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कभी 18 रुपए में धोते थे कैंटीन में बर्तन, आज 60 से ज्यादा रेस्त्रां के हैं मालिक

इन शख्स का नाम है जयराम बानन। इनका जन्‍म मंगलौर (कर्नाटक) के पास स्थित 'उडुपी' में हुआ था। उनके पिता ड्राइवर थे और बहुत ही गुस्‍सैल स्‍वभाव के थे।

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Saurabh Sharma

Jun 13, 2018

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कभी 18 रुपए में धोते थे कैंटीन में बर्तन, आज 60 से ज्यादा रेस्त्रां के हैं मालिक

नई दिल्‍ली। जिंदगी किस्मत को कैसे बदल देती है, उसका जीता जागता उदाहरण एक एेसे शख्स को देखकर लगता है जो कभी मात्र 18 रुपए की नौकरी में ढाबे पर बर्तन धोता था। लेकिन कभी हार ना मानने वाले रवैये आैर कड़ी मेहनत ने आज उन्हें देश आैर विदेशों में 60 से ज्यादा रेस्त्रां का मालिक बना दिया है। अाइए आपको भी बताते हैं इस शख्स के बारे में आैर उसकी जिंदगी के बारे में…

सागर रत्ना के मालिक हैं जयराम बानन
इन शख्स का नाम है जयराम बानन। इनका जन्‍म मंगलौर (कर्नाटक) के पास स्थित 'उडुपी' में हुआ था। उनके पिता ड्राइवर थे और बहुत ही गुस्‍सैल स्‍वभाव के थे। जब जयराम बानन स्‍कूल एग्जाम में फेल हो गए तो पिता से पिटने की डर से 13 साल में ही घर से भाग गए। घर से भागने के लिए उन्होंने अपने पिता के पॉकेट से कुछ पैसे निकाले और मंगलौर से मुंबई जाने वाली बस में सवार हो गए। बानन 1967 में बॉम्बे पहुंच गए।

ढाबे में 18 रुपए में धोते थे बर्तन
काफी जूते घिसने के बाद जब कोर्इ नौकरी नहीं मिली तो उन्होंने कैंटीन में बर्तन धौने की नौकरी मिली। जिसके लिए उन्हें प्रति माह मिलती थी। जयराम ने प्‍लेट धोने और टेबल साफ करने का काम छह साल तक किया। प्‍लेट धोने के लिए सोडा का इस्‍तेमाल होता था,‍ जिससे इनका हाथ बुरी तरह से खराब हो गया था। इसके बावजूद बानन अपने काम में डटे रहे।

दिल्ली से शुरू हुआ सफलता कर सफर
उडुपी समुदाय से ताल्‍लुक रखने वाले जयराम कुछ अपना काम शुरू करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने साउथ इंडियन खाना बनाने के बारे में सोचा। लेकिन मुंबई में मसाला-डोसा के सारे प्रतिद्वंदी होने के कारण वो दिल्ली आ गए। 1973 में दिल्ली पहुंचे जयराम अपने भार्इ के पास गए जो एक उडुपी रेस्‍टोरेंट में काम करता था। जिसके बाद उन्होंने 1974 सेंट्रल इलेक्ट्रॉनिक्‍स की कैंटीन का टेंडर लिया।

एेसे शुरू हुआ पहला रेस्त्रां
जयराम बानन ने 1986 में 5 हजार रुपए की सेविंग की और दोस्‍तों-रिश्तेदारों से लोन लेकर डिफेंस कॉलोनी में सागर नाम से पहला रेस्त्रां आेपन किया। जिसका रेंट एक सप्‍ताह का 3,250 रुपए था। इसमें 40 लोगों के बैठने की व्यवस्था थी। जिसमें पहले दिन 408 रुपए की कमार्इ हुई थी। शुरुआती दिन काफी कठिनार्इ भरे रहे। उसके बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी आैर अपने खाने के सामान की कीमत एक हलवार्इ की एक दुकान के बराबर रखी।

सागर रत्ना ब्रांड की एेसे हुर्इ शुरुआत
दिल्‍ली के लोग दक्षिण भारतीय डिश खाने के लिए वुडलैंड और दसप्रकासा रेस्‍त्रां में जाते थे। बानन को वुडलैंड रेस्‍त्रां लेने का मन बनाया। इस रेस्‍त्रां को रेंट में लेने के लिए बानन को 34 लोगों से लोहा लेना पड़ा था। बानन वुडलैंड का नाम बदलकर सागर रत्‍ना रखा। जिसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज दिल्‍ली में ही इसके 30 से अधिक रेस्त्रां हैं। उत्‍तर भारत में इसकी संख्या 60 से अधिक पहुंच चुकी है। कनाडा, सिंगापुर, बैंकॉक जैसे देशों में भी इनके आउटलेट्स हैं।