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खंडहर पड़ी है ‘अफीम कोठी’ जहां शुरू हुआ था लखनऊ के राजधानी बनने का इतिहास

प्रदेश की पूर्व राजधानी में स्थित यह वही महल है जहां से नवाब बैठ कर पूरे प्रदेश पर शासन करते थे।

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Dikshant Sharma

Jun 15, 2016

afeem kothi

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लखनऊ।
फैजाबाद में घाघरा नदी के तट पर स्थित है अवध के नवाबों का सरकारी निवास 'दिलकुशा'। यह निवास आज तकरीबन खंडहर हो चुका है। आलम यह है कि अगर जल्द ही इसके संरक्षण के उचित प्रयास नहीं किये गए तो आने वाली पीढ़ी के लिए एक महान राजवंश कि यह पहचान का निशान भी नहीं मिलेगा। प्रदेश की पूर्व राजधानी में स्थित यह वही महल है जहां से नवाब बैठ कर पूरे प्रदेश पर शासन करते थे।


1722 में मिली थी अवध को पहली राजधानी

दिलकुशा नवाब शुजा-उद-दौला का निवास था, जिनका शासनकाल 1756 से 1775 तक रहा। इस महल से पहले यहाँ कच्चा

बांग्ला था जिसे नवाब सआदत अली खान ने बनवाया था। इन्होंने ही फैजाबाद शहर की खोज की थी और 1722 में यह अवध की पहली राजधानी बनी।


नवाब शुजा-उद-दौला ने इस बंगले का पूर्ण निर्माण कर फैज़ाबाद को राजधानी के रूप में विकसित करने का काम किया। दिलकुशा एक चमकीला डबल मंजिला का महल है जो 10 हज़ार वर्ग फुट में फैला हुआ है। इसमें हर मंज़िल पर दस बड़े कमरे है। इतिहासकार प्रोफेरसर रघुवंश मणि के मुताबिक नवाब शुजा- उद-दौला, अपने परिवार के सदस्यों के साथ कोठी की पहली मंजिल पर रहते हैं जबकि भूतल उनके कार्यालय के रूप में इस्तेमाल किया जता था।


लखनऊ बनी अवध की नयी राजधानी

शुजा-उद-दौला की मौत के बाद उनके बेटे आसफ-उद-दौला ने लखनऊ की ओर रुख किया। उन्होंने लखनऊ को अवध की नयी राजधानी बनाया। नवाबों के लखनऊ जाने के बाद दिलकुशा में अंग्रेज़ों ने अपना ऑफिस खोला। क्योंकि यह ऑफिस नारकोटिक्स का था, इसलिए इस जगह को अफीम कोठी नाम से जाना जाने लगा। आजादी के बाद इस नवाबी कोठी और जमीन जो तब कैसर-ए-हिंद अफीम सरकार 'के पास थी, केंद्रीय जांच एजेंसी नारकोटिक्स को दे दी गयी। नारकोटिक्स विभाग के अधिकारी डीके सिंह ने बताया कि 2012 में यह ऑफिस बंद कर दिया गया है। पर इस इमारत का हाल बेहाल काफी समय पहले से था। पहली मंज़िल की छत भी ढह चुकी है।


चिंतित है जानकार

हेरिटेज एक्टिविस्ट डॉ युसफ खान ने बतया कि सरकार के ढीले रवैये के चलते एक ऐतिहासिक ईमारत अपना वजूद खोने की कगार पर है। नरकटिस्ट विभाग को ऑफिस बंद करने के बाद ASI (अर्चेलोगिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया ) या स्थानीय प्रशासन को हैंडओवर कर देना चाहिए था।


लखनऊ के इतिहासकार रोशन ताकि ने बतया कि अफीम कोठी की स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका रही है। 1857 के ग़दर के दौरान यह स्वतंत्रता सेनानियों की गतिविधियों और छुपने का अड्डा भी रहा है।


ऐसे में अगर अभी भी सोए हुए ज़िम्मेदार जग जाएँ तो इस इमारत को धूमिल होने से बचाया जा सकता है।

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