कुशीनगर. विश्व की दूसरी बड़ी आर्मी होने का गौरव प्राप्त भारतीय सेना की वीर गाथाओं से समय के पन्ने भरे पड़े हैं। अपने अदम्य साहस व वीरता के बल पर ऑपरेशन पोलो से लेकर सर्जिकल स्ट्राइक तक के तमाम अभियानों को भारतीय सेना ने सफलतापूर्वक पूरा किया है। अभियान चाहे देश में हो या फिर गैर मुल्क में इससे भारतीय बहादुरों पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ता है। आर्म्स एण्ड द मैन की लाइन " ऑल सोल्जर्स अार ऑफ्रेड टू डाई" को कदम-कदम पर खारिज कर बता दिया है कि भारतीय सेना के जवान डरना नहीं लड़ना जानते हैं और लक्ष्य पर तिरंगा फहरने के सिवाय वे कुछ नहीं सोचते हैं।
विजय, सागर, ट्राईडेंट, कैक्टस, मेघदूत, ब्लैक थंडर, ब्लू स्टार जैसे सेना के तमाम अॉपरेशन इसकी गवाही भी देते हैं।
15 अगस्त 1947 को देश के आजाद हो होने गया लेकिन निजाम हैदराबाद भारत से अलग होने की बात सोचने लगे. निजाम हैदराबाद को भारत गणराज्य का हिस्सा बनाने के लिए देश की सेना ने 1948 में अॉपरेशन पोलो का प्लॉन बनाया। 13 सितंबर से 18 सितंबर तक ऑपरेशन चलाकर 6 दिनों में ही निजाम हैदराबाद को देश का हिस्सा बनने के लिए बाध्य कर दिया।
देश को स्वतंत्र हुए करीब 14 वर्ष हो गए थे। इसके बावजूद भी गोवा, दमन-दीव व अंजीदीव आईसलैंड भारत के कब्जे में नहीं था। मेजर जनरल केपी कैनडेथ के कुशल निर्देशन में देश की सेना ने ऑपरेशन विजय 1961 चलाया। 18 व 19 दिसंबर को चले इस अभियान में देश की सेना ने गोवा, दमन- दीव व अंजीदीव को पुर्तगालियों से आजाद करा लिया।
1970 के दशक में नक्सली गतिविधियां देश के लिए चिंता का सबब बनने लगी. नक्सलियों से निजात पाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सेना को नक्सलियों के खिलाफ अभियान चलाने का आदेश दे दिया। जुलाई 1971 में सेना ने स्टीपलचेज नाम से नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन शुरू कर दिया। नक्सलियों के सफाए के लिए सेना का यह पहला बड़ा अभियान था। सेना के इस कार्रवाई में 100 नक्सली मारे गए और 20,000 नक्सलियों ने सरेंडर कर दिया। सरेंडर करने वालों में कई हार्डकोर के नक्सली व नेता शामिल थे. वैसे संसद के प्रस्ताव पर बाद में भी ग्रीन हंट के नाम से रेड कॉरिडोर के खिलाफ अभियान जारी रहा।
भारतीय नेवी के ऑपरेशन ट्रिडेंट व पाईथान पर देशवासी को आज भी गर्व है। 1971 में भारत- पाकिस्तान युद्ध के दौरान देश की नेवी ने पाकिस्तान के कराची बंदरगाह पर एेसा हमला किया जिसकी टीस आज भी पाकिस्तान को बेचैन करती है। अरबीयन सागर के रास्ते हुए 4 व 5 दिसंबर की रात में हुए इस हमले में पहली बार नेवी ने एंटी शिप मिसाइल का प्रयोग किया। एडमिरल एसएम नड्डा, वॉइस एडमिरल जीएम हिरानंदानी व स्ट्राइक ग्रूप के कमांडर बीबी यादव की अगुआई में हुए इस हमले में पाकिस्तान को भारी क्षति हुई। बताते हैं कि 1971 के युद्ध में पाकिस्तान की हार में यह हमला बहुत बड़ा कारण बना। आज भी नेवी अपना सालाना उत्सव 4 दिसंबर को ही मनाती है।
1970 के बाद पंजाब, हरियाणा, चंढीगढ़ के अलावा राजस्थान व गुजरात के कुछ हिस्से को लेकर अलग खालिस्तान देश की मांग जोर पकड़ने लगी थी। जातिय व धार्मिक आधार पर की जा रही इस अनुचित मांग के प्रचार व जनमत जुटाने के लिए 1971 में जगजीत सिंह चौहान ने विदेश का भ्रमण किया। मई 1980 में जगजीत सिंह चौहान ने लंदन में अलग खालिस्तान देश की घोषणा कर दी। इसी तरह बलबीर सिंह संधु ने यहां खालिस्तान के लिए नई करेंसी व मुहर का एेलान कर दिया।
खालिस्तान समर्थक आतंकी जरनैल सिंह भिंडवाला ने हरमिंदर साहिब (स्वर्ण मंदिर) में आग्नेयास्त्रों के साथ प्रवेश कर गया और अकाल तख्त पर कब्जा जमाकर यही से अपनी गतिविधियां संचालित करने लगा। स्वर्ण मंदिर को खाली कराने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री ने जून 1984 में सेना को ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाने की अनुमति दे दी। 1-8 जून तक चले सेना, सेंट्रल रिजर्ब पुलिस व पंजाब पुलिस के संयुक्त अभियान में जरनैल सिंह भिंडरवाला अपने साथियों सहित मारा गया। यही नहीं आदेश देने की कीमत इंदिरा गांधी को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।
सिख आतंकियों के समूल सफाए के लिए सेना ने ऑपरेशन ब्लैर थंडर 1 व ऑपरेशन ब्लैक थंडर 2 नाम से दो और अभियान चलाया। 30 अप्रैल 1986 को नेशनल सेक्यूरिटी गार्ड के 300 कमांडोज, बीएसएफ की 700 टुकड़ियों के बल पर चले ऑपरेशन ब्लैक थंडर 1 में 300 सिख आतंकी पकड़े गए थे। करीब 8 घंटे चले इस अभियान के लिए आदेश शिरोमणि अकाली दल के मुख्यमंत्री सुरजीत सिंह बरनाला ने दिया था।
सिख आतंकियों को खत्म करने के लिए ऑपरेशन ब्लैक थंडर 2 में 9 मई 1988 को अमृतसर में शुरू हुआ था। पंजाब पुलिस के तत्कालीन डीजीपी केपीएस गिल के अगुआई में 9 मई से 18 मई तक चले अभियान में 41 सिख आतंकी मारे गए थे तथा 200 आतंकियों ने अात्मसमर्पण कर दिया था। इस ऑपरेशन में पिछले अभियानों की गलतियों को सुधार लेने से अकाल तख्त को मामूली क्षति पहुंची थी। इन अभियानों का नतीजा यह हुआ कि सिख आतंकियों का सफाया हो गया और पंजाब की जनता आज अमन- चैन से रह रही है।
ऑपरेशन मेघदूत हमारी अदम्य साहस वाली सेना के शौर्य का और उदाहरण है। खबर आयी कि पाकिस्तानी सेना ने सियाचीन ग्लैशियर के कुछ हिस्से पर कब्जा जमा लिया है। 13 अप्रैल 1984 को भारतीय सेना ऑपरेशन मेघदूत के तहत बर्फ से ढके सियाचीन ग्लैसियर को कूच कर गई और पाकिस्तान की सेना को खदेड़ कर तिरंगा लहरा दिया।
अपनी जांबाज कदमों के निशान दूसरे देशों में छोड़ने से भारतीय सेना पीछे नहीं रही है। इंडियन पीस कीपिंग फोर्स (शांति सेना) ने ऑपरेशन पवन के तहत 11 अक्टूबर से 25 अक्टूबर 1987 तक सैन्य कार्रवाई कर श्रीलंका के जाफना से लिबरेशन टाईगर ऑफ तमिल ( तमिल टाईगर- लिट्टे) के विद्रोहियों का सफाया कर दिया। करीब 15 दिनों तक चले भीषण युद्ध में लिट्टे प्रमुख प्रभाकरन मारा गया. बता दें कि लाख कोशिशों के बाद भी श्रीलंका सरकार लिट्टे का खात्मा नहीं कर पा रही थी और तमिल टाईगर भारी पड़ते जा रहे थे लेकिन भारतीय सैनिकों ने अपना बलिदान देकर तमिल टाईगरों से श्रीलंका को मुक्ति दिला दी।
ऑपरेशन कैक्टस देश की सेनाओं का एक एेसा अभियान है जिसकी वीरगाथा सुनकर हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है. 1988 में एक व्यापारी अब्दुलाह लुथुफी ने लिबरेशन ऑफ तमिल ईलम के भाड़े के सैनिकों के बल पर मालदीव के राष्ट्रपति एमए गेयुम की सत्ता के सामने चुनौती खड़ी कर दी थी। तख्ता पलटने के डर से भयभीत राष्ट्रपति ने भारत से मदद मांगी। इसके बाद 3 नवंबर 1988 को वायु सेना व थल सेना व नेवी के बहादुरों ने मालदीव पहुंच कर विद्रोहियों का नामो निशान मिटा दिया।
इस अभियान में पैरासूट रेजीमेंट के सैनिकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आज से करीब 18 वर्ष पूर्व 1999 में पाकिस्तानी सैनिकों व आतंवादियों ने एक साथ भारतीय संप्रभुता को चुनौती देने की हिमाकत की थी। एलओसी को पार कर कश्मीर के कारगिल व ड्रास क्षेत्र में भारतीय चौकियों व टाईगर हिल, बटालिक चोटी पर आतंकियों व पाकिस्तानी सैनिकों ने कब्जा जमा लिया था। 3 मई 1999 को भेड़ चराने वाले एक क्षेत्रीय व्यक्ति ने कारगिल क्षेत्र में पाकिस्तानी सैनिकों को देखा और इसकी सूचना दी. इसके बाद भारतीय सेना हरकत में आ गई और 20 मई से भारत - पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध शुरू हो गया। ऊंची चोटियों पर दुश्मनों के मौजूद होने के बावजूद भी भारत की थल व वायु सेना ने अपने दिलेरी के दम पर दुश्मनों को धूल चटा दिया.ऑपरेशन विजय (1999) के नाम से मशहूर कारगिल युद्ध में 11 मई को महत्वपूर्ण बटालिक चोटी पर भारत की सेना का कब्जा हो गया। 2 जुलाई को टाईगर हिल के करीब स्थित दो चौकियों प्वॉइंट 5060 व 5100 पर सेना ने अपना अधिकार जमा लिया। 4 जुलाई को 11 घंटे के युद्ध में टाईगर हिल पर तिरंगा फहराने लगा।
मेजर विक्रम बत्रा, अर्जुन नायर व मनोज पांडेय ने अपनी महान शहादत देकर भारतीय सीमा से दुश्मनों को पीठ दिखाकर भागने के लिए विवश कर दिया। अंतत: 26 जुलाई को अाधिकारिक रूप से ऑपरेशन विजय 1999 के सफल होने की घोषणा कर दी गई। ऑपरेशन सागर के तहत वायु सेना ने कारगिल युद्ध की जीत में हर कदम पर सहयोग दिया. देश के बहादुर सैनिकों के इस जीत को तरोताजा रखने के लिए 26 जुलाई को देश विजय दिवस मनाता है।
26 नवंबर 2008 में मुम्बई आतंकी हमले के बाद नरीमन हाऊस, ताज व ओबेराय होटल में चारो तरफ मौत मुंह बाये खड़ी थी. परंतु इसकी परवाह किए बगैर एनएसजी कमांडोज ने ऑपरेशन टोरनाडो के तहत हेलीकॉप्टर से ताज, ओबेराय व नरीमन हाऊस की छतों पर उतर कर आतंकियों की गोलियों से 559 लोगों को बचा लिया. मेजर संदीप, उनीकृषनन व हवलदार गजेंद्र सिंह का महान बलिदान हमेशा याद किया जाएगा।
10 जूून को 2015 देश के जांबाज सैनिकों ने ऐसे अभियान को अंजाम दिया जिसे सूनकर हर देशवासी सैनिकों को नमन करने लगा. 4 जून 2015 को मनिपुर के चंदेल जिले में आतंकियों ने धोखे से हमारे 18 सैनिकों को मार दिया। इसके ठीक 6 दिन बाद देश के जवानों ने 10 जून को भारत - मम्यांर की एलओसी पर 158 आतंकियों को मार गिराया और उनके कैंपों को तबाह कर दिया।
सितंबर 2016 में भारतीय सेना द्वारा पाक अधिकृत कश्मीर में किया गया सर्जिकल स्ट्राईक आज भी हर भारतीय के जेहन में है। 28/29 सितंबर 2016 की रात में भारतीय सेना के पैरा कमांडोज एलओसी से करीब तीन किलोमीटर अंदर पाक अधिकृत कश्मीर में घूसकर छह आतंकी कैंप को नष्ट कर दिया यही नहीं कई आतंकवादियों व पाक सैनिकों को भी मौत के घाट उतार कर कमांडोज ने उन्हें दोजख में पहुंचा दिया।
यह ऑपरेशन बताते हैं कि बहादुर सैनिकों ने अपने अदम्य साहस व वीरता के बल पर देशवासियों का सिर हमेशा हिमालय जैसा ऊंचा रखा है। कारगिल युद्ध के विजय दिवस (1999) के अवसर पर हम देशवासी सेना के जवानों को नमन करते है और उन्हें याद कर अपना सिर झुकाते है जो अपना बलिदान देकर देश को सुरक्षित रखा है।