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बनारसियों ने छीना आजमगढ़ की पहचान! पढ़िए बनारसी साडी का राज

दुनिया रेशम की जिन बनारसी साडी की दीवानी है वह बनारस नहीं बल्कि आज़मगढ़ के मुबारकपुर में बनती है

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Santoshi Das

Mar 29, 2016

Azamgadh mahotsav 2016

Azamgadh mahotsav 2016

लखनऊ.
बनारस के बाबुओं ने आजमगढ़ की पहचान छीन ली। दुनिया रेशम की जिन बनारसी साडी की दीवानी है वह बनारस नहीं बल्कि आज़मगढ़ के मुबारकपुर में बनती है। बनारसी साड़ियों का ताना बाना मुबारकपुर में ही बनता है। मगर बनारस के दुकानदारों द्वारा बेचे जाने की वजह से मुबारकपुर की यह साड़ियां बनारसी कही जाती है। इस राज का खुलासा लखनऊ में चल रहे आज़मगढ़ महोत्सव में मुबारकपुर से आये बुनकर कर रहे हैं।


जिस बनारसी रेशम की साडी पर गोल्डन धागे की कढ़ाई, बूटी और उसकी चमक आपको आकर्षित करती है उसको मुबारकपुर में तैयार किया जाता है। कम लोग ही होंगे जिन्हे इस बारे में पता है। मुबारकपुर के कारीगरों को पहचान मिल सके इसलिए सीएम अखिलेश यादव द्वारा आजमगढ़ महोत्सव करवाने का निर्देश दिया गया। उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग की तरफ से आयोजित आजमगढ़ महोत्सव गोमती नगर के पर्यटन भवन में 3 अप्रैल तक चलेगा। यहां साड़ियों के साथ ही आज़मगढ़ के पॉटरी का सामन भी मौजूद । आज़मगढ़ के काली मिटटी के सजावटी सामान और कप लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहा है।



मुबारकपुर के असरा साडी कलेक्शन के राम जतन राम प्रजापति ने बताया की हम लोगों को ख़ुशी हो रही है की सीएम अखिलेश यादव जी के प्रयासों से हम लोगों को अपना हुनर दिखाने का मौका मिल रहा। यहा आने के बाद हम लोगों को बता रहे हैं की बनारस में बिकने वाली साड़ियां आजमगढ़ में बनती हैं।


बनारसी साड़ियों की खासियत

बनारसी साड़ी एक विशेष प्रकार की साड़ी है जिसे विवाह आदि शुभ अवसरों पर हिन्दू स्त्रियाँ धारण करती हैं। उत्तर प्रदेश के चंदौली, बनारस, जौनपुर], आजमगढ़, मिर्जापुर और संत रविदासनगर जिले में बनारसी साड़ियाँ बनाई जाती हैं। इसका कच्चा माल बनारस से आता है। पहले बनारस की अर्थव्यवस्था का मुख्य स्तंभ बनारसी साड़ी का काम था पर अब यह चिंताजनक स्थिति में है। रेशम की साड़ियों पर बनारस में बुनाई के संग ज़री के डिजाइन मिलाकर बुनने से तैयार होने वाली सुंदर रेशमी साड़ी को बनारसी रेशमी साड़ी कहते हैं। ये पारंपरिक काम सदियों से चला आ रहा है और विश्वप्रसिद्ध है। कभी इसमें शुद्ध सोने की ज़री का प्रयोग होता था, किंतु बढ़ती कीमत को देखते हुए नकली चमकदार ज़री का काम भी जोरों पर चालू है। इनमें अनेक प्रकार के नमूने बनाये जाते हैं। इन्हें 'मोटिफ' कहते हैं। बहुत तरह के मोटिफों का प्रचलन चल पड़ा है, परन्तु कुछ प्रमुख परम्परागत मोटिफ जो आज भी अपनी बनारसी पहचान बनाए हुए हैं, जैसे बूटी, बूटा, कोनिया, बेल, जाल और जंगला, झालर आदि।


इतिहास

बनारसी साड़ी का मुख्य केंद्र बनारस है। बनारसी साड़ी मुबारकपुर, मऊ, खैराबाद में भी बनाई जाती हैं। यह माना जा सकता है कि यह वस्त्र कला भारत में मुगल बाद्शाहों के आगमन के साथ ही आई। पटका, शेरवानी, पगड़ी, साफा, दुपट्टे, बैड-शीट, मसन्द आदि के बनाने के लिए इस कला का प्रयोग किया जाता था। भारत में साड़ियों का प्रचलन अधिक था इरान, इराक, बुखारा शरीफ आदि से आए हथकरघा के कारीगरों द्वारा विभिन्न प्रकार के डिज़ाइनों को साड़ियों में डाला जाता था। बेल, बूटी, आंचल एवं कोनिया आदि। उस समय में रेशम एवं ज़री के धागों का प्रयोग किया जाता था। ताने में कतान और बाने में पाट बाना प्रयोग किए जाते थे जिस के परिणाम स्वरूप वस्त्र अति मुलायम व गफदार बनते थे। पूर्व में नक्शा, जाला से साड़ियां बनाई जाती थीं। उसके बाद डाबी तथा जेकार्ड का प्रयोग होने लगा जो कि परम्परा से हटकर माना जा सकता है और अब यह पावर-लूम के रूप में विकसित हुई मानी जा सकती है। बनारसी साड़ी बनाने वाले ज्यादातर कारीगर मुसलमान - अनसारी होते हैं। कवि कबीर भी बुनकर थे। इस साड़ी के खरीददार गुजराती, मारवाड़ी, राजपूत और जिम्मेदार घरानों के लोग होते हैं। प्राचीन समय से ही बनारसी साड़ियों का प्रयोग विशेषतौर से विवाह समारोहों में दुल्हन व नवविवाहिता स्त्रियों द्वारा प्रयोग किया जाता था और आज तक यह परम्परा चलती आ रही है