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Kota: 15 करोड़ खर्च के बाद भी कैद में है दुनिया की सबसे बड़ी घंटी, डिजाइनर की मौत के बाद नहीं मिला खोलने का फॉर्मूला

कोटा के चंबल रिवर फ्रंट पर 15 करोड़ रुपए खर्च करने के बावजूद दुनिया की सबसे बड़ी घंटी अब तक सांचे में कैद है। सांचा खोलने के दौरान प्रोजेक्ट डिजाइनर देवेन्द्र आर्य की मौत के बाद घंटी निकालने का फार्मूला नहीं मिल पाया।
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कोटा

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Akshita Deora

Aug 11, 2026

chambal river front bell

यहां लगनी थी दुनिया की सबसे बड़ी घंटी (फोटो: पत्रिका)

Update On World Largest Bell In Kota Rajasthan: हैरिटेज चंबल रिवर फ्रंट पर ढाली गई दुनिया की सबसे बड़ी घंटी तमाम प्रयासों के बावजूद अब भी सांचे से बाहर नहीं आ सकी है। बीते 4 सालों में तमाम प्रयास के बावजूद इसे खोलने के फॉर्मूला (चाबी) के नहीं मिलने से ये अब भी सांचे में ही कैद है।

चंबल रिवर फ्रंट का काम 17 जून 2020 को शुरू हुआ था। घंटी की ढलाई का काम 3 जुलाई 2022 को शुरू हुआ। यह काम स्टील मेन के नाम से विख्यात धातु विशेषज्ञ (मेटलॉजिस्ट) देवेन्द्र आर्य की अगुवाई में 17 अगस्त 2023 को पूरा हुआ। दुनिया की सबसे बड़ी घंटी के लिए उन्होंने कई धातुओं से मिलाकर विशेष मेटल (अलॉय) ज्वॉइंटलेस चैन तैयार की।

आर्य ने 22 भट्टियों में इस खास अलॉय से घंटी की ढलाई की। इस दौरान वहां का तापमान करीब 3000 डिग्री तक पहुंचना था। ऐसे में विशेष हीट रेजिस्टेंस सूट पहनकर ढलाई कर उन्होंने वर्ल्ड रेकॉर्ड बनाया।

सांचा खोलते समय हादसे में हुई थी डिजाइनर की मौत

देवेन्द्र आर्य ने करीब 79000 किलो अलाय से घंटी बनाने के लिए धरती में कई मीटर गहरा गड्ढा खुदवाया और इसमें लोहे के सांचों के बीच सिलिका रेत के साथ विशेष केमिकल को मिलाकर लचकदार और पत्थर जैसा मजबूत सांचा बनाया। इसमें घंटी ढलाई की गई। ढलाई के बाद सांचा खोलने का काम शुरू हुआ और इसी दौरान सांचा खोलते समय क्रेन से हुए हादसे में 19 नवंबर 2023 को प्रोजेक्ट डिजाइनर देवेन्द्र आर्य और उनके सहायक की मौत हो गई। इसी के साथ सांचे को खोलने का काम भी ठप हो गया।

15 करोड़ खर्च हो गए

केडीए ने अलग-अलग विशेषज्ञ व देवेन्द्र आर्य के सहायक के जरिए भी घंटी को खोलने का प्रयास किया लेकिन तमाम प्रयास विफल रहे। दरअसल, घंटी के सांचे को डिकेमिकलाइज करके खोला जाना था और सांचे को खोलने का ये राज केवल देवेन्द्र आर्य के पास ही था। ऐसे में इसके सांचे की 29 ब्लॉक में से महज 5 ही खोले जा सके, शेष 24 ब्लॉक अब तक नहीं खुल सके है। ऐसे में 15 करोड़ खर्च होने के बावजूद घंटी सांचे में है और यहां इसे टांगने के लिए बनाया गया हैंगर भी खाली है।

79 हजार किलो वजनी घंटी

79 हजार किलो की इस घंटी की ऊंचाई 30 फीट, चौड़ाई 28 फीट थी। घंटी की गूंज करीब 8 किमी तक सुनाई देनी थी। घंटी को देवेन्द्र आर्य की अगुवाई में 200 से ज्यादा एक्सपर्ट ने पांच दिन की मशक्कत के बाद सांचे में ढाला था। इससे पहले बनाने की तैयारी में करीब एक वर्ष तक 1000 कर्मचारियों ने 10 अलग-अलग प्रोजेक्ट पर काम किया। घंटी की ढलाई कास्टिंग का लाइव टेलीकास्ट अमरीका के इंजीनियरिंग कॉलेजों में किया गया। कास्टिंग में 65 हजार लीटर से अधिक डीजल और 600 एलपीजी सिलेंडर लगे। कर्मचारियों को 10 किलो ग्लूकोज और गुड़ का पानी दिया ताकि हीट का असर कम से कम हो।

रिवर फ्रंट पर घंटी की ढलाई के बाद इसे खोलने के दौरान हादसे में धातु विशेषज्ञ देवेन्द्र आर्य की मौत हो गई। इसके बाद इसे खोलने के कई प्रयास किए गए, लेकिन सफल नहीं हो सके। इसे खोलने के लिए विशेषज्ञों से सलाह लेंगे और इसके लिए क्या बेहतर किया जा सकता है, इस दिशा में काम किया जाएगा।
बचनेश कुमार अग्रवाल, आयुक्त, केडीए