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100 साल पहले लखनऊ के मुसलमानों ने खाई थी गौहत्या न करने की कसम 

आज से करीब 100 साल पहले, जब गौहत्या पर कानूनी प्रतिबंध भी नहीं था। 

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Akansha Singh

Sep 12, 2016

gandhi

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लखनऊ। आजकल गौहत्या पर देश में काफी बवाल चल रहा है। जगह जगह पर दंगे भी हो रहे हैं। यहां तक की प्रधानमंत्री ने भी अपने भाषण में गौहत्या रोकने का फरमान जारी किया। मुस्लिम समुदाय में भी यह एक बड़ा मुद्दा बनकर सामने आया है। आज से करीब 100 साल पहले, जब गौहत्या पर कानूनी प्रतिबंध भी नहीं था। आपको बता दें तब अपनी स्वेच्छा से लखनऊ के मुसलमानों ने बकरीद के मौके पर गाय की कुर्बानी ना देने का फैसला लिया, जिसकी पुष्टि 1887 में मदनमोहन मालवीय द्वारा स्थापित श्री धर्म भारत महामंडल और महात्मा गांधी ने की।

मुसलमानों के बीच गौहत्या न करने के लिए सहमति बनाने की पहल मौलाना अब्दुल बारी फेरांगी महाली ने की जो स्वतंत्रता सेनानी और खिलाफत आंदोलन के बड़े नेता थे। हालांकि मौलाना के पूर्वजों ने भी इस दिशा में कोशिश की थी, लेकिन उन्हें ज्यादा कामयाबी हासिल नहीं हुई। 6 सितंबर 1919 को टाइम्स ऑफ इंडिया को भेजे गए एक पत्र में गांधी ने मौलाना के साथ हुई अपनी बातचीत का जिक्र किया है। गांधी मौलाना को भाई कहकर पुकारते थे। गांधी ने इस पत्र में लिखा है कि हिंदुओं जहां खिलाफत आंदोलन का समर्थन नहीं करना चाहते थे, वहीं मुसलमानों ने मौलाना के नेतृत्व में स्वेच्छा से यह फैसला किया।

मौलाना के प्रयास को गांधी ने सराहा
गौहत्या न करने के मौलाना के प्रयास को गांधी जी काफि सराहा। गांधी को भेजे गए एक टेलीग्राम में मौलाना ने लिखा, 'हिंदू-मुस्लिम एकता के जश्न में इस बकरीद पर फेरांगी महल में गाय की कुर्बानी नहीं होगी।' 10 जनवरी 1920 को मौलाना को भेजे गए एक पत्र में श्री भारत धर्म महामंडल ने उन्हें धन्यवाद देते हुए कहा है कि उनके प्रयासों के कारण ही लखनऊ में बकरीद पर किसी गाय की कुर्बानी नहीं दी गई। मौलाना के समर्थक उत्तरपूर्व से लेकर बंगाल और मद्रास तक फैले हुए थे, लेकिन इसके बावजूद लखनऊ के मुसलमानों ने गोहत्या ना करने का फैसला किसी दबाव में आकर नहीं, बल्कि अपनी इच्छा से किया था।

अपनी इच्छा से लिया गौहत्या न करने का फैसला
'ना तो हिंदुओं ने और ना ही महात्मा गांधी ने मुझसे गोहत्या रोकने के लिए कहा। एकता की मेरी दिली इच्छा और अपने हिंदू भाइयों की भावनाओं को दुख न पहुंचाने के लिए ही मैंने गौहत्या ना होने देने का फैसला किया।' 15 जनवरी 1920 को सहारनपुर में एक हिंदू-मुस्लिम सम्मेलन को संबोधित करते हुए मौलाना ने कहा। हालांकि अंग्रेजों ने इस एकता को तोड़ने और गौहत्या के बहाने हिंदू-मुस्लिम समुदायों में गलतफहमी पैदाकर भाईचारा खत्म करने की भी काफी कोशिश की। मौलाना की ही कोशिशों का असर था कि बाद में उत्तर प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी बकरीद के दौरान गोहत्या ना करने के लिए मुस्लिम लीग के कुछ वरिष्ठ सदस्यों ने सहमति दिखाई।

पूर्वजों ने भी की थी गौहत्या के खिलाफ अपील
आपको बता दें की गौहत्या के खिलाफ मौलाना के अलावा उनके पूर्वजों ने 2 मौकों पर अपने समर्थकों से बकरीद पर गौहत्या ना करने की अपील की थी। 20वीं सदी की शुरुआत में मौलाना के पिता, चचेरे भाई और 2 अन्य लोगों ने एक फतवा जारी कर कहा था कि इस्लाम में गोहत्या करना अनिवार्य नहीं है और गोहत्या नहीं करना धार्मिक गुनाह नहीं है। 1911 में एक और फतवा जारी कर कहा गया कि अगर गोहत्या से लोगों की भावनाओं को चोट पहुंचती है और भाईचारा खत्म होता है, तो इसे छोड़ देना चाहिए। इस फतवे में कहा गया कि गौहत्या इस्लामिक कानून का हिस्सा नहीं है।

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