
जिस कैंटीन में जयराम बर्तन धोते थे, उनको 18 रुपये का मेहनताना मिलता था (PC: Sagar Ratna/AI)
1967 की बात है, स्कूल की एक परीक्षा में फेल होने के बाद अपने पिता की मार से बचने के लिए एक 13 साल का लड़का पिता के ही वॉलेट से पैसे चुराकर मुंबई जाने वाली बस में चढ़ जाता है। ये वो दौर था जब उडुपी लोगों का कामकाज की तलाश और किस्मत आजमाने के लिए मुंबई जाना सामान्य बात थी। ये लड़का भी अपनी किस्मत आजमाने आया था। शुरू में इसने एक छोटी सी कैंटीन में बर्तन धोने वाले का काम किया। लेकिन उसके सपने बड़े थे। कुछ साल के बाद इस लड़के ने एक रेस्टोरेंट चेन की शुरुआत की, जिसके आज 175 से भी ज्यादा आउटलेट्स हैं, और सालाना कमाई 300 करोड़ रुपये से भी ज्यादा है। उस लड़के का नाम है, जयराम बानन, जो सागर रत्ना रेस्टोरेंट के मालिक हैं। जयराम की कहानी किसी फिल्म के हीरो से कम नहीं है।
जिस कैंटीन में जयराम बर्तन धोते थे, उनको 18 रुपये का मेहनताना मिलता था। मगर, जयराम अपनी मेहनत से उसी रेस्टोरेंट में मैनेजर बने। इस दौरान उन्होंने रेस्टोरेंट बिजनेस को अच्छी तरह से सीखा। जयराम का सपना था कि वो अपना रेस्टोरेंट खोलें, लेकिन मुंबई के मार्केट के बारे में वो एक बात बहुत जल्दी समझ गए कि यहां पर अगर वो रेस्टोरेंट बिजनेस करेंगे तो ज्यादा कामयाब नहीं हो पाएंगे, क्योंकि मुंबई का बाजार पहले से ही उडुपी लोगों के रेस्टोरेंट से पटा पड़ा है। इसलिए उन्होंने दूसरे शहरों की तलाश शुरू की। अंत में उन्होंने दिल्ली की ओर कूच किया। दिल्ली में लोगों को असली डोसा, इडली के नाम पर परोसने वाले कुछ चलताऊ टाइप के रेस्टोरेंट्स ही थे। ऑथेंटिक डोसा, इडली के लिए लोधी होटल में वुडलैंड्स या अंबेसडर में दासप्रकाश का नाम काफी था, लेकिन ये काफी महंगे रेस्टोरेंट्स थे। जयराम को यहीं पर बिजनेस का मौका दिखा। वुडलैंड्ल की क्वालिटी वाला डोसा, सस्ती कीमत पर बेचकर वो अपना बिजनेस कर सकते थे.
जयराम 1974 में दिल्ली आए थे. उन्हें दिल्ली से सटे गाजियाबाद में सेंट्रल इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (CEL) में कैंटीन चलाने का टेंडर मिला. फिर, 4 दिसंबर 1986 को उन्होंने डिफेंस कॉलोनी मार्केट में पहला रेस्टोरेंट खोला, नाम रखा 'सागर'। रेस्टोरेंट तुरंत ही सुपरहिट हो गया। पहले ही दिन जयराम को 408 रुपये की कमाई हुई, जो कि उस समय के हिसाब से काफी ज्यादा थी। जैसे-जैसे पैसे जमा होते गए जयराम नई ब्रांचेस के लिए लोकेशन तलाशने लगे।
उनके हाथ सबसे बड़ी सफलता तब आई जब उन्हें लोधी होटल में वुडलैंड्स की जगह लेने के लिए कहा गया। उन्होंने एक नया ब्रांड बनाया सागर रत्ना, यहां उन्होंने अपने मेन्यू में कीमत 20% बढ़ा दी। उनके रेस्टोरेंट ने वुडलैंड्स से भी ज्यादा कामयाबी हासिल की। नब्बे का दशक सागर के नाम था, लोग उनके रेस्टोरेंट्स के बाहर लाइन लगाकर इंतजार करते। रोजाना कम से कम 2,000 कस्टमर्स खाना खाते थे। दिल्ली भर में नए सागर खुलते गए, अशोक होटल में भी एक सागर रत्ना खुला।
जयराम यहीं नहीं रुके, देखा कि मुंबई में लोग त्रिश्ना और महेश लंच होम जैसे रेस्टोरेंट्स के दीवाने हैं। इनमें से कई के मालिक उडुपी के थे लेकिन वे स्पाइसी कोस्टल कुजीन सर्व करते थे जो अक्सर सीफूड पर आधारित होती थीं। जयराम ने तुरंत इसी कुजीन को दिल्ली में शुरू कर दिया। साल 2001 में 'स्वागत' नाम के एक नए ब्रांड को लॉन्च किया।
आज सागर रत्ना सफलता का प्रतीक है, जिसके अंतरराष्ट्रीय आउटलेट कनाडा, सिंगापुर और बैंकॉक जैसे देशों में हैं। आज सागर रत्ना के भारत में 175 से ज्यादा आउटलेट्स हैं। हर साल 5 करोड़ कस्टमर यहां खाना खाते हैं। हर सफल व्यक्ति के पीछे कुछ करने का जुनून सबसे बड़ा फैक्टर होता है। जयराम की कामयाबी भी उससे अलग नहीं है। उन्हें 'नॉर्थ का डोसा किंग' कहा जाता है।
Published on:
08 Jan 2026 11:16 am
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