
Nature & Childhood,
अविका अग्रवाल, उम्र- 13 साल
इस तस्वीर में एक मां और उसकी छोटी बेटी का प्यारा रिश्ता दिखाया गया है। आसमान में सूरज चमक रहा है, जिससे पता चलता है कि यह एक बहुत ही अच्छी सुबह या दोपहर का समय है। मां मुस्कुराते हुए नीले रंग की साइकिल चला रही है। उसकी साइकिल के आगे एक टोकरी लगी है जिसमें सुंदर फूल रखे हैं। उसकी छोटी बेटी पीछे लगी एक सुरक्षित सीट पर बैठी है और उसने अपनी मां को पीछे से पकड़ा हुआ है। रास्ते के किनारे एक गमले में सुंदर लाल फूल खिले हैं और चारों तरफ हरी-भरी घास दिख रही है। हवा में छोटे-छोटे दिल बने हैं, जो मां और बेटी के बीच के गहरे प्यार और खुशी को दिखाते हैं। यह पूरा नजारा बहुत ही शांति से भरा, सुखद और प्यार भरा है।
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गुरजस सिंह, उम्र- 12 साल
सुबह की पहली किरण जब धरती पर पड़ती है, तो वह अपने साथ केवल उजाला ही नहीं, बल्कि नए सपने और नई उम्मीदें भी लेकर आती है। एक ऐसी ही सुनहरी और खिली हुई सुबह, मीनू और उसकी मां अपने दिन की शुरुआत एक अनोखे सफर से कर रही थीं। मीनू के पैर बचपन से ही थोड़े कमजोर थे, जिसके कारण वह बाकी बच्चों की तरह दौड़-भाग नहीं पाती थी। लेकिन उसकी मां ने कभी भी मीनू की हिम्मत को कमजोर नहीं होने दिया। मां ने अपनी साइकिल के पीछे एक खास और सुरक्षित सीट बनवाई थी, जिस पर प्यार का एक बड़ा सा 'दिल' छपा हुआ था। जब भी मीनू उदास होती, मां उसे अपनी नीली साइकिल पर बिठाकर दुनिया की सैर पर निकल पड़ती। आज भी जैसे ही साइकिल ने रफ्तार पकड़ी, मीनू के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गई। साइकिल के आगे लगी टोकरी में रखे ताजे फूल हवा में अपनी खुशबू फैला रहे थे, मानो वे भी मीनू के स्वागत में खुशी से झूम रहे हों। रास्ते के किनारे खिले रंग-बिरंगे फूल और हल्की धूप उनके इस सफर को और भी मजेदार बना रहे थे। मां बड़े प्यार से पैडल मार रही थी और मीनू पीछे बैठी हवा के झोंकों को अपने हाथों में समेटने की कोशिश कर रही थी। उसे महसूस हो रहा था कि भले ही उसके पैर काम नहीं करते, लेकिन अपनी मां के साथ वह आसमान में उड़ रही है। यह सिर्फ एक सुबह की सैर नहीं थी, बल्कि मां के निःस्वार्थ प्यार और एक बेटी के कभी हार न मानने वाले जज्बे की खूबसूरत कहानी थी। मीनू को पता था कि जब तक मां का हाथ उसके साथ है, वह जीवन की हर मुश्किल राह को हंसते-हंसते पार कर लेगी।
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स्नेहा,उम्र- 9 साल
गर्मियों की छुट्टियां थीं। स्नेहा रोज मम्मी से जिद करती थी, "मम्मी मुझे साइकिल चलाना सिखाओ ना।" मम्मी हंसकर कहती, "बेटा अभी तुम छोटी हो।" एक दिन रविवार की सुबह सूरज निकला तो बहुत सुंदर लग रहा था। मम्मी ने कहा, "चलो आज पार्क चलते हैं।" स्नेहा खुशी से उछल पड़ी। मम्मी ने नीली साइकिल निकाली। साइकिल की टोकरी में सुंदर फूल लगे थे। मम्मी ने स्नेहा को पीछे वाली सीट पर बिठाया और खुद चलाने लगी। स्नेहा ने मम्मी को कसकर पकड़ लिया और बोली, "मम्मी डर लग रहा है।" मम्मी मुस्कुराई और बोली, "डरो मत बेटा, मैं हूं ना। मम्मी कभी गिरने नहीं देगी।" धीरे-धीरे साइकिल चलने लगी। ठंडी-ठंडी हवा चेहरे पर लग रही थी। रास्ते में फूल और पेड़ देखकर स्नेहा खुशी से चिल्लाई, "वाह मम्मी कितना मजा आ रहा है!" पार्क में पहुंचकर मम्मी ने साइकिल रोकी। स्नेहा ने मम्मी को गले लगा लिया और कहा, "मम्मी आप दुनिया की सबसे अच्छी साइकिल चलाती हैं।" मम्मी बोली, "और तुम दुनिया की सबसे अच्छी बेटी हो।" उस दिन स्नेहा ने सीखा कि मां का प्यार और भरोसा ही सबसे बड़ी ताकत है। मम्मी के साथ बिताया वह पल स्नेहा के लिए सबसे यादगार बन गया।
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प्रतीक्षा दूबे, उम्र- 13 साल
एक समय की बात है, चुलबुली और उसकी छोटी बहन पीहू एक छोटे से गांव में रहती थीं। चुलबुली को साइकिल चलाना बहुत पसंद था, लेकिन पीहू अभी छोटी थी और उसे अकेले चलने में डर लगता था। एक बहुत ही अच्छी सुबह, जब सूरज अपनी सुनहरी किरणें बिखेर रहा था, चुलबुली ने पीहू से कहा, "चलो पीहू, आज मैं तुम्हें दुनिया दिखाने ले चलती हूं!" पीहू पहले तो झिझकी, पर अपनी बड़ी बहन पर भरोसा करके वह साइकिल के पीछे बैठ गई। रास्ते में उन्होंने रंग-बिरंगे फूलों के गुच्छे देखे और ठंडी हवा का मजा लिया। जब भी कोई खराब रास्ता आता, चुलबुली हिम्मत बढ़ाते हुए कहती, "डरो मत पीहू, कसके पकड़ो, मैं हूं न!" धीरे-धीरे पीहू का डर खत्म हो गया और वह खिलखिलाकर हंसने लगी। उस दिन पीहू ने न सिर्फ कुदरत की सुंदरता देखी, बल्कि हिम्मत करना भी सीखा।
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अनिका पंसारी, उम्र- 7 साल
रविवार की सुबह थी। अक्सर टीवी और मोबाइल की दुनिया में खोई रहने वाली आठ साल की काव्या, आज अपनी मां के साथ उनकी नीली साइकिल पर घूमने के लिए निकली थी। साइकिल के आगे बंधी टोकरी में रखे ताजे फूलों की महक से पूरा रास्ता महक उठा था। मां पैडल चला रही थी और काव्या पीछे अपनी छोटी सी कुर्सी पर बैठकर दुनिया देख रही थी। ठंडी हवा जब काव्या के चेहरे पर लगी, तो उसने आसमान की तरफ देखा। आसमान में 'सूरज दादा' आज बहुत खुश लग रहे थे, मानो वे मुस्कुरा रहे हों। काव्या ने उत्सुकता से पूछा, "मां, आज सूरज इतना खुश और चमकीला क्यों लग रहा है?" मां ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "क्योंकि आज हम धुआं फैलाने वाली गाड़ी की जगह साइकिल पर निकले हैं। जब हम अपने पर्यावरण का खयाल रखते हैं, तो कुदरत भी हमसे खुश होती है।" यह सुनकर काव्या को बहुत अच्छा लगा। मां के साथ बिताए गए इस पल में इतना प्यार और सुकून था कि काव्या को लगा जैसे हवा में चारों तरफ प्यार भरे लाल दिल उड़ रहे हों। उसे समझ आ गया कि फोन की नकली दुनिया से कहीं ज्यादा खूबसूरत यह असली दुनिया है। उसने पीछे से मां को कसकर गले लगा लिया।
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मिनाक्षी कारगवाल, उम्र- 11 साल
सुबह का समय था, जब नन्ही आरोही अपनी पसंदीदा नीली साइकिल लेकर बगीचे की सैर पर निकली। आसमान साफ था और सुनहरा सूरज अपनी किरणों से पूरी दुनिया को रोशन कर रहा था। बगीचा रंग-बिरंगे फूलों से महक रहा था और ठंडी हवा के झोंके आरोही के चेहरे को छू रहे थे। आरोही ने अपनी साइकिल की टोकरी में कुछ ताजे फूल रखे और पगडंडी पर तेजी से पैडल मारने लगी। उसे ऐसा महसूस हो रहा था मानो वह हवा से बातें कर रही हो। रास्ते में उसे एक सुंदर गमला दिखा, जिसमें खिले हुए लाल फूलों ने उसका मन मोह लिया। वह रुकी और कुछ पल उन फूलों की सुंदरता को निहारती रही। पास ही में लगे पेड़ों से पक्षियों के चहचहाने की मधुर आवाज आ रही थी, जो उसके सफर को और भी खुशनुमा बना रही थी। साइकिल चलाते हुए आरोही के मन में बड़े होकर एक साहसी यात्री बनने के सपने तैर रहे थे। उसे प्रकृति के बीच समय बिताना बहुत पसंद था। उस दिन की सैर ने उसे सिखाया कि खुशी छोटी-छोटी चीजों में ही छिपी होती है जैसे कि चमकता सूरज, ताजी हवा और अपनी साइकिल पर एक बेफिक्र सफर। जब वह घर लौटी, तो उसके चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान थी और दिल में अगले दिन के नए रोमांच की उम्मीद थी।
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दीप्तांशु बिवाल, उम्र- 8 साल
एक खिलती हुई सुबह, रिया और उसकी छोटी बहन परी अपनी पुरानी नीली साइकिल लेकर घर से निकलीं। रिया साइकिल चला रही थी और नन्ही परी पीछे वाली टोकरी में बड़े मजे से बैठी थी। रास्ते में उन्होंने रंग-बिरंगे फूल देखे। रिया ने परी के लिए कुछ सुंदर फूल तोड़े और उन्हें अपनी साइकिल की आगे वाली टोकरी में सजा लिया। ठंडी हवा और सूरज की गुनगुनी धूप उनके चेहरों को चूम रही थी। परी खुशी से तालियां बजा रही थी और रिया अपनी छोटी बहन को हंसता देख बहुत खुश थी।
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गौरिक जैन, उम्र- 13 साल
एक छोटे से सुंदर गांव में नीलू नाम की एक प्यारी बच्ची अपनी मां के साथ रहती थी। नीलू को प्रकृति से बहुत प्यार था। वह हमेशा नई-नई जगहों को देखने और कुछ सीखने के लिए उत्साहित रहती थी। एक दिन सुबह सूरज की सुनहरी किरणें चारों ओर फैल रही थीं। नीलू की मां ने कहा, "आज हम दोनों साइकिल से गांव की सैर पर चलेंगे।" यह सुनकर नीलू बहुत खुश हो गई। मां ने उसे साइकिल की पीछे वाली सीट पर बैठाया और दोनों हरे-भरे रास्तों पर निकल पड़ीं। रास्ते में उन्होंने रंग-बिरंगे फूलों को देखा, पक्षियों की मधुर आवाजें सुनीं और ठंडी हवा का आनंद लिया। नीलू ने देखा कि पेड़ों पर कितने सुंदर फूल खिले हुए हैं। उसने मां से पूछा, "मां, क्या हम भी अपने घर में ऐसे फूल लगा सकते हैं?" मां ने मुस्कुराकर कहा, "हां बेटा, अगर हम पौधों की देखभाल करेंगे तो हमारा घर भी सुंदर हो जाएगा।" थोड़ी दूर जाने पर उन्हें एक छोटा सा बगीचा दिखाई दिया। वहां कई बच्चे खेल रहे थे। नीलू ने भी उनके साथ खेला और नए दोस्त बनाए। सभी बच्चों ने मिलकर पौधों को पानी दिया और बगीचे को साफ रखा। शाम होने लगी तो मां और नीलू वापस घर लौट आईं। नीलू बहुत खुश थी। उसने उस दिन सीखा कि प्रकृति से प्यार करना और उसकी रक्षा करना हम सबकी जिम्मेदारी है। उस दिन की साइकिल यात्रा नीलू के जीवन की सबसे यादगार यात्रा बन गई। अब वह हर दिन पौधों की देखभाल करती और दूसरों को भी प्रकृति बचाने के लिए प्रेरित करती थी।
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नेहल जैन, उम्र- 10 साल
एक सुहानी सुबह थी। आसमान में चमकता हुआ सूरज अपनी सुनहरी किरणें बिखेर रहा था। मौसम बहुत ही सुंदर और प्यारा था। नेहल अपनी मां के साथ साइकिल की सैर पर निकली। मां साइकिल चला रही थी और नेहल पीछे वाली सीट पर बैठी खुशी से मुस्कुरा रही थी। दोनों रास्ते भर हंसी-मजाक करते हुए आगे बढ़ रहे थे।
रास्ते के किनारे रंग-बिरंगे फूल खिले हुए थे। उनकी मीठी खुशबू से पूरा वातावरण महक रहा था। नेहल ने मां से कहा, "मां, कुदरत कितनी सुंदर है! हमें हमेशा इसकी रक्षा करनी चाहिए।" मां ने मुस्कुराते हुए कहा, "बिलकुल बेटा, पेड़-पौधे और फूल हमारे जीवन का आधार हैं। हमें इन्हें कभी नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए।" कुछ दूर जाकर दोनों एक बगीचे में रुके। वहां उन्होंने फूलों को ध्यान से देखा और थोड़ी देर प्रकृति का आनंद लिया। फिर उन्होंने आसपास फैला हुआ थोड़ा-सा कचरा उठाकर डस्टबिन में डाल दिया। यह देखकर वहां मौजूद लोगों ने भी उनकी तारीफ की। घर लौटते समय नेहल बहुत खुश थी। उसने पक्का इरादा किया कि वह रोज साइकिल चलाएगी, पर्यावरण को साफ रखेगी और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए कहेगी।
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मान्यता, उम्र- 10 साल
एक दिन छुट्टी थी। नेहा अपनी मां के साथ साइकिल पर घूमने निकली। रास्ते में उन्हें एक छोटा-सा बगीचा दिखाई दिया। वहां रंग-बिरंगे फूल खिले थे। तभी नेहा ने देखा कि एक तितली बार-बार एक ही फूल पर बैठ रही थी। नेहा को बड़ी हैरानी हुई। वह मां के साथ उस फूल के पास गई। तभी उसे फूल के नीचे एक छोटी-सी चिड़िया का बच्चा दिखाई दिया। वह घोंसले से गिर गया था और डर के कारण छिपा बैठा था। नेहा ने तुरंत अपनी मां की मदद से उस बच्चे को बहुत ध्यान से उठाया। थोड़ी तलाश करने पर पास के पेड़ पर उसका घोंसला मिल गया। मां ने उसे सुरक्षित वापस घोंसले में रख दिया। कुछ देर बाद चिड़िया उड़कर आई और अपने बच्चे को देखकर चहचहाने लगी। ऐसा लगा जैसे वह नेहा और उसकी मां को धन्यवाद कह रही हो। नेहा बहुत खुश हुई। उसने कहा, "आज की सैर मेरी सबसे यादगार सैर बन गई।" घर लौटते समय दोनों के चेहरे पर मुस्कान थी। नेहा ने तय किया कि वह हमेशा पक्षियों और जानवरों की मदद करेगी।
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दिव्या मीणा, उम्र: 7 साल
एक गांव में दिया और पोचनमा नाम की दो बहनें रहती थीं। दिया बड़ी थी और पोचनमा छोटी। दिया पोचनमा को रोज अपनी साइकिल से घुमाने ले जाती और खूब मौज-मस्ती करती। एक दिन सुबह-सुबह पोचनमा घूमने की जिद करके रोने लगी। दिया ने सोचा कि आज स्कूल की छुट्टी भी है, बहन को घुमाने के बहाने भगवान की पूजा के लिए फूल भी ले आएंगे। यह सोचकर दिया ने अपनी साइकिल उठाई, पीछे अपनी बहन को बैठाया और सैर के लिए निकल पड़ी। सूरज चमक रहा था और कुदरत के नजारे, जैसे पेड़-पौधे और फूल, रास्ते की शोभा बढ़ा रहे थे। रास्ते में जो भी अच्छे फूल दिखते, दिया उन्हें तोड़कर अपनी साइकिल की टोकरी में रख लेती। दोनों बहनें खुली हवा का मजा लेते हुए घर आ गईं और दिया भगवान की पूजा में लग गई। मानो वह लोगों को यह बताना चाहती हो कि जिस तरह शरीर को स्वस्थ रखने के लिए साइकिल चलानी चाहिए, उसी तरह भगवान की पूजा करके मन को भी खुश रखना चाहिए।
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रुद्राक्षी चौधरी, उम्र: 10 साल
एक छोटा सा और बहुत सुंदर गांव था। उस गांव में मीनू नाम की एक प्यारी लड़की अपनी छोटी बहन पिंकी के साथ रहती थी। दोनों बहनों में बहुत प्यार था। एक दिन सुबह-सुबह सूरज देवता मुस्कुराते हुए आसमान में चमके। मौसम बहुत अच्छा था। मीनू ने पिंकी से कहा, "पिंकी, चलो आज हम अपनी नीली साइकिल पर घूमने चलते हैं!" पिंकी खुशी से उछल पड़ी। मीनू ने साइकिल निकाली, आगे की टोकरी में सुंदर रंग-बिरंगे फूल सजाए और पिंकी को पीछे की सीट पर बैठाकर सफर पर निकल पड़ी। ठंडी-ठंडी हवा के बीच चारों तरफ हरी-भरी घास और सुंदर फूल खिले थे। जैसे ही मीनू ने साइकिल की घंटी बजाई ट्रिन-ट्रिन, पिंकी जोर-जोर से हंसने लगी। दोनों बहनें गाते-गुनगुनाते हुए आगे बढ़ती जा रही थीं और आसमान में उड़ती चिड़ियां भी उनके साथ रेस लगा रही थीं। इस मजेदार सफर और हंसी-मजाक के पलों ने उन्हें सिखाया कि असली खुशी अपनों के साथ बिताए छोटे-छोटे समय में ही छिपी होती है।
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धनिष्ठा सिसोदिया, उम्र: 11 साल
रविवार की सुहानी सुबह थी। आसमान में चमकता सूरज अपनी सुनहरी किरणें बिखेर रहा था। चारों तरफ हरियाली और रंग-बिरंगे फूलों की सुंदरता फैली हुई थी। छोटी धनिष्ठा अपनी मां के साथ साइकिल पर घूमने निकली। मां साइकिल चला रही थी और धनिष्ठा पीछे लगी छोटी सीट पर बैठी खुशी से मुस्कुरा रही थी। रास्ते भर वे बातें करती रहीं और प्रकृति की सुंदरता का मजा लेती रहीं। कुछ दूर जाने पर धनिष्ठा ने देखा कि सड़क के किनारे लगे फूल मुरझाए हुए हैं। उसने मां से साइकिल रोकने को कहा। दोनों ने पास के नल से पानी भरकर उन पौधों में डाला। थोड़ी देर बाद वे फिर अपनी यात्रा पर निकल पड़ीं। रास्ते में उन्होंने लोगों को सफाई और पेड़-पौधों की देखभाल करने का संदेश भी दिया। घर लौटते समय धनिष्ठा ने मां से कहा, "आज मुझे बहुत मजा आया। आपने मुझे सैर कराने के साथ-साथ प्रकृति से प्यार करना भी सिखाया।" मां मुस्कुराई और बोली, "बेटी, प्रकृति हमारी सबसे बड़ी दोस्त है। अगर हम इसका ध्यान रखेंगे, तो यह हमें स्वस्थ और खुशहाल जीवन देगी।" उस दिन की सैर धनिष्ठा के लिए केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ी सीख बन गई। उसने तय किया कि वह हमेशा पर्यावरण की रक्षा करेगी और दूसरों को भी इसके लिए कहेगी।
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विशाल चौहान, उम्र: 13 साल
एक दिन सुबह-सुबह आसमान में चमकीला सूरज अपनी हल्की धूप बिखेर रहा था, मानो वह प्रकृति को जगा रहा हो। तभी नन्ही खुशी ने अपनी मां से बाहर घूमने जाने के लिए कहा। उसकी प्यारी मां उसे घुमाने के लिए अपनी नीली साइकिल पर बिठाकर सैर के लिए निकल पड़ी। रास्ते में नन्ही खुशी ने फूल लेने की इच्छा जताई। तभी उसकी मां ने आगे देखा तो एक फूलों से भरा प्यारा बगीचा दिखा। खुशी की मां ने उनमें से कुछ प्यारे फूल तोड़े और अपनी साइकिल की टोकरी में रखकर आगे निकल पड़ी। सुबह की इस जादुई सैर और मन की इच्छा पूरी होने पर खुशी बहुत खुश हुई और कहने लगी, "सुबह-सुबह जो भी इच्छा मांगो, वह जल्दी ही पूरी हो जाती है, है ना मां?" और मां ने हंसते हुए हां कहा।
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निध्या गुप्ता, उम्र- 7 साल
सुबह का सुहाना समय था और आसमान में सूरज अपनी चमकीली किरणों के साथ मुस्कुरा रहा था। ऐसे प्यारे मौसम को देखकर सात साल की छोटी रिया और उसकी मां, मीरा ने बाहर घूमने जाने का फैसला किया। मीरा ने अपनी नीली साइकिल निकाली। रिया खुशी से उछलते हुए साइकिल के पीछे लगी अपनी छोटी सीट पर बैठ गई और अपनी मां को प्यार से पकड़ लिया। मीरा ने साइकिल के आगे बनी टोकरी में कुछ सुंदर फूल सजाए और दोनों सैर पर निकल पड़ीं। रास्ते में ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी और चारों तरफ हरी-भरी घास थी। रास्ते के किनारे खिले रंग-बिरंगे फूलों को देखकर रिया खुशी से ताली बजाने लगी। मीरा ने पैडल मारते हुए कहा, "देखो रिया, आज का दिन कितना सुंदर है!" रिया ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "हां मां, आपके साथ साइकिल पर घूमना मुझे सबसे अच्छा लगता है।" दोनों ने मिलकर सुबह की ताजी हवा का आनंद लिया और ढेर सारी बातें कीं। मां और बेटी का यह सफर प्यार, हंसी और खुशियों से भरा था, जिसने उनकी इस सुबह को हमेशा के लिए यादगार बना दिया।
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आयांश गौतम, उम्र- 8 साल
एक दिन बड़ी बहन अपनी छोटी बहन को साइकिल पर बैठाकर शहर की सैर कराने निकली। साइकिल के आगे फूलों का सुंदर गमला रखा था। रास्ते में लोग उनकी फूलों से सजी साइकिल देखकर मुस्कुरा रहे थे। एक पार्क में पहुंचकर दोनों बहनों ने एक सूखे पौधे में पानी डाला और उसके पास अपना फूलों का गमला रख दिया। यह देखकर दूसरे बच्चों ने भी पौधे लगाने का निश्चय किया। कुछ दिनों बाद वही पार्क रंग-बिरंगे फूलों से खिल उठा। दोनों बहनों को उनकी अच्छी सोच के लिए सम्मानित किया गया। वे समझ गईं कि छोटा-सा अच्छा काम भी बड़ी खुशियां बांट सकता है।
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प्रनवी अग्रवाल, उम्र- 11 साल
एक दिन मां सुबह जल्दी उठ गई थी। तभी उनके दिमाग में आइडिया आया कि वह अपनी बच्ची को साइकिल से कुदरत का नजारा दिखाने ले चलें। तो उसने अपनी बच्ची को जल्दी से उठाया और उसे ब्रश करवा कर नहलाया, फिर तैयार किया। मां ने उसे बताया नहीं कि वो कहां जा रहे हैं, क्योंकि वह सीक्रेट रखना चाहती थी। फिर मां आगे बैठ गई और बच्ची को पीछे बिठा लिया। और फिर उन्होंने उसे गार्डन में और कुछ साफ सड़कों में घुमा-घुमाकर मजे करवाए। इस तरह उन्होंने कुदरत के नजारों के बीच बहुत मजे किए।
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दिव्यम गरवा, उम्र- 9 साल
एक दिन दो सहेलियां रिया और सिया स्कूल से घर लौट रही थीं। रास्ते में उन्होंने एक छोटी बच्ची को अपनी मां के साथ साइकिल चलाते हुए देखा। दोनों बहुत खुश थीं और उनके चेहरे पर मुस्कान थी। रिया बोली, "देखो सिया, कितनी प्यारी मुस्कान है! साथ मिलकर समय बिताने का मजा ही अलग होता है।" सिया मुस्कुराकर बोली, "बिलकुल! मुझे लगता है कि रोज थोड़ा समय परिवार और दोस्तों के साथ बिताना चाहिए। इससे प्यार और अपनापन बढ़ता है।" रिया ने कहा, "चलो, इस रविवार हम भी पार्क में साइकिल चलाएंगे और खूब बातें करेंगे।" सिया हंसते हुए बोली, "पक्का! और बाद में आइसक्रीम भी खाएंगे।" दोनों सहेलियां हंसते-हंसते अपने घर की ओर चल पड़ीं। उन्हें समझ आ गया कि छोटी-छोटी खुशियां और अपने लोगों के साथ बिताया समय ही जीवन को सबसे सुंदर बनाता है।
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धरा असावा, उम्र- 8 साल
रविवार की सुबह थी। हल्की-हल्की धूप निकल रही थी और फूलों पर तितलियां मंडरा रही थीं। मीरा और उसकी मां नाश्ता करके आंगन में बैठी थीं। मीरा बोली, "मां आज पार्क चलें?" मां मुस्कुराई और बोली, "चलो, पर साइकिल से चलेंगे।" मीरा खुशी से उछल पड़ी। मां ने नीले रंग की साइकिल निकाली। टोकरी में लाल-पीले फूल सजा दिए। मीरा पीछे बैठ गई और मां ने धीरे-धीरे पैडल चलाना शुरू किया। रास्ते में ठंडी हवा चल रही थी। मीरा ने मां की पीठ पर हाथ रखा और गाना गाने लगी। मां भी साथ में गुनगुनाने लगी। रास्ते के किनारे गुलाब के फूल खिले थे। सूरज की रोशनी चारों तरफ फैल रही थी। मीरा को लगा जैसे पूरी दुनिया कितनी सुंदर है। पार्क पहुंचकर मां और मीरा ने झूले झूले, फूल तोड़े और खूब बातें कीं। घर लौटते समय मीरा ने कहा, "मां, आपके साथ साइकिल पर जाना सबसे अच्छा लगता है।" मां ने मीरा के सिर पर हाथ फेरा और कहा, "बेटा, जब भी तुम्हारा मन उदास हो, मेरे साथ साइकिल पर निकल जाना। सारी थकान दूर हो जाएगी।" उस दिन मीरा ने सीखा कि खुशियां महंगी चीजों में नहीं, मां के साथ बिताए पलों में होती हैं। घर आकर मीरा ने अपनी डायरी में लिखा - "आज का दिन सबसे खास था।"
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इधित्री जोशी, उम्र- 10 साल
एक दिन सुबह का मौसम बहुत सुहाना था। आसमान में चमकता हुआ सूरज सभी का स्वागत कर रहा था। चारों ओर रंग-बिरंगे फूल खिले हुए थे। छोटी रिया अपनी मां के साथ साइकिल पर घूमने निकली। मां साइकिल चला रही थी और रिया पीछे बैठकर खुशी से आसपास का सुंदर नजारा देख रही थी। रास्ते में ठंडी हवा चल रही थी। पक्षियों की मीठी आवाज सुनाई दे रही थी। रिया ने फूलों की ओर इशारा करते हुए कहा, "मां, ये फूल कितने सुंदर हैं!" मां ने मुस्कुराकर कहा, "बेटा, हमें फूलों को तोड़ना नहीं चाहिए। ये पौधों पर ही सबसे सुंदर लगते हैं और आसपास को भी खुशबूदार बनाते हैं।" रिया ने मां की बात ध्यान से सुनी और वादा किया कि वह पेड़-पौधों की देखभाल करेगी और कभी भी कचरा इधर-उधर नहीं फेंकेगी। थोड़ी देर बाद दोनों खुशी-खुशी घर लौट आए। उस दिन की सैर रिया के लिए यादगार बन गई। उसने सीखा कि कुदरत से प्यार करना और उसकी रक्षा करना हम सभी का फर्ज है।
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पार्थ सारस्वत, उम्र- 9 साल
एक सुहावना दिन था। सूरज अपनी हल्की धूप बिखेर रहा था। मां ने अपनी छोटी बेटी परी से कहा, "चलो परी, आज हम दोनों साइकिल चलाने चलते हैं!" परी यह सुनकर बहुत खुश हो गई। मां की साइकिल बहुत सुंदर थी, जिसके आगे फूलों की एक प्यारी सी टोकरी लगी हुई थी। मां ने परी को अपनी साइकिल के पीछे बनी छोटी और सुरक्षित सीट पर बिठाया। रास्ते में रंग-बिरंगे फूल खिले हुए थे, जिन्हें देखकर परी का मन कर रहा था कि वह भी अपनी मां की तरह साइकिल चलाए। साइकिल चलाते समय परी ने प्यार से अपने नन्हे हाथ मां की पीठ पर रख दिए। मां को अपनी पीठ पर बेटी के हाथों का छूना बहुत प्यारा लगा। मां मुस्कुराई और बोली, "परी, कसकर पकड़े रहना!" परी हंसते हुए बोली, "हां मां, मैंने आपको बहुत अच्छे से पकड़ा है।" रास्ते भर दोनों बातें करती रहीं और ठंडी हवा का मजा लेती रहीं। परी को अपनी मां के साथ इस तरह घूमना दुनिया का सबसे खूबसूरत अहसास लग रहा था। उस दिन परी ने जाना कि मां के साथ बिताया हर पल खुशियों से भरा होता है।
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कियान सोनी, उम्र- 8 साल
गर्मियों की एक सुनहरी सुबह थी। सांची अपनी मां के साथ साइकिल पर बगीचे की ओर जा रही थी। हल्की-हल्की हवा चल रही थी, पक्षी मीठी आवाज में चहचहा रहे थे और चारों ओर रंग-बिरंगे फूल खिले हुए थे। साइकिल की टोकरी में भी ताजे फूल रखे थे, जिन्हें देखकर सांची बहुत खुश थी। रास्ते में सांची ने देखा कि कुछ लोग प्लास्टिक की बोतलें और कचरा सड़क किनारे फेंक रहे हैं। उसने मां से कहा, "अगर हम अपने आसपास सफाई नहीं रखेंगे, तो फूल, पेड़ और पक्षी कैसे खुश रहेंगे?" मां मुस्कुराई और बोली, "बेटी, सच्चा इंसान वही होता है, जो केवल अपने घर का ही नहीं, बल्कि अपने शहर और कुदरत का भी ध्यान रखता है।" दोनों ने थोड़ी देर रुककर आसपास पड़ा कचरा उठाया और पास लगे कूड़ेदान में डाल दिया। यह देखकर वहां मौजूद बाकी लोगों ने भी उनका साथ दिया। कुछ ही देर में पूरा रास्ता साफ दिखाई देने लगा। सभी ने सांची की समझदारी और मां के दिए संस्कारों की दिल से तारीफ की। घर लौटते समय मां ने कहा, "आज तुमने मुझे सबसे सुंदर तोहफा दिया है कुदरत के लिए अपना प्यार।" सांची मुस्कुराकर बोली, "मां, जब हमारा शहर साफ, हरा-भरा और सुंदर रहेगा, तभी हर दिन सचमुच खुशियों से भरा होगा।"
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तृषा शर्मा, उम्र- 12 साल
सिया और चिया दो बहनें थीं। दोनों में बहुत प्यार था। सिया अपनी छोटी बहन को समय की कीमत समझाती और हर काम समय पर करने के लिए कहती थी। एक दिन सिया ने कहा, "अगर हम सुबह जल्दी उठें, तो कुदरत की सुंदरता का मजा ले सकते हैं।" चिया भी खुश हो गई और दोनों ने अगले दिन जल्दी उठने का तय किया। अगली सुबह वे सूरज निकलने से पहले ही जाग गईं। सिया ने साइकिल निकाली और चिया को पीछे बैठाकर सैर पर निकल पड़ी। उगता सूरज, ठंडी हवा और पक्षियों की मीठी आवाज से आस-पास का नजारा बहुत सुंदर लग रहा था। रास्ते में दोनों ने फूल तोड़े और एक सुंदर गुलदस्ता बनाया। सिया ने चिया को पेड़-पौधों, पक्षियों और साफ पर्यावरण के बारे में बताया। चिया ने ध्यान से सब सुना और बहुत खुश हुई। घर लौटकर दोनों ने हर रोज सुबह की सैर करने, समय का सही इस्तेमाल करने और कुदरत की रक्षा करने का पक्का इरादा किया।
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कौस्तुभ दाधीच, उम्र- 7 साल
एक बार रिया अपनी मम्मी के साथ गर्मियों की छुट्टियों में अपने ननिहाल गई। वहां पहुंचकर सभी बहुत खुश थे। अगले दिन घर की सफाई करते समय रिया की मम्मी को अपनी बचपन की पुरानी साइकिल मिल गई। साइकिल को देखते ही उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई। उन्होंने प्यार से साइकिल साफ की और अपने बचपन की कई मजेदार बातें रिया को बताईं। उनकी बातें सुनकर रिया भी बहुत खुश हो गई। फिर रिया और उसकी मम्मी ने उसी साइकिल से बाहर घूमने का तय किया। यह सुनते ही रिया खुशी से झूम उठी। सबसे पहले वे दोनों चौपाटी गए। वहां उन्होंने ठंडी हवा का मजा लिया, कुछ देर घूमे और सुंदर नजारों का मजा लिया। इसके बाद रिया की मम्मी उसे अपने पुराने स्कूल के पास बने बगीचे में ले गई। बगीचा रंग-बिरंगे फूलों और हरे-भरे पौधों से सजा हुआ था।
मम्मी ने रिया को बताया कि जब वे स्कूल में पढ़ती थीं, तब वे अपनी सहेलियों के साथ मिलकर इस बगीचे की सफाई करती थीं। वे नए-नए फूलों के पौधे लगातीं, उन्हें रोज पानी देतीं और उनकी अच्छी तरह देखभाल करती थीं। जब उन पौधों पर सुंदर फूल खिलते, तो वे उन्हें तोड़कर अपनी शिक्षिकाओं को सम्मान और प्यार के साथ देती थीं। मम्मी की बातें सुनकर रिया को भी पेड़-पौधों से प्यार करने की सीख मिली। उसने मम्मी के पसंद के फूल बड़े प्यार से इकट्ठे किए और दोनों उन्हें लेकर घर लौट आईं। रिया ने वे फूल अपनी नानी को दिए। सुंदर फूलों को देखकर नानी बहुत खुश हुईं। उन्होंने रिया को प्यार से गले लगा लिया और उसकी तारीफ करते हुए कहा कि कुदरत से प्यार करना सबसे अच्छी आदत है। उस दिन रिया ने समझा कि बचपन की यादें और कुदरत का प्यार जीवन की सबसे अनमोल दौलत है।
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प्रसून पारीक,उम्र- 9 साल
चिंकी अक्सर अपनी बड़ी बहन रेणु के साथ साइकिल पर जाने की जिद करती थी। एक दिन जब रेणु उसे साइकिल पर बैठाकर घुमा रही थी तो उन्हें एक जगह सुंदर-सुंदर फूल दिखाई दिए। चिंकी फूलों को तोड़ने की जिद करने लगी। रेणु ने उसे समझाया कि बिना पूछे हम फूल नहीं तोड़ सकते। तभी बगीचे के माली ने आकर चिंकी को बहुत सारे फूल दिए। इतने सारे फूलों को पाकर चिंकी बहुत खुश हुई। उसने माली चाचा को धन्यवाद कहा। दोनों बहनें आज इतने सुंदर फूल पाकर बहुत खुश थीं।
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गुंजन खारड़ा, उम्र- 11 साल
रविवार का दिन था, इसलिए चीकू और मीकू दोनों की स्कूल से छुट्टी थी। सुबह-सुबह आसमान में सूरज दादा अपनी सुनहरी किरणें बिखेर रहे थे और मौसम बहुत अच्छा था। चीकू ने देखा कि छुट्टी का दिन होने के बाद भी उसकी छोटी बहन मीकू घर में बैठे-बैठे बोर हो रही है। अपनी बहन के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए, चीकू ने अपनी नीली साइकिल निकाली। उसने साइकिल की आगे वाली टोकरी को बगीचे के ताजे और सुंदर फूलों से सजाया, जिससे साइकिल बिल्कुल नई जैसी लगने लगी। चीकू ने मीकू को साइकिल के पीछे बनी सुरक्षित बाल-सीट पर बिठाया। मीकू रविवार के दिन इस तरह बाहर घूमने की बात से ही खुशी से उछल पड़ी। चीकू ने जैसे ही पैडल मारना शुरू किया, ठंडी हवा उनके गालों को छूने लगी। रास्ते में रंग-बिरंगे फूल खिले थे, जिन्हें देखकर मीकू खुशी से तालियां बजाने लगी। चीकू अपनी छोटी बहन को संभालते हुए धीरे-धीरे साइकिल चला रही थी और मीकू अपनी दीदी की पीठ को पकड़कर खिलखिलाकर हंसने लगी। दोनों बहनों के बीच का यह प्यार रास्ते में हर किसी का मन मोह रहा था। रविवार का यह दिन केवल एक छुट्टी का दिन नहीं, बल्कि दोनों बहनों के अटूट रिश्ते और बचपन की एक बेहद खूबसूरत याद बन गया था।
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विवान लोहिया, उम्र- 8 साल
सुबह का सुहाना मौसम था। सिया अपनी छोटी बहन परी को साइकिल पर बिठाकर बगीचे की ओर जा रही थी। रास्ते में दोनों ने रंग-बिरंगे फूल, चिड़ियों की चहचहाहट और चमकती धूप का आनंद लिया। बगीचे के पास पहुंचकर परी ने देखा कि एक छोटा पौधा मुरझाया हुआ है। उसने सिया से कहा, "दीदी, इसे पानी चाहिए।" दोनों ने बोतल से पानी भरकर पौधे में डाल दिया। थोड़ी देर में पौधा ताजा दिखने लगा। तभी माली चाचा आए। उन्होंने दोनों की तारीफ करते हुए कहा, "पेड़-पौधे हमारी जिंदगी का आधार हैं। इनकी देखभाल करना हमारा फर्ज है।" दोनों बहनों ने हर हफ्ते पौधों की सेवा करने और अपने दोस्तों को भी पेड़ लगाने के लिए कहने का पक्का इरादा किया। घर लौटते समय उनके चेहरों पर खुशी थी।
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जयमल सिंह, उम्र- 9 साल
एक सुहानी सुबह मां अपनी छोटी बेटी को साइकिल पर बैठाकर घूमने निकली। रास्ते में दोनों फूलों की सुंदरता देख रही थीं। तभी उन्हें सड़क के किनारे एक छोटा-सा घायल चिड़िया का बच्चा दिखाई दिया। मां ने तुरंत साइकिल रोकी। दोनों ने प्यार से चिड़िया को उठाया, उसे थोड़ा पानी पिलाया और सुरक्षित जगह पर रख दिया। कुछ देर बाद उसकी मां चिड़िया उड़कर आई और अपने बच्चे को ले गई। बेटी खुशी से बोली, "मां, आज हमने एक छोटी-सी जान बचाई!" मां मुस्कुराकर बोली, "दूसरों की मदद करना सबसे बड़ा नेक काम है।" उस दिन की सैर दोनों के लिए हमेशा यादगार बन गई।
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सृष्टि भारद्वाज, उम्र- 9 साल
एक दिन सुबह का समय था। आसमान साफ था और सूरज चमक रहा था। ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी। रानी अपनी मां के साथ साइकिल पर घूमने निकली। रानी नौ साल की एक प्यारी और चंचल बच्ची थी। वह साइकिल की पीछे वाली सीट पर बैठी थी। उसकी मां बहुत सावधानी से साइकिल चला रही थी। रास्ते में रानी ने रंग-बिरंगे फूल देखे। वह खुशी से बोली, "मां, देखो! ये फूल कितने सुंदर हैं।" मां मुस्कुराई और बोली, "हां बेटी, कुदरत हमें बहुत खुशियां देती है। हमें इसकी रक्षा करनी चाहिए।" थोड़ी दूर जाने पर उन्होंने देखा कि एक छोटा पौधा गर्मी से मुरझा रहा था। रानी ने मां से साइकिल रोकने को कहा। उसके पास पानी की एक छोटी बोतल थी। उसने बोतल का पानी उस पौधे में डाल दिया। मां ने प्यार से कहा, "शाबाश बेटी! छोटे-छोटे अच्छे काम दुनिया को सुंदर बनाते हैं।" आगे जाकर उन्हें सड़क पर एक घायल चिड़िया मिली। रानी और उसकी मां ने उसे सावधानी से उठाया और पास के जानवरों के अस्पताल ले गईं। डॉक्टर ने चिड़िया का इलाज किया। कुछ समय बाद चिड़िया ठीक होकर उड़ गई। रानी बहुत खुश हुई। घर लौटते समय रानी ने कहा, "मां, आज की साइकिल की सैर मैं कभी नहीं भूलूंगी।" मां ने मुस्कुराकर कहा, "बेटी, दूसरों की मदद करने से सबसे बड़ी खुशी मिलती है।"
Updated on:
13 Jul 2026 02:11 pm
Published on:
13 Jul 2026 02:10 pm
