
पूरी दुनिया में हैं बासमती के कद्रदान, फिर भी कई देशों ने मोड़ लिया था इस चावल से मुंह, ये है खतरनाक वजह,पूरी दुनिया में हैं बासमती के कद्रदान, फिर भी कई देशों ने मोड़ लिया था इस चावल से मुंह, ये है खतरनाक वजह
लखनऊ. लजीज भारतीय बासमती चावल (Basmati Chawal) के कद्रदान पूरी दुनिया में हैं लेकिन अचानक दुनिया के कई देश इससे मुंह मोड़ने लगे। इसकी वजह थी बासमती में अधिक मात्रा में कीटनाशक का प्रयोग। फसल में पेस्टिसाइड्स के इस्तेमाल से भारतीय बासमती की गुणवत्ता पर असर पड़ा। जिसके कारण निर्यात भी प्रभावित हुआ। पंजाब और हरियाणा के किसानों द्वारा बासमती चावल में प्रयोग किये जा रहे खतरनाक कीटनाशक की वजह से यूपी के बासमती चावल का निर्यात भी लगभग ठप पड़ गया। दाम नहीं मिलने से किसान परेशान हुए तो कारोबारियों के सामने भी संकट के बादल छा गए। लेकिन अब एक बार फिर बासमती चावल की रुहानी खुशबू पूरी दुनिया तक फैलने वाली है। किसानों और कारोबारियों के चेहरों पर वही पुरानी मुस्कान लोटने वाली है। क्योंकि जिस खतरनाक कीटनाशक के चलते बासमती की धाक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कम हुई थी उसे केंद्र सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया है।
इस वजह से निर्यात में आई थी कमी
केंद्र सरकार ने ट्राइसाइक्लोजोल व बूपरोफेन्जिम नामक खतरनाक कीटनाशक को प्रतिबंधित कर दिया है, जिसके चलते बासमती के निर्यात में कमी आई। अब पंजाब-हरियाणा के किसान उस कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे और यूरोपीय बाजार में यूपी के बासमती चावल की डिमांड भी एक बार फिर बढ़ेगी। मेरठ सहित वेस्ट यूपी और तराई के कई इलाकों में बड़े पैमाने पर बासमती की खेती की जाती है। ऐसे में यूपी के किसान खुश हैं कि उनकी फसल का भी निर्यात हो सकेगा। कई जगहों पर किसानों ने मिठाइयां बांटकर अपनी खुशी का इजहार किया। उनका कहना है कि हमारे यहां दोनों दवाएं ही न के बराबर प्रयोग होती हैं। लेकिन पंजाब और हरियाणा के चलते हमारा भी कंसाइन्मेंट फंस जाता था। देश के कुल उत्पादन का 27 से 28 प्रतिशत यानी लगभग 17.08 लाख टन बासमती चावल अकेले यूपी में होता है।
कीटनाशक का बेहिसाब इस्तेमाल
बासमती के धान में कीड़े न लगें इसलिए पंजाब व हरियाणा में किसान ट्राइसाइक्लोजोल व बूपरोफेन्जिम नामक कीटनाशक का बेहिसाब इस्तेमाल करते थे। अब इस कीटनाशक पर केंद्र सरकार ने पूरी तरह से पाबंदी लगाई है। इससे चावल की गुणवत्ता पर असर पड़ता है। जिसके चलते यूरोपीय देशों के साथ ही अमेरिका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जापान व दक्षिण कोरिया ने बासमती चावल का निर्यात रोक दिया। इससे किसानों को करोड़ों का नुकसान होने लगा था। ऐसा तब था जब यूपी के किसान इन कीटनाशकों का इस्तेमाल बहुत कम या नहीं के बराबर करते थे। लेकिन सब धान एक पसेरी की कहावत यूपी के किसानों पर चरितार्थ हुई और उनका बासमती चावल भी यूपी की बाजारों में नकारा जाने लगा।
बासमती की मांग में आई कमी
कृषि जानकारों का कहना है कि फसलों में कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग बढ़ने से देश में बासमती की गुणवत्ता प्रभावित हुई। इससे यूरोपीय और खाड़ी देशों में भारतीय बासमती की मांग में कमी आई। कीटनाशक को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नियम काफी कठोर हैं। इसकी वजह से पिछले वर्षों की तुलना में बासमती के दामों में 15-20 प्रतिशत की गिरावट भी आई। इससे किसानों की कमाई पर असर पड़ा।
यहां हैं बासमती के मुरीद
सऊदी अरब व ईरान भारतीय बासमती के सबसे बड़े मुरीद हैं। बासमती मुख्य रूप से अरब देशों, अमेरिका व यूरोप में निर्यात किया जाता है। भारत से हर वर्ष करीब 27 हजार करोड़ रुपये की बासमती का निर्यात होता है। इसमें सबसे अधिक सऊदी अरब को निर्यात किया जाता है।
मुरादाबाद के पीतल से हटी पाबंदी
अपने परमाणु कार्यक्रम की वजह से अमेरिका और विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के कड़े प्रतिबंधों के चलते ईरानी मुद्रा में आए अवमूल्यन को रोकने के लिए 2018 में ईरान ने 1450 हस्तशिल्प उत्पादों के आयात पर रोक लगा दी थी। इन उत्पादों में मुरादाबाद के ब्रास यानी पीतल, एल्युमीनियम और कांच के हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट भी शामिल हैं। प्रतिबंध झेल रहे ईरान ने अब दो साल की पाबंदी के बाद मुरादाबाद के पीतल के लिए फिर से अपने दरवाजे खोल दिए हैं। हालांकि एल्युमीनियम और कांच व अन्य हस्तशिल्प उत्पादों पर यह प्रतिबंध अभी भी जारी रहेगा। दरअसल अमेरिका और ईरान के बीच टकराव बढ़ने के बाद 2017 में डब्ल्यूटीओ ने डॉलर में ईरान के साथ कारोबार करने पर रोक लगा दी थी। इसके बाद ईरानी आयातक अन्य देशों की मार्फत मुरादाबाद से माल मंगाकर निर्यातकों को थर्ड पार्टी डॉलर पेमेंट देेते रहे। प्रतिबंध के चलते दोनों देशों में सीधा कोई लेनदेन नहीं हो रहा था। निर्यातकों के पास ईरान से सिर्फ रुपये में व्यापार का रास्ता ही बचा था।
Updated on:
18 Feb 2020 08:31 am
Published on:
18 Feb 2020 08:29 am
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