केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों को आधार बनाते हुए सेंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) ने बाल मृत्यु दर पर देश भर की रिपोर्ट जारी की है। उत्तर प्रदेश को लेकर यह एसआरएस बुलेटिन कई चौंकाने वाले तथ्य प्रस्तुत करता है। सर्वाधिक निराश करने वाली कहानी बालिकाओं की हत्या के रूप में सामने आ रही है। शहरी लोग भले ही पढ़े-लिखे होने का दावा करें किन्तु यह रिपोर्ट बताती है कि शहरों में बालिकाओं को मारा जा रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर बाल मृत्यु दर 3.7 फीसद है, जबकि उत्तर प्रदेश में यह तुलनात्मक रूप से अधिक यानी 4.6 फीसद है। राष्ट्रीय स्तर पर 3.9 फीसद बेटियां मौत की शिकार होती हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा 4.8 फीसद है। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि ग्रामीण इलाकों में कुल बाल मृत्यु दर 4.8 फीसद के साथ बालक-बालिकाओं की मृत्यु का औसतन लगभग बराबर, 4.8 व 4.9 फीसद है, वहीं शहरी इलाकों में इसमें भारी अंतर देखने को मिलता है। शहरी इलाकों में कुल बाल मृत्यु दर 3.6 फीसद है, जिसमें से बेटों की संख्या काफी कम यानी 3.1 फीसद ही है। इसके विपरीत शहरी इलाकों में बेटियों की मृत्यु दर 4.2 फीसद है। इससे स्पष्ट है कि ये बेटियां स्वाभाविक मौत नहीं मर रहीं, इनकी हत्या की जा रही है और शासन-प्रशासन इस ओर आंख मूंदे बैठा है।