लखनऊ. वे दोनों लड़ रहे थे। कोई औरंगजेब तो कोई धृतराष्ट्र की उपमाएं पा रहा था। पिता-पुत्र के इस राजनीतिक संघर्ष के बीच एक युवा राष्ट्रीय क्षितिज पर दस्तक देने की तैयारी कर रहा था। जी हां, पिछले छह माह से अधिक समय तक चली यदुवंश की महाभारत के विजेता बनकर उभरे अखिलेश अब राष्ट्रीय क्षितिज पर छाने की तैयारी में हैं। लोग उनमें मोदी से मुकाबले के लिए एक मजबूत छत्रप की छवि देख रहे हैं और अखिलेश भी उसी तर्ज पर कदम-दर-कदम आगे बढ़ रहे हैं। अभी तक मोदी विरोधी लड़ाई का मोर्चा संभाले राहुल गांधी और अखिलेश जब एक मंच पर होंगे, तो लोगों को वह पल भी याद आएंगे, जब दोनों ने एक दूसरे को अच्छा लड़का करार दिया था। कहा तो यहां तक जा रहा है कि अब पता चलेगा, कौन ज्यादा अच्छा लड़का है।
मुलायम सिंह यादव ने पांच साल पहले जब अखिलेश को सत्ता सौंपी थी, तो उन्हें भी अंदाजा नहीं होगा कि पांच साल में स्थितियां इस कदर परिवर्तित हो जाएंगी। वैसे अखिलेश को तेवर दिखाने में चार साल से ज्यादा समय लग गया। पहली दफा अखिलेश बीते वर्ष जून में तब मुखर रूप से विरोधी स्वर में सामने आए, जब उन्होंने बलराम यादव को बर्खास्त कर दिया। दरअसल, मुख्तार अंसारी के कौमी एकता दल के सपा में विलय को अखिलेश स्वीकार करने को तैयार नहीं थे और बलराम ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अखिलेश के इन तेवरों को बाद कौमी एकता दल का विलय रद कर दिया गया था, पर मामला नहीं थमा। दो माह बाद शिवपाल यादव ने खुल कर अफसरों पर आरोप लगाने के साथ इस्तीफा देने तक की धमकी दे दी थी। अखिलेश उस समय तो चुप रहे किन्तु महीने भर बाद ही सितंबर में उन्होंने गायत्री प्रजापति को मंत्रिमंडल से बाहर कर व दीपक सिंघल को मुख्य सचिव पद से हटाकर तेवर और कड़े कर दिये थे। ऐसा करते हुए अखिलेश मानो स्थितियों का लिटमस टेस्ट ले रहे थे। वे सही थे, दीपक सिंघल को हटाते ही बवाल बढ़ा, अखिलेश प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाए गए तो उन्होंने शिवपाल से तीन विभाग छीन लिये। उसके बाद पिछले चार महीने अखिलेश व रामगोपाल बनाम शिवपाल व मुलायम की लड़ाई चलती रही। अखिलेश आत्मविश्वास से भरे थे और चुनाव आयोग में सही साबित भी हुए। इस पूरी लड़ाई में ममता बनर्जी से लेकर शरद यादव व अजित सिंह तक ने अखिलेश का साथ दिया। ममता बनर्जी ने तो बाकायदा लड़ाई के बीच में उन्हें शुभकामनाएं भी दी थीं। अब जब अखिलेश समाजवादी पार्टी के सबसे बड़े नेता के रूप में उभर चुके हैं, उनके रूप में मोदी विरोधियों को एक मजबूत छत्रप मिलता नजर आ रहा है। वे राष्ट्रीय स्तर पर विचार विमर्श में जुटे हैं और भविष्य के महागठबंधन के मजबूत चेहरे के रूप में खुद को स्थापित कर रहे हैं।