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यह पॉकेट स्कैनर बताएगा खाना खराब है या नहीं

इन्फ्रारेड किरणों के जरिए खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता के बारे में देता है जानकारी, संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संघ के अनुसार, दुनिया में उत्पादित खाद्य पदार्थों का एक तिहाई हिस्सा खाने लायक न मानकर फेंक दिया जाता है। यह करीब 13 खरब किलोग्राम (1.3 बिलियन टन) खाद्य सामग्री होती है।

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जयपुर

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Mohmad Imran

Dec 06, 2020

यह पॉकेट स्कैनर बताएगा खाना खराब है या नहीं

यह पॉकेट स्कैनर बताएगा खाना खराब है या नहीं

हर साल दुनिया भर में लाखों टन खाने लायक भोजन, फल और सब्जियां सिर्फ इसलिए फेंक दिए जाते हैं कि हम उन्हें मान लेते हैं। अक्सर बाजार से लाई हुई सब्जी और फल की ताजगी का अंदाजा लगा पाना मुश्किल होता है। इस परेशानी का हल ढूंढ रहे हैं जर्मनी के कुछ अनुसंधानकर्ता। फ्रॉनहोफर अनुसंधान संगठन के शोधकर्ता एक इन्फ्रारेड पॉकेट स्कैनर विकसित कर रहे हैं, जो उपभोक्ताओं, सुपरमार्केट और खाद्य वस्तुओं का व्यापार करने वाले लोगों को यह सुनिश्चित करने में मदद करेगा कि कोई खाद्य पदार्थ खराब है या नहीं।

अरबों टन सामग्री होती खराब
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संघ के अनुसार, हर साल दुनिया में उत्पादित खाने का एक तिहाई हिस्सा खाने लायक न मानकर फेंक दिया जाता है। यह खाद्य सामग्री लगभग 13 खरब किलोग्राम (1.3 बिलियन टन) सालाना है। विकसित देश जहां सबसे ज्यादा कचरे का उत्सर्जन होता है वहां खाने की बर्बादी भी ज्यादा है।

कई कारण है इसके
इस अपव्यय का एक बड़ा कारक है कि लोग आमतौर पर यह नहीं समझ पाते कि कोई खाद्य पदार्थ अब भी खाने लायक है या नहीं। अगर देखने में कोई खाद्य वस्तु अच्छी नजर नहीं आ रही तो इसका मतलब यह नहीं कि वह खराब हो गई है। लोग बेचने (सेल बाय डेट) और उपयोग करने (यूज बाय डेट) में भी भ्रमित हो जाते हैं।

कैसे काम करता है
यह पॉकेट स्कैनर एक सटीक इन्फ्रारेड सेंसर पर आधारित है। इन्फ्रारेड किरणों के खाद्य पदार्थों पर डालते ही यह प्रतिबिंबित प्रकाश इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रम में मापा जाता है। ताजा भोजन से अवशोषित स्पेक्ट्रम से तुलना करके उपकरण यह निर्धारित कर सकता है कि भोजन अभी भी खाने लायक है या नहीं।

अभी शुरुआती चरण
फ्रॉनहोफर के अनुसार, स्कैनर अभी शुरुआती चरण में है। फिलहाल यह केवल कच्चे खाद्य पदार्थों को ही स्कैन कर सकता है। शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि वे जल्द ही हाइपर-स्पेक्ट्रल इमेजिंग और रंग को पहचानने वाले सेंसर के जरिए इसमें सुधार कर लेंगे। शोधकर्ता मशीन लर्निंग एल्गोरिद्म भी बना रहे हैं।