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सोशल मीडिया तक ही सिमट कर रह गया चुनाव प्रचार

आजकल वही नारे सोशल मीडिया तक सिमट कर रह गए हैं।

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lakhimpur

सोशल मीडिया तक ही सिमट कर रह गया चुनाव प्रचार

लखीमपुर खीरी. वैसे तो लोकसभा चुनाव की बयार हर ओर छाई हुई है। हर ओर सियासी मैदान है। बावजूद इसके चुनाव के दौरान लगने वाले नारों का शोर नहीं सुनाई दे रहा है।एक दौर वह भी था। जब नारे राजनीति की हवा को ही बदल देते थे। यह नारे ऐसे थे। जो चुनाव आते ही आम लोगो की जुबान पर चढ़ जाते थे। हर नारे का जिले की सियासत पर साफ असर दिखता था। लेकिन आजकल वही नारे सोशल मीडिया तक सिमट कर रह गए हैं।
खीरी हो या धौरहरा लोकसभा सीट दोनो ही सीटो पर प्रतियाशियो की घोषणा के बाद चुनावी जंग तेज हो गई है। अभी रेलिया शुरू नहीं हुई है। पर चुनाव दफ्तर खुलने लगे हैं। प्रचार भी तेजी से हो रहा है। प्रत्याशी और उनके समर्थक डोर टू डोर जाकर जनसंपर्क कर रहे है। पर इस प्रचार के दौरान चुनावी नारे लगा रहे थे। जैसे कि पहले विधानसभा के चुनाव में कम बोलता है, यूपी को यह सात पसंद है,जैसे नारे सुनाई देते थे। इस बार गठबंधन की ओर से कोई खास नारा नहीं लग रहा है। तो उधर भाजपा की ओर से एक बार फिर मोदी सरकार के नारे के साथ पब्लिक को जोड़ना शुरू किया गया है। सोशल मीडिया पर मैं भी चौकीदार सुनाई दे रहा है।

एक दौर में चुनाव आने के पहले यही नारे हवा बना देते थे। अगर हम बात करे तो आपातकाल के दौरान या नारा खूब गुंजा। जमीन गई चकबंदी में, मकान गया हदबंदी में, द्वार खड़ी औरत चिल्लाये मेरा मरद गया नसबंदी में। वही 60 के दशक में जनसंघ और कांग्रेस में नारो के जरिए खूब नोकझोंक होती थी। जन संघ का चुनाव चिन्ह दीपक था। जबकि कांग्रेस का चुनाव चिन्ह दो बैलों की जुड़ी थी। उस समय यह नारा खूब चला। जली झोपड़ी भागे बैल यहां देखो दीपक का खेल। इसके जवाब में कांग्रेस ने नारा दिया। दीपक में तेल नहीं सरकार बनाना खेल नहीं।

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