
Khadi Politics in India (photo- gemini ai)
Khadi Politics in India: 26 जनवरी, यानी गणतंत्र दिवस, हमें सिर्फ संविधान की याद नहीं दिलाता बल्कि उन मूल्यों की भी याद दिलाता है जिन पर भारत खड़ा है। उन मूल्यों की कई पहचान हैं। उनमें से एक खादी भी है। महात्मा गांधी के लिए खादी केवल पहनने का कपड़ा नहीं थी, बल्कि स्वराज, आत्मनिर्भरता और नैतिक राजनीति का मजबूत हथियार थी। चरखे के जरिये खादी ने आम लोगों को आजादी की लड़ाई से जोड़ा और विदेशी कपड़ों के बहिष्कार को जन-आंदोलन बना दिया।
'वेस्टलैंड' से प्रकाशित अपनी किताब 'स्टोरीज़ वी वियर' में शेफाली लिखती हैं की जो खादी कभी स्वतंत्रता संग्राम की पहचान थी, आज वह एक बड़े बदलाव से गुजर रही है। पिछले दस सालों में खादी का रूप काफी बदल गया है। कुछ लोग इसे खादी का पुनर्जागरण कहते हैं, तो कुछ आलोचक इसे खादी का मोदी-फिकेशन ((Modi-fication) मानते हैं। यानी खादी अब सिर्फ विचार नहीं, बल्कि सत्ता, बाजार और ब्रांडिंग का हिस्सा बनती जा रही है।
बापू से ब्रांडिंग तक (Bapu to Branding) खादी अब केवल एक वस्त्र नहीं, बल्कि एक फैशन स्टेटमेंट बन गई है। 2014 के बाद से खादी और ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) ने इसे खादी इंडिया के रूप में रिब्रांड किया है। इसके नतीजे भी दिखे हैं, 2014 से 2024 के बीच खादी के उत्पादन में 295% की वृद्धि हुई और बिक्री में 500% का भारी उछाल आया। विनय कुमार सक्सेना (तत्कालीन KVIC अध्यक्ष) ने रेलवे और ओएनजीसी (ONGC) जैसे सरकारी संस्थानों में खादी को अनिवार्य बनाकर इसकी मांग बढ़ाई।
खादी की इस नई पहचान के साथ विवाद भी आए। 2017 में KVIC के कैलेंडर पर गांधी जी की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चरखा चलाते हुए तस्वीर छपी। गांधी जी के प्रपौत्र तुषार गांधी ने इसे सिर्फ एक फोटो-ऑप बताया, जबकि समर्थकों का कहना था कि पीएम मोदी से जुड़ाव के कारण खादी की बिक्री बढ़ी है। यहीं से खादी एक कपड़े से आगे बढ़कर राजनीतिक बहस का मुद्दा बन गई।
खादी को फैशनेबल बनाने के लिए रितु बेरी जैसे डिजाइनरों को जोड़ा गया। लेकिन इससे कई पारंपरिक खादी विशेषज्ञ खुद को हाशिये पर महसूस करने लगे। आलोचकों का मानना है कि ज्यादा मुनाफे और बड़े उत्पादन के दबाव में खादी धीरे-धीरे मशीनीकरण की ओर बढ़ रही है, जो गांधी के विचारों के खिलाफ है। खादी अब नैतिक आंदोलन से ज्यादा एक मटेरियल हेरिटेज बनती दिख रही है।
2025 में स्पिनरों की मजदूरी में 20% बढ़ोतरी की गई, लेकिन हालात अब भी मुश्किल हैं। अगर कोई बुनकर महीने के हर दिन काम करें। जो लगभग असंभव है तो भी उसकी कमाई करीब 13,500 रुपए ही हो पाती है। वहीं दूसरी ओर, बाजार में प्योर खादी के नाम पर बिकने वाले डिजाइनर कपड़ों की कीमत 18,000 रुपए से 45,000 रुपए तक होती है। यानी हजारों की खादी बनाने वाला कारीगर उस कीमत का एक छोटा हिस्सा भी नहीं कमा पाता।
खादी का बाजार जरूर बढ़ा है, लेकिन उसका फायदा अब भी नीचे तक पूरी तरह नहीं पहुंचा है। इस गणतंत्र दिवस पर सवाल यही है। क्या खादी सिर्फ ब्रांड बनकर रह जाएगी, या फिर वह फिर से स्वावलंबन और समानता का प्रतीक बन पाएगी?
Updated on:
31 Jan 2026 07:12 pm
Published on:
26 Jan 2026 12:01 pm
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