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क्या वाकई अब हम रोबोटिक हो चले हैं, रिश्तों में कम हो रही है प्यार की गर्माहट!

Why romance is fading in marriages: आजकल की लाइफ में रोमांस की जगह धीरे-धीरे कम होती जा रही है। कई रिलेशनशिप काउंसलर्स भी इस बदलाव को महसूस कर रहे हैं।

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Modern relationships losing intimacy

बड़े पर्दे पर नजर आने वाला रोमांस असल जिंदगी में कुछ फीका पड़ रहा है। एक साथ, एक छत के नीचे रहने वाले अधिकांश लोग तन-मन से एक नहीं हैं। समय के साथ सोच और नजरिए में बदलाव सामान्य है, लेकिन लाइफ से इंटीमेसी और रोमांस का दूर होना अच्छे संकेत नहीं हैं। क्योंकि रोमांस को मनुष्य के जीवन में स्ट्रेस बस्टर के तौर पर भी देखा जाता है। इस बदलाव के कई कारण हो सकते हैं। मसलन, प्रोफेशनल लाइफ का पर्सनल लाइफ पर हावी होना, स्ट्रेस का कॉमन समस्या बनना और लाइफस्टाइल चेंज। इसके अलावा 'एज शिफ्ट' भी एक बड़ा कारण है। पहले रोमांस जैसे विचार अमूमन एडल्ट होने के बाद ही आकार लेते थे, इसलिए रिश्तों में गर्माहट देर तक बनी रहती थी। लेकिन अब देर से आने वाली समझ जल्दी आ रही है। रोमांस का फूल जल्दी खिलता है और एक मैच्योर उम्र तक आते-आते सैचुरेशन होने लगता है।

भारत ही नहीं, अमेरिका में भी यही हाल

यह समस्या केवल भारत तक ही सीमित नहीं है। हमसे कई गुना आधुनिक माना जाने वाला अमेरिका भी इस बदलाव को महसूस कर रहा है। इंस्टिट्यूट ऑफ फैमिली स्टडीज (IFS) की एक रिपोर्ट बताती है कि 1990 के दौर में जहां 18 से 64 की उम्र वाले 55% वयस्क सप्ताह में एक बार इंटीमेट होते थे। वहीं, 2010 में यह आंकड़ा घटकर 46% और 2024 में गिरकर 37% रह गया। रिश्तों में कम होती गर्माहट केवल शादीशुदा ही नहीं यंग कपल्स में भी देखने को मिल रही है। रिपोर्ट बताती है कि डिजिटल दुनिया के आगमन ने रोमांस को प्रभावित किया है। सामाजिक मेलजोल सिमट रहे हैं और लोगों ने खुद को डिजिटल दुनिया में कैद कर लिया है। जहां पहले बेड टाइम में भावनाओं का आदान-प्रदान होता था। अब वो जगह नेटफलिक्स जैसे OTT प्लेटफॉर्म ने हथिया ली है।

स्थिति वाकई कुछ ऐसी हो चली है, जो हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या वाकई हम रोबोटिक हो रहे हैं? अपने आसपास ही देखें तो कई लोग ऐसे मिल जाएंगे, जो जाने-अनजाने ऐसी ही सिचुएशन से गुजर रहे हैं। कई रिलेशनशिप काउंसलर्स भी इस बदलाव को महसूस कर रहे हैं। उनका मानना है कि आज के वक्त में हम रोबोटिक बिहेवियर में जी रहे हैं, जहां वर्क प्रेशर और स्ट्रेस के चलते हमें काम से इतर सोचने का ज्यादा वक्त नहीं मिलता।

वेस्टर्न कल्चर का भी है योगदान

रिलेशनशिप काउंसलर डॉ. अनिल सेठी बताते हैं कि जिस तरह से यंगस्टर्स में अल्कोहोल का चलन बढ़ा है, उससे उनकी लाइफस्टाइल चेंज हुई है और वे अब अल्कोहोल कज्यूमिंग को स्ट्रेस बस्टर के तौर पर देखने लगे हैं। वे एक उदाहरण देते हुए कहते हैं कि पिछले हफ्ते ही मैंने ऐसे तीन यंगस्टर्स की काउंसलिंग की,जो अब लेट 30s में शादी कर रहे हैं और उनका ऑब्जेक्टिव अपनी वेल्थ को संभालने के लिए फैमिली क्रिएशन का है। डॉ. सेठी कहते हैं कि वेस्टर्न कल्चर में प्लेजर और रोमांस खूब रहा है और उन्हीं की देखादेखी हमारे यहां भी टीनएज में ही युवा इसमें शामिल हो रहे हैं। लिहाजा, मैं इसे दूसरे नजरिए से देखता हूं, मैं इसे एक तरह से एज शिफ्ट मानता हूं। आज यंगस्टर्स 15 की उम्र से ऐसी एक्विटीज में इन्वॉल्व हो जाते हैं, जो नब्बे के दशक में 22 से 25 के करीब होते थे। बतौर रिलेशनशिप काउंसलर मैं इतना जरूर कह सकता हूं कि अब हमारी सोसाइटी में एक्स्ट्रा मैरिटेरियल अफेयर काफी बढ़ रहे हैं, ऐसा इसलिए भी है क्योंकि अब रिलेशनशिप को टैबू नहीं माना जाता। पार्टनर्स इसको गिल्ट के तौर पर भी नहीं देखते। ऐसे में कई बार दोनों पार्टनर्स अलग-अलग भी इन्वॉल्व हो जाते हैं।

ईटिंग हैबिट से बिगड़ रही पर्सनल लाइफ

वहीं, डाइटिशियन रेणुका डंग यंगस्टर्स में आ रह इस बदलाव को उनकी ईटिंग हैबिट से भी जोड़कर देखती हैं। वो कहती हैं कि आज दोनों पार्टनर प्रोफेशनली काम करते हैं और ऐसे में ईटिंग और कुकिंग हैबिट बहुत चेंज हुई है। जोमैटो, स्विगी के इस दौर में लोग इन दोनों आदतों में टाइम इंवेस्ट नहीं करना चाहते हैं। ऐसे में टेक बेस्ड सुपरफूड ज्यादा कंज्यूम हो रहा है। फैंसी फूड ने हमारे टेस्ट बड्स को भी बदल दिया है और इसका सीधा असर हमारी पर्सनल लाइफ पर पड़ रहा है। यहां यह उल्लेख करना भी जरूरी है कि इस मॉर्डन कल्चर में विदइन द स्पाउस प्लेजर कम दिख सकता है, पर जिस तरह का ये नया समाज बन रहा है तो लोग बियॉन्ड मैरिज भी इन्वॉल्व हो रहे हैं, इस तरह के कई केस देखे गए हैं।

बदल रही है युवाओं की अप्रोच

हेल्थ यूट्यूबर पूजा मक्कड़ इस विषय को दूसरे नजरिए से देखती हैं। उनका मानना है कि बदलती अप्रोच और कई मसलों पर परिजनों की स्वीकृति के चलते भी आज का युवा अडल्ट होने से पहले ही प्लेजर में इन्वॉल्व हो जाता है, ऐसे में उसके मन में शादी के बाद का वैसा क्रेज नहीं होता, जैसा हमारे जमाने में होता था।

कम हो रहा इमोशंस पर इंवेस्ट

डॉ. सलोनी सिंह बघेल कहती हैं कि आज सभी की सफलता का पैमाना बेस्ट परफॉर्मेंस है तो ऐसे में अब पूरी एनर्जी पर्सनल लाइफ के बजाए प्रफेशनल लाइफ पर लगती है और उसके ही परिणामस्वरूप ऐसा हो रहा है। खासकर, पोस्ट कोविड के बाद लोगों ने इमोशंस पर इंवेस्ट करना कम किया है और वे इमोशनली रिजर्व्ड हुए हैं, जिसके चलते पार्टनर के साथ भी उनका एंगेजमेंट टाइम कम हुआ है। रोमांस को समय चाहिए पर प्लेजर एक राइट स्वाइप पे मिल जाता है। हमने एक धारणा बना ली है कि एक सुखी जीवन के लिए पैसे चाहिए और पैसे तो काम करके आते हैं तो प्रोफेशनल फ्रंट पर अपना पूरा 100% देने के बाद इंसान घर पर इमोशनली 0% अवेलेबल होता है। खुद को शॉर्ट टर्म प्लेज़र्स चाहे वह कुछ देख कर या कुछ खरीदकर मिले, वे इस शॉर्टकट तरीके को अब ज़्यादा प्रेफर करते हैं। इसलिए अब अधिकांश लोग ऑटोमैटिक मोड पर चलते हैं।

आजकल युवा एडवेंचर्स हो गए हैं

साहित्याकार जयंती रंगनाथन स्पष्ट तौर पर कहती हैं कि शादीशुदा लाइफ में प्लेजर टाइमिंग कम हुई है, पर लिव-इन से लेकर सिचुएशनशिप और डेटिंग ऐप्स ने इसको नया आयाम दिया है। वे मानती हैं कि 30 से अधिक उम्र के लोगों में ये ट्रेंड कम हुआ है। आजकल टीनएज में ही एक्सपोजर बहुत मिल गया है। कॉलेज लाइफ में ही अधिकर युवा एडवेंचर्स हो गए हैं। वे कहती हैं कि इसी वजह से मिडिल एज में अब सब सस्टेनिबिलिटी पर ज्यादा फोकस रखने लगे हैं, पर ये बात समझनी होगी कि अब इंडियन फैमिली सूरज बड़जात्या की 'हम साथ-साथ हैं' टाइप वाली नहीं है, जहां सब आदर्शवादी रिश्तों को निभा रहे थे।