खरीदने पड़ेंगे। इन्हीं बीजों को संरक्षित करके फिर से बुवाई कर पहले जैसी लहलहाती फसल ली जा सकेगी।


कोटा मेें चल रहा प्रयोग
सुब्रहमन्यम ने कहा कि उड़द की फसल के पत्ते पीले पड़ जाते हैं, उत्पादन भी कम होता है। इसी को ध्यान में रखते हुए कोटा कृषि विश्वविद्यालय में रेडिएशन लगे बीज दिए हैं। वे दो साल से प्रयोग कर रहे हैं। इन बीजों से फसलें अच्छी होगी। उन्होंने कहा कि रेडिएशन लगे बीजों की डिमांड धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है। लोग इसका महत्व भी समझने लगे हैं। यदि कोई रेडिएशन लगे बीजों को बाजार में बेचना चाहता है या उसकी फैक्ट्री लगाएगा तो सरकार उसे 50 प्रतिशत सब्सिडी भी देगी।

रेडिएशन डोज से नहीं होती फसल खराब
उन्होंने कहा कि दालों, चावल, मूंगफली सहित अन्य में कीड़े लग जाते हैं। चावल में इल्लियां पड़ जाती है। यदि पैकेट में रेडिएशन लगा दिया जाए तो जब तक पैकेट नहीं खुलेगा। तब तक खराब नहीं होगा। फसलों में कीड़े पडऩा आम बात है। कीटनशाक का छिड़काव करने पर भी कोई फर्क नहीं पड़ता। उल्टा स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

फसलों व कैंसर पर दी जानकारी
परमाणु ऊर्जा विभाग एवं राष्ट्रीय पत्रकार संघ (आई) पत्रकारिता और संचार विद्यालय की ओर से परमाणु ऊर्जा जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि विषय पर पत्रकारों की कार्यशाला में बुधवार को फसलों व कैंसर रोग से संबंधित जानकारी दी गई। भारी पानी कॉलोनी स्थित अतिथि गृह सभागार में आयोजित कार्यशाला में पत्रकारों को खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नाभिकीय ऊर्जा के अनुप्रयोगों पर भाभा परमाणु अनुसन्धान केंद्र के डॉ. जे सुब्रमण्यन व कैंसर जनक रिस्क फैक्टर तथा उपचार पर टाटा मैमोरियल के डॉ. वेंकटेश रंगराजन ने व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि अमरीका, आस्ट्रेलिया सहित अन्य देशों की अपेक्षा भारत में कैंसर रोग कम लोगों में होता है। कैंसर तम्बाकू खाने व पीने तथा खान पान में गड़बड़ से होता है। भारत में कैंसर नार्थ व इस्ट इंडिया में ज्यादा है। इस दौरान कैंसर के इलाज के तरीकों के बारे में भी जानकारी दी।