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ललितपुर

18वीं शताब्दी का ऐतिहासिक किला हो चला धरासाई, 1857 की क्रांति में था अतुल्य योगदान

- जनपद के कण-कण में इतिहास विद्यमान है। - प्राकृतिक छटा का अकूत भंडारण और यहां स्थित प्राचीन विरासतें जिन पर बनी आकर्षक कलाकृतियां इसे और अधिक महत्वपूर्ण बनाती हैं।

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ललितपुर. जनपद के कण-कण में इतिहास विद्यमान है। प्राकृतिक छटा का अकूत भंडारण और यहां स्थित प्राचीन विरासतें जिन पर बनी आकर्षक कलाकृतियां इसे और अधिक महत्वपूर्ण बनाती हैं। जो कि अपनी गौरवशाली गाथा को खुद बयां करती हैं। किन्तु पुरातत्व विभाग एवं स्थानीय प्रशासन की उपेक्षा के चलते पुरातन विरासतें अपनी पहचान खोती जा रही हैं।


प्रदेश के अंतिम छोर पर विध्याचल पर्वत की सुरम्य वादियों के मध्य, जनपद मुख्यालय ललितपुर से दक्षिण दिशा में करीब 70 किलोमीटर दूर, तहसील क्षेत्र मड़ावरा का सौंरई गांव जहां लगभग 18वी शताब्दी में मराठा शासनकाल के दौरान किले का निर्माण मोराजी के द्वारा कराया गया था और कुछ समय बाद शाहगढ़ इस्टेट के राजा बखतवली सिंह जिनको तालबेहट के राजा मर्दनसिंह की ममेरी बहन ब्याही थी। उन्होंने मराठों से एक युद्ध में हुई संधि के बाद सौंरई पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। उन दिनों अपने गौरवशाली समय में सौंरई एक सम्पन्न रियासत रही। जिसे राजा की बैठक का मुख्य गढ़ माना जाता था। किन्तु समय के साथ यहां सब बीरान तब हुआ जब अंग्रेजी सेना से विद्रोह के चलते राजा युद्ध में शहीद और रानी ने कुँआ में कूंदकर आत्मदाह कर लिया। 1857 की क्रांति में सौंरई नरेश महाराजा बखत सिंह का अतुल्य योगदान रहा। बर्तमान में किले के अंदर प्रवेश के दो मुख्य मार्ग हैं, जिनमें एक को सैन्य पूर्वी प्रवेश द्वार और दूसरे को पश्चमी हाथी दरवाजा के नाम से जाना जाता है। किले की बाह्य संरचना अत्यंत मनोहारी है। और यहां बनी अलग-अलग छह गुम्मटें आकर्षण का केंद्र मानी है, जिनमें चार को कमल बुर्ज के नाम से इसलिए जाना जाता है क्योंकि इनकी कलाकृति कमल की पंखुड़ियों के आकार में ढली हुई है। जिनके अंदर भी बेहतरीन नक्काशी, कलाकृतियों का सृजन किया गया। यहां का अनूठा नजारा नयनों अपार संतुष्ति प्रदान करता है।


बाहरी भाग में एक है अन्तकुंआ

किवदंतियों के अनुशार यह कुँआ किला निर्माण के दौरान बनाया गया था। जिसके गुप्त मार्ग से होकर रानी स्नान करने बावड़ी तक पहुंचा करती थीं। जहां बड़े-बड़े स्नानगृह अब भी मौजूद हैं। इसके अलावा राजा बखत बली सिंह इसी अंदरखाने के मध्य से अपनी पड़ोसी विरासत मड़ावरा तक पहुंचा करते थे। जो लगभग कई किलोमीटर की लंबी सुरंग रही।


किला से कुछ दूरी पर एक प्राचीन शिलाओं का बांध बना हुआ था जो अब छिन्न-भिन्न हो चुका है। लेकिन बांध की शिलाएं अब तक उस इतिहास की गौरवगाथा बयां करते दिखती हैं। किला परिसर के बीचोंबीच एक बड़ी अट्टालिका बनी थी लेकिन देखरेख के आभाव में बो अब जमींदोज हो चुकी। किला के बाह्य भाग में स्थित एक प्राचीन मंदिर उस समय रहे मंत्री ने बिशेष पूजा-अर्चना हेतू बनवाया था, जिसकी मूलबेदी पर अपठित भाषा में कुछ शब्दावली देखी जा सकती है। रोचक बात यह है कि फिलहाल में इस मंदिर की दैवीय मूर्तियों का कोई अता पता नहीं है। बीते समय यहां गांव के लोगों द्वारा एक बिद्यालय संचालित किया गया। लेकिन सुबिधानुशार पर्याप्त जगह न होने के चलते जिसे बन्द हो गया। तमाम बदहाली के बाद अभी भी यह किला बेहतरीन नक्काशी और यहां छिपे पुरतनी अवशेषों के लिए जाना जाता है। जिसे सुरक्षित रखने के लिए सुरक्षागार्डों तथा सफाईकर्मी की तैनाती आवश्यक है।


गहरी खाई पर बसी घनी बस्ती
ग्रामीण बताते है कि सुरक्षा लिहाज से पहले किला के बाहर चहूँ ओर एक गहरी खाई हुआ करती थी। जिसे आसानी से पार नहीं किया जा सकता था लेकिन बाद में जैसे जैसे किला बीरान हुआ तो लोगों ने इसका समतलीकरण करके यहां बस्ती बसा ली।


आज भी मिलते हैं अवशेष

लोग बताते हैं कि बर्तमान में मकान निर्माण के लिए नींव या अन्य किसी कार्य से जब जमीन को खोदा जाता है तो अभी भी पुरातनी अवशेष निकलते हैं। जिनसे इतिहास की गौरव गाथा का अनुमान लगाया जा सकता है।


पदम चन्द्र जैन(स्थानीय निवासी) का कहना है कि यह किला अतिप्राचीन धरोहर है। जिसे सहेजने के लिए प्रशासन और पुरातत्व विभाग को खास इंतजाम करने चाहिए। नियमित देखरेख के आभाव में किला बदहाल होता जा रहा है। इसके संरक्षण के लिए सुरक्षा गार्ड की तैनाती अतिआवश्यक है। साफ-सफाई के नाम पर लाखों रुपये पानी की तरह बहाया गया। इसके बाबजूद सूरतेहाल जस के तस बने हुए हैं।