
मेडिकल बोर्ड की कारण सहित राय पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, केंद्र सरकार की याचिका खारिज ( (फोटो सोर्स :AFT Lucknow)
Allahabad High Court Lucknow Bench: राष्ट्र की सुरक्षा में लगभग 38 वर्षों तक अपनी सेवाएं देने वाले पूर्व वायुवीर इन्द्रेश कुमार को आखिरकार न्याय मिल गया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाले निर्णय में भारत सरकार, रक्षा मंत्रालय द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए पूर्व वायुसेना कर्मी के दिव्यांगता पेंशन के अधिकार को बरकरार रखा है। न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि पूर्व वायुवीर को तत्काल प्रभाव से नियमानुसार दिव्यांगता पेंशन तथा उससे संबंधित सभी लाभ उपलब्ध कराए जाएं। यह फैसला न केवल इन्द्रेश कुमार के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि देशभर के पूर्व सैनिकों और सशस्त्र बलों के कर्मियों के अधिकारों की दृष्टि से भी एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है।
फतेहपुर जनपद की बिंदकी तहसील निवासी इन्द्रेश कुमार ने 9 अक्टूबर 1984 को भारतीय वायुसेना में अपनी सेवा प्रारंभ की थी। लगभग चार दशकों तक देश की सेवा करने के बाद वे 30 सितंबर 2022 को अधिवर्षता आयु पूर्ण होने पर सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के समय रिलीज मेडिकल बोर्ड ने उन्हें 30 प्रतिशत डायबिटीज, 30 प्रतिशत उच्च रक्तचाप तथा 15 प्रतिशत दाहिनी आंख में मोतियाबिंद जैसी स्वास्थ्य समस्याओं से प्रभावित पाया। इसके बावजूद मेडिकल बोर्ड ने इन बीमारियों को सैन्य सेवा से संबंधित अथवा सैन्य सेवा के कारण बढ़ी हुई मानने से इनकार कर दिया। परिणामस्वरूप उनका दिव्यांगता पेंशन का दावा अस्वीकार कर दिया गया।
दिव्यांगता पेंशन से वंचित किए जाने के बाद इन्द्रेश कुमार ने सशस्त्र बल अधिकरण (एएफटी), क्षेत्रीय पीठ, लखनऊ का दरवाजा खटखटाया। अधिकरण ने सभी तथ्यों और उपलब्ध अभिलेखों का परीक्षण करने के बाद उनके पक्ष में निर्णय सुनाया और दिव्यांगता पेंशन प्रदान करने का आदेश दिया। लेकिन भारत सरकार, रक्षा मंत्रालय ने इस आदेश को चुनौती देते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में रिट याचिका दाखिल कर दी।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के न्यायमूर्ति आलोक माथुर और माननीय न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने पूरे मामले की विस्तृत सुनवाई की। न्यायालय ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट, सेवा अभिलेख, लागू नियमों और सशस्त्र बल अधिकरण के आदेश का गहन अध्ययन किया। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि मेडिकल बोर्ड ने जिन आधारों पर बीमारियों को सैन्य सेवा से असंबद्ध बताया, उनके समर्थन में कोई स्पष्ट और ठोस कारण दर्ज नहीं किए गए थे। न्यायालय ने माना कि केवल निष्कर्ष लिख देना पर्याप्त नहीं है। यदि किसी सैनिक को उसके वैधानिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है तो मेडिकल बोर्ड का यह दायित्व है कि वह अपने निष्कर्षों के पीछे वैज्ञानिक और चिकित्सकीय आधार भी स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करे।
अपने फैसले में उच्च न्यायालय ने मेडिकल बोर्ड की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी सैनिक को दिव्यांगता पेंशन जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक सुरक्षा लाभ से वंचित करने के लिए केवल औपचारिक या कारण रहित राय पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। अदालत ने कहा कि मेडिकल बोर्ड की राय में स्पष्ट चिकित्सकीय इतिहास, बीमारी के कारण, सेवा परिस्थितियों और नियमों के अनुरूप विस्तृत विश्लेषण होना चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि मेडिकल बोर्ड अपने निष्कर्षों के पीछे पर्याप्त कारण दर्ज नहीं करता, तो ऐसी राय न्यायिक परीक्षण में टिक नहीं सकती और उसके आधार पर सैनिक को अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
अदालत ने अपने निर्णय में इस तथ्य को विशेष महत्व दिया कि इन्द्रेश कुमार ने लगभग 38 वर्षों तक भारतीय वायुसेना में सेवाएं दीं। सेवा में प्रवेश के समय उनके स्वास्थ्य संबंधी कोई गंभीर समस्या दर्ज नहीं थी। डायबिटीज, उच्च रक्तचाप और मोतियाबिंद जैसी बीमारियां सेवा के कई वर्षों बाद सामने आईं। ऐसी परिस्थितियों में न्यायालय ने कहा कि मेडिकल बोर्ड को यह स्पष्ट करना चाहिए था कि यदि सैनिक सेवा के समय पूरी तरह स्वस्थ था तो बाद में उत्पन्न हुई बीमारियों को सैन्य सेवा की परिस्थितियों से असंबद्ध किस आधार पर माना गया। अदालत ने माना कि इस संबंध में मेडिकल बोर्ड अपनी जिम्मेदारी निभाने में असफल रहा।
निर्णय देते समय उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण फैसलों का भी उल्लेख किया। विशेष रूप से धर्मवीर सिंह बनाम भारत संघ तथा राजूमोन टी.एम. बनाम भारत संघ के मामलों में स्थापित सिद्धांतों को आधार बनाया गया।
अदालत ने कहा कि यदि सेवा में भर्ती के समय किसी बीमारी का उल्लेख नहीं है, तो यह माना जाएगा कि सैनिक पूरी तरह स्वस्थ था। बाद में यदि सेवा के दौरान बीमारी उत्पन्न होती है, तो संदेह की स्थिति में उसका लाभ सैनिक को दिया जाना चाहिए। न्यायालय ने यह भी दोहराया कि दिव्यांगता पेंशन से जुड़े नियम कल्याणकारी और सामाजिक सुरक्षा की भावना से बनाए गए हैं, इसलिए उनकी व्याख्या भी सैनिकों के हित में उदारतापूर्वक की जानी चाहिए।
सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सशस्त्र बल अधिकरण के आदेश में किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं है। इसलिए उसमें हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं बनता। अदालत ने भारत सरकार की रिट याचिका को गुण-दोष के आधार पर खारिज करते हुए रक्षा मंत्रालय को निर्देश दिया कि पूर्व वायुवीर इन्द्रेश कुमार को तत्काल प्रभाव से दिव्यांगता पेंशन तथा उससे संबंधित समस्त वैधानिक लाभ उपलब्ध कराए जाएं।
कानूनी विशेषज्ञ विजय कुमार पाण्डेय का मानना है कि यह फैसला भविष्य में हजारों पूर्व सैनिकों के लिए मार्गदर्शक साबित हो सकता है। कई मामलों में मेडिकल बोर्ड बिना पर्याप्त कारण दर्ज किए दिव्यांगता पेंशन के दावों को अस्वीकार कर देता है, जिससे पूर्व सैनिकों को वर्षों तक न्यायालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि मेडिकल बोर्ड की राय अंतिम नहीं मानी जा सकती और यदि उसमें पर्याप्त कारण नहीं हैं तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है।
Updated on:
14 Aug 2026 09:40 am
Published on:
14 Aug 2026 09:40 am
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