1 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

मेरी खबर

icon

प्लस

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

लगातार युद्धों से तंग आए नवाब ने हिंदुओं को दिया पूजा करने का अधिकार

Ram Mandir Katha: गुलाम हुसैन नाम का एक सुन्नी फकीर हनुमान गढ़ी में रहकर भोजन करता था। उसने अफवाह फैलाया कि जो मस्जिद औरंगजेब ने बनवाई थी उसे वैरागियों ने तोड़ दिया। इसके बाद जिहाद की घोषणा हो गई...दंगे में 11 हिंदू और 75 मुसलमान मारे गए। दूसरे दिन नायब कोतवाल ने मुसलमानों को एक बड़ी कब्र में गाड़ दिया जिसे गंजशहीदां कहते हैं...

5 min read
Google source verification
cover_22.png

औरंगजेब ने गढ़ी में एक मस्जिद बनवा दी थी उसे बैरागियों ने गिरा दिया है। इस पर मुसलमानों ने जिहाद की घोषणा कर दी और हनुमान गढ़ी पर धावा बोल दिया।

मुगलकालीन इतिहास में औरंगजेब के बाद उसके बेटों में ही बादशाह बनने के लिए तमाम षडयंत्र और उत्तराधिकार का खूनी जंग होता है। यही वक्त था जब तकरीबन हजार साल से चले आ रहे सल्तनत और मुगल काल का अंत होना शुरू हो चुका था। अंग्रेजों की आवाजाही शुरू थी और तमाम मुगल बादशाह अब अंग्रेजों के रहमोकरम पर या उनके पैंशनर बनने लगे थे। 1740 से 1814 तक अवध का नवाब सआदतअली के समय अयोध्या में पांच बार युद्ध हुए। इन युद्धों का सामना अमेठी के राजा गुरुदत्त सिंह ने जमकर किया।

यह भी पढ़ें: बहू बेगम के आतंक से अयोध्या में घरों के दरवाजे बंद हो जाते

युद्ध से नवाब इतना तंग आ गया कि उसने श्रीराम जन्मभूमि पर मुसलमानों के साथ हिंदुओं को भी पूजन और नमाज की अनुमति दे दी। आगे बढ़ने पर 1814 से 1836 तक नवाब नसीरुद्दीन हैदर का शासन रहा। जब तीन बार हिंदुओं ने जन्मभूमि मुक्ति के लिए संघर्ष किया। इस युद्ध में मकरही के राजा ने मुकाबला किया जबकि 1847 से 1857 तक नवाब वाजिदअली शाह के समय में दो युद्ध हुए जिसमें बाबा उद्धवदास और भींटी नरेश ने लड़ाई लड़ी।


पहले वहां मस्जिद नहीं थी
नवाब वाजिद अली शाह का यह वक्त ऐसा था, जब देश में अंग्रेजी शासन अपनी जड़ें जमा चुका था। 1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि बनने लगी थी। भारत के इतिहास में कहा जाए तो यह ऐसा वक्त था जब हिंदु मुस्लिम एकता अभूतपूर्व देखी जा रही थी। क्यों कि अंग्रेजों के उत्पीड़न के शिकार जितने हिंदू थे उतने ही मुस्लिम भी थे।

दूसरी तरफ सैकड़ों सालों से श्रीराम जन्मभूमि के लिए चला आ रहा हिंदुओं का संघर्ष थमा नहीं था। रह-रहकर चिंगारी भड़कती रही। इन्हीं हालात में नवाब वाजिदअली शाह ने तीन सदस्यीय कमेटी का गठन कर दिया जो यह पता लगाएगी कि विवादित ढांचे के पहले वहां कोई मंदिर था या नहीं था। कमेटी ने जांच पड़ताल के बाद अपनी रिर्पोट नवाब को सौंप दिया। जिसमें कहा गया कि वहां पहले कोई मस्जिद नहीं थी।


यह भी पढ़ें: 20 युद्धों से तंग आया अकबर तो औरंगजेब के समय जन्मभूमि पर हुए 30 हमले


जन्मभूमि हिंदुओं को देने पर अंग्रेजों ने चली चाल
चर्बी लगे कारतूस की बात अंग्रेजी सेना में फैल गई और कमल और रोटी का संदेश गांव-गांव दिया जाने लगा था। अंग्रेजी राज के खिलाफ विद्रोह की चिंगारी सुलगने लगी थी। मेरठ में मंगल पाण्डेय ने विद्रोह कर दिया। विद्रोह की आग देखते ही देखते देश भर में फैल गई। इस विद्रोह के दौरान ही बहादुर शाह जफर को अंग्रेजों ने कैद कर लिया था। क्यों कि उसे हिंदुओं और मुसलमानों ने मिलकर दिल्ली का बादशाह घोषित कर दिया।

यह भी पढ़ें: कैसा था प्राचीन राममंदिर जिसकी पताका गगन में लहराती थी?

इस कालखंड को भारतीय इतिहास में हिंदु-मुस्लिम एकता का अभूतपूर्व समय कहा जा सकता है। अंग्रेजों ने भांप लिया कि भारतीयों की एकता उनके राज के लिए खतरा है। दूसरी तरफ एक ऐसा भी वक्त आया जब बाबा रामचरण दास और अमीर अली की अगुवाई में मुसलमानों ने श्रीरामजन्मभूमि हिंदुओं को सौंपने का निर्णय कर लिया। लेकिन अंग्रेज इस मुद्दे के हल हो जाने पर अपने राज के लिए खतरा देखते थे। उन्होंने बाबा रामचरण दास और अमीर अली को फांसी पर लटका दिया।


थोड़ा पीछे चलते हैं...
हमने चर्चा किया कि 1740 से 1814 तक अवध का नवाब सआदतअली के समय अयोध्या में पांच बार युद्ध हुए। इन युद्धों का सामना अमेठी के राजा गुरुदत्त सिंह ने जमकर किया। वास्तव मेें सआदत खां का दूसरा नाम अमीन बुरहानुल मुल्क था जो कि अवध का सूबेदार था। हांलाकि वह बादशाही की लड़ाई के झगड़ों में फंसा रहा इसलिए अयोध्या पर कोई खास ध्यान नहीं दे पाया। लेकिन उसका सामना अमेठी के राजा गुरुदत्त सिंह से हुआ था। अयोध्या का इतिहास लेखक लाला सीताराम लिखते हैं कि-

समर अमेठी के सरोष गुरुदत्त सिंह,

सादत की सेना समसेरन ते भानी है।

भनत कविंद काली हुलसी असीसन को,

सीसन को ईस की जमाति सरसानी है।

तहां एक जोगिनी सुभट खोपरी लै तामै,

सोनित पियत ताकी उपमा बखानी है।

प्यालौ लै चिनी को छकी जोवन तरंग मानो,

रंग हेतु पीवति मजीठ मुगलानी है।

हांलाकि इतिहास में गुरुदत्त सिंह के युद्ध को विस्तार नहीं दिया गया है, और कई जगह इतिहासकारों ने इसे असत्य भी माना है। लेकिन इस घनाक्षरी (कविता) से साबित होता है कि किस प्रकार गुरुदत्त सिंह ने बुरहानुल मुल्क की सेना का सामना किया था।


बुरहानुल मुल्क के बाद उसका दामाद सफदर जंग अवध का शासक हुआ। उसके समय में अयोध्या के दिन फिरे। उसके पीछे असली कारण इटावा के रहने वाले कायस्थ नवल राय थे। जो सफदरजंग का प्रधानमंत्री था। सेलेक्शन फ्राम हिंदी लिटरेचर पब्लिस्ड बॉय द कलकत्ता यूनिवर्सिटी बुक फर्स्ट में लिखा है कि पंडित माधव प्रसाद शुक्ल ने सुदर्शन पत्र में लिखा है कि मुस्लिम राज में अयोध्या मुर्दो के लिए कर्बला हुई। अयोध्या का बिलकुल स्वरुप ही बदल गया। ऐसी आख्यायिका और मस्नवी गढ़ी गई जिनसे यह सिद्ध हो कि मुसलमान औलियों, फकीरों के लिए यहां कदीमी अधिकार है।


गुलाम हुसैन की कहानी
अंतिम बादशाह वाजिद अली शाह के समय में एक दुर्घटना हुई। जिसका वर्णन अयोध्या का इतिहास में लाला सीताराम बहू बेगम के विश्वास पात्र दराबअली खां के किसी दस्तावेज के माध्यम से करते हैं।

वह लिखते हैं कि गुलाम हुसैन नाम का एक सुन्नी फकीर हनुमान गढ़ी के महंतों के यहां पलता था। उसने एक दिन सुन्नियों को यह कहकर भड़काया कि औरंगजेब ने गढ़ी में एक मस्जिद बनवा दी थी उसे बैरागियों ने गिरा दिया है। इस पर मुसलमानों ने जिहाद की घोषणा कर दी और हनुमान गढ़ी पर धावा बोल दिया।

यह भी पढ़ें: कौन गिरा देता था बाबरी ढांचे की दीवारें, बाबर ने क्यों नहीं बनाई मीनारें

लेकिन हिंदुओं ने उन्हें मार भगाया और वे डरकर जन्मस्थान के बाबरी ढांचे में जाकर छिप गए। कप्तान आर हरसे और कोतवाल मिरजा मुनीम बेग ने झगड़ा निपटाने का अनेक प्रयास किया। बादशाही सेना खड़ी थी लेकिन उसे आदेश था कि वह बीच में न आए। हिंदुओं ने फाटक रेल दिया और युद्ध में 11 हिंदू और 75 मुसलमान मारे गए। दूसरे दिन नासिर हुसैन नायब कोतवाल ने मुसलमानों को एक बड़ी कब्र में दफना दिया जिसे गंज शहीदां कहते हैं।


हम इश्क के बंदे हैं...
इस झगड़े के बाद मुसलमानों ने वाजिद अली शाह को चिट्ठी भेजी और सारा वृतांत लिख दिया। यह भी लिखा कि हिंदुओं ने मस्जिद गिरा दी है। नवाब का जबाव आया कि-

हम इश्क के बंदे हैं, मजहब से नहीं वाकिफ।

गर काबा हुआ तो क्या, बुतखाना हुआ तो क्या।।

इसके बाद ही नवाब वाजिद अली शाह ने तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया था, जिसे अपनी रिर्पोट में बताया कि वहां पर कोई मस्जिद नहीं थी, यह खबर पूरी तरह झूठी है। हांलाकि मुसलमान संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने अमेठी के मौलवी अमीरअली को घटना से अवगत कराया। फिर क्या अमीरअली हनुमान गढ़ी पर हमला करने निकल पड़ा। उसे बादशाह ने किसी भी तरह के लफड़े में पडऩे से मना किया था लेकिन वह नहीं माना और अयोध्या के पास रुदौली में ही मार दिया गया। इसके बाद बादशाह तख्त से उतार दिए गए और नवाबी का अंत हो गया...।