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​​​​​शर्मनाक… यूपी के शहरों में मारी जा रही बेटियां

बेटी बचाओ का नारा ग्रामीण इलाकों में तो कारगर होता दिख रहा है किन्तु शहरी बेटियों को मारने में पीछे नहीं हैं

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Sanjeev Mishra

Jan 17, 2017

save girl child

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डॉ.संजीव

लखनऊ.
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे नारे और बड़ी-ब़ड़ी बातें। उत्तर प्रदेश के मामले में ये सब बेमतलब है। यहां आज भी शहरों में बेटियां मारी जा रही हैं और पुलिस से लेकर स्वास्थ्य महकमा तक मौन है। आंकड़े गवाह हैं कि उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय औसत की तुलना में अधिक बेटियां मर रही है, वहीं प्रदेश के भीतर भी ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरी इलाको में बेटियों की मौत का प्रतिशत ज्यादा है।


केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों को आधार बनाते हुए सेंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) ने बाल मृत्यु दर पर देश भर की रिपोर्ट जारी की है। उत्तर प्रदेश को लेकर यह एसआरएस बुलेटिन कई चौंकाने वाले तथ्य प्रस्तुत करता है। सर्वाधिक निराश करने वाली कहानी बालिकाओं की हत्या के रूप में सामने आ रही है। शहरी लोग भले ही पढ़े-लिखे होने का दावा करें किन्तु यह रिपोर्ट बताती है कि शहरों में बालिकाओं को मारा जा रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर बाल मृत्यु दर 3.7 फीसद है, जबकि उत्तर प्रदेश में यह तुलनात्मक रूप से अधिक यानी 4.6 फीसद है। राष्ट्रीय स्तर पर 3.9 फीसद बेटियां मौत की शिकार होती हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा 4.8 फीसद है। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि ग्रामीण इलाकों में कुल बाल मृत्यु दर 4.8 फीसद के साथ बालक-बालिकाओं की मृत्यु का औसतन लगभग बराबर, 4.8 व 4.9 फीसद है, वहीं शहरी इलाकों में इसमें भारी अंतर देखने को मिलता है। शहरी इलाकों में कुल बाल मृत्यु दर 3.6 फीसद है, जिसमें से बेटों की संख्या काफी कम यानी 3.1 फीसद ही है। इसके विपरीत शहरी इलाकों में बेटियों की मृत्यु दर 4.2 फीसद है। इससे स्पष्ट है कि ये बेटियां स्वाभाविक मौत नहीं मर रहीं, इनकी हत्या की जा रही है और शासन-प्रशासन इस ओर आंख मूंदे बैठा है।


आंकड़े देते गवाही
इस रिपोर्ट के आंकड़े बालिकाओं की देखरेख में लापरवाही व कई बार जानलेवा स्थितियां पैदा कर देने तक की गवाही देते हैं। आंकड़ों के मुताबिक स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार कहा जाए या जागरूकता, नवजात शिशुओं की देखरेख अब पहले से ज्यादा सुगम हो गयी है। राष्ट्रीय स्तर पर कुल बाल मृत्यु दर में से 29 दिन से कम आयु में 67.6 फीसद बच्चों की मृत्यु हो जाती है। इनमें से ग्रामीण इलाकों में 69.6 व शहरी इलाकों में 58.3 फीसद बच्चे जान गंवाते हैं। उत्तर प्रदेश में इस आयु में मरने वाले बच्चों की संख्या कुल बाल मृत्यु दर में से 67.4 प्रतिशत होती है। ग्रामीण इलाकों में आज भी अधिक संख्या में, 70.4 फीसद नवजात शिशु जान गंवा रहे हैं। शहरी इलाकों में नवजात शिशुओं की मृत्यु दर कुल बाल मृत्यु दर की तुलना में 52.4 फीसद है। ऐसे में शहरी क्षेत्रों में बेटियों का ज्यादा मरना उनके लिए जानलेवा स्थितियां उत्पन्न किये जाने का स्पष्ट प्रमाण है।


गांवों में
बेटियां सुरक्षित
इस रिपोर्ट के आंकड़े साफ कहते हैं कि शहरों की तुलना में बेटियां गांवों में अधिक सुरक्षित हैं। जागरूकता का असर भी शहरों की तुलना में गांवों में अधिक पड़ा है। रिपोर्ट में पिछले दस साल का तुलनात्मक अध्ययन तो यही कहानी कहता है। इसके मुताबिक दस साल में राष्ट्रीय स्तर पर बाल मृत्यु दर में 33.2 प्रतिशत की कमी आयी है। उत्तर प्रदेश की बात करें तो यह कमी 33.8 प्रतिशत है। इनमें भी शहरी क्षेत्रों के 31.3 प्रतिशत की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में बाल मृत्यु दर 32.5 प्रतिशत कम हुई है।


धड़ल्ले से लिंग परीक्षण

यह रिपोर्ट तो बाल मृत्यु दर के आधार पर बेटियों की जान लेने का दावा करती है किन्तु तमाम बेटियां कोख में ही मारी जा रही हैं। लिंग परीक्षण पर कानूनी रोक के बावजूद डॉक्टर धड़ल्ले से लिंग परीक्षण कर रहे हैं। मनमाने ढंग से अल्ट्रासाउंड केंद्र संचालित हो रहे हैं और उन पर कोई अंकुश नहीं लग रहा है। हाल ही में राजधानी लखनऊ में एक डॉक्टर दंपति ने अपनी डॉक्टर बहू का जबरन अल्ट्रासाउंड कराया और गर्भ में बेटी होने पर उसे गर्भपात के लिए मजबूर किया। मामला मेडिकल काउंसिल तक गया और उक्त दंपति के खिलाफ कार्रवाई हुई। यह मामला तो खुल गया, किन्तु रोज ऐसे सैकड़ों मामले हो रहे हैं, जिनकी शिकायत ही नहीं हो पाती और मनमाने ढंग से लिंग परीक्षण कर बेटियों की गर्भ में ही हत्या का सिलसिला चल रहा है।


हर माह समीक्षा

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के निदेशक आलोक कुमार भी इन स्थितियों को स्वीकार करते हैं। उनका मानना है कि गांवों की तुलना में शहरों में अधिक बेटियों की मौत चिंताजनक है। इसके लिए अब अस्पतालों की बाल स्वास्थ्य रक्षा इकाइयों से लेकर सघन चिकित्सा इकाइयों तक की समीक्षा हर माह करनी शुरू कर दी गयी है। इस समीक्षा में यह भी ध्यान दिया जाता है कि किस हद तक बदलाव आया है। वैसे सकल बाल मृत्यु दर में कमी आयी है और उत्तर प्रदेश बच्चों की सुरक्षा के मामले में कई अन्य राज्यों की तुलना में श्रेष्ठ साबित हुआ है। यह स्थिति संतोषजनक है, पर इसमें सुधार के लिए प्रयास लगातार चल रहे हैं।