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navratri Special : चंबल घाटी में 25 हजार साल पहले शुरू हुई शक्ति की आराधना

कोटा बूंदी, बारां और झालावाड़ में सैकड़ों किमी में फैले घने जंगलों के बीच शैलाश्रयों में चारों ओर बड़ी मात्रा में इसके स्पष्ट सबूत बिखरे पड़े हैं।

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कोटा

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Zuber Khan

Mar 25, 2018

 navratri festival in India

विनीत सिंह@ कोटा .

हाड़ौती में आदि शक्ति की आराधना का चलन 25 हजार साल से भी ज्यादा पुराना है। कोटा से लेकर बूंदी, बारां और झालावाड़ में सैकड़ों किमी के इलाके में फैले घने जंगलों के बीच आदि मानव के ठिकाने रहे शैलाश्रयों में चारों ओर बड़ी मात्रा में इसके स्पष्ट सबूत बिखरे पड़े हैं। अधिकांश जगहों पर दैवीय प्रतीकों चक्र, त्रिशूल, सूर्य और स्वास्तिक का चित्रांकन किया गया है, लेकिन दरा के शैलाश्रयों में तो दैवीय आकृति का चित्रण स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

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करीब 45 हजार साल पहले आदि मानव ने चम्बल घाटी में डेरा जमाना शुरू किया। पहाड़ों की ऊपरी गुफाओं (शैलाश्रयों) में गृहस्थी जमाई और आस-पास जो दिखाई पड़ा उसे चित्रों की शक्ल में दीवारों पर उकेर दिया। इन शैलचित्रों में उस दौर की जीवन शैली और पूजा पद्धतियों की स्पष्ट छाप देखने को मिलती है।

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राजस्थान में शैलचित्रों पर पहला शोध (पीएचडी) करने वाले कोटा विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ हैरिटेज के कॉर्डिनेटर डॉ. मोहनलाल साहू बताते हैं कि सबसे पहले (करीब 20 से 25 हजार साल) आदि मानव ने दैवीय प्रतीकों का रेखीय चित्रण शुरू किया। इसकी शुरुआत उसने त्रिशूल के चित्र से की। आमतौर पर धारणा है कि त्रिशूल का इस्तेमाल आदि मानव ने हथियार के रूप में किया होगा, लेकिन डॉ. साहू कहते हैं कि अलनिया के शैलचित्रों में त्रिशूल की जो आकृतियां हैं, उनकी बीच की भुजा तो सीधी है, लेकिन किनारे की दोनों भुजाएं मुड़ी हुई हैं।

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साथ ही, तीनों भुजाएं आगे से पैनी होने के बजाय भौथरी और चौड़ी हैं। इससे साबित होता है कि इसका इस्तेमाल शिकार की बजाय धार्मिक प्रतीकों के रूप में किया गया था। यहीं एक छोटे शैलाश्रय में देवियों के चित्र मिले हैं। हाड़ौती के शैलाश्रयों में जहां भी त्रिशूल के चित्र मिले हैं, उनके साथ स्वास्तिक का चित्रण जरूर मिलता है। यानी आदि काल से ही आदि शक्ति के साथ सूर्य की पूजा का चलन था। स्वास्तिक को सूर्य का प्रतीक माना जाता है, जबकि त्रिशूल को देवी का।

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अलनिया के शैलाश्रयों में तो सबाहू (एक रेखीय) स्वास्तिक के साथ-साथ अबाहू (बहुरेखीय) स्वास्तिक चिन्ह भी बने हुए हैं, जबकि चामलिया नाला में सफेद रंग से सूर्य का स्पष्ट चित्र बनाया गया है। वहीं गोलपुर (बूंदी) के शैलाश्रय में वेदी का एक दम साफ चित्र बनाया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि आदि मानव ने करीब 10 हजार साल पहले वेदी सजा कर त्रिशूल, स्वास्तिक एवं सूर्य के साथ दैवीय आराधना का चलन शुरू कर दिया था। बारां जिले के भड़किया में तो इन पूजा प्रतीकों के साथ-साथ चक्र के चित्र भी मिलते हैं, जो देवी के स्वरूप को पूरा कर देते हैं।


आदि शक्ति नमोनम: दरा स्थित तिपटिया के शैलचित्रों में आकर तो सारी आशंकाएं ही खत्म हो जाती हैं। यहां दो मुंह के घोड़े पर सवार देवी का चित्रण मिलता है। इस चित्र में देवी के हाथों में गदा, त्रिशूल और चक्र है। वहीं मस्तक पर सूर्य धारण किए हुए हैं, जबकि दोनों कानों के पास स्वास्तिक का चित्रण किया गया है। सिर पर मुकुट भी सजा है।

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राजस्थान पत्रिका में छपी थी पहली खबर
14 अगस्त 1978 : यही वो दिन था जब डॉ. जगत नारायण श्रीवास्तव ने राजस्थान में पहली बार हाड़ौती के घने जंगलों और पथरीली कंदराओं में शैलचित्र होने की खोज की थी। इसके अगले दिन राजस्थान पत्रिका में छपी खबर से पूरी दुनिया को पता चला कि इस इलाके में आदि मानव 45 हजार साल पहले ही अपनी गृहस्थी सजा चुका था।