गौहत्या न करने के मौलाना के प्रयास को गांधी जी काफि सराहा। गांधी को भेजे गए एक टेलीग्राम में मौलाना ने लिखा, 'हिंदू-मुस्लिम एकता के जश्न में इस बकरीद पर फेरांगी महल में गाय की कुर्बानी नहीं होगी।' 10 जनवरी 1920 को मौलाना को भेजे गए एक पत्र में श्री भारत धर्म महामंडल ने उन्हें धन्यवाद देते हुए कहा है कि उनके प्रयासों के कारण ही लखनऊ में बकरीद पर किसी गाय की कुर्बानी नहीं दी गई। मौलाना के समर्थक उत्तरपूर्व से लेकर बंगाल और मद्रास तक फैले हुए थे, लेकिन इसके बावजूद लखनऊ के मुसलमानों ने गोहत्या ना करने का फैसला किसी दबाव में आकर नहीं, बल्कि अपनी इच्छा से किया था।