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भोजशाला पर हाईकोर्ट के फैसले पर भड़के AIMIM नेता वारिस पठान, सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की कही बात

भोजशाला विवाद पर हाईकोर्ट के फैसले ने नई बहस छेड़ दी है। कोर्ट ने ऐतिहासिक दस्तावेजों और ASI रिपोर्ट के आधार पर इसे शिक्षा और वाग्देवी मंदिर का केंद्र माना।

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लखनऊ

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Anuj Singh

May 16, 2026

भोजशाला विवाद में वारिस पठान भड़के

भोजशाला विवाद में वारिस पठान भड़के Source- X

Bhojshala Verdict News: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद विवाद पर बहुत चर्चित फैसला सुनाया है। कोर्ट ने भोजशाला को वाग्देवी मंदिर माना है। कोर्ट का कहना है कि राजा भोज के समय यह जगह शिक्षा का बड़ा केंद्र थी। इसलिए यहां मूर्ति स्थापित की जा सकती है। हिंदू पक्ष को पूजा-अर्चना का अधिकार दे दिया गया है।

कोर्ट ने किन बातों पर दिया फैसला

हाईकोर्ट ने पुरातत्व विभाग (ASI) की सर्वे रिपोर्ट, ऐतिहासिक तथ्यों और पुरानी दस्तावेजों को ध्यान में रखकर फैसला सुनाया। कोर्ट ने ASI एक्ट के प्रावधानों और अयोध्या मामले के फैसले को भी आधार बनाया। कोर्ट ने ASI के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें मुस्लिमों को नमाज पढ़ने की इजाजत दी गई थी। फैसला सुनाते समय कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्षों ने सुनवाई के दौरान अच्छा और सहयोगपूर्ण व्यवहार किया, जिसकी कोर्ट सराहना करता है।

वारिस पठान का विरोध

AIMIM नेता वारिस पठान ने हाईकोर्ट के इस फैसले से पूरी विनम्रता से असहमति जताई है। उन्होंने कहा कि यह फैसला कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर बिना गौर किए लिया गया है। वारिस पठान का कहना है कि कोर्ट ने 'पूजा स्थल अधिनियम 1991' को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। इस कानून में साफ लिखा है कि 15 अगस्त 1947 को जो भी धार्मिक स्थल जैसा था, उसकी प्रकृति और स्वरूप नहीं बदला जा सकता। उन्होंने आगे कहा कि यहां लोग जुमे की नमाज पढ़ते थे, लेकिन अब उसे रोक दिया गया। बाबरी मस्जिद मामले में कोर्ट ने मुस्लिमों को वैकल्पिक जमीन देने की बात कही थी। अब इस मामले में भी वैकल्पिक जमीन देने की बात हो रही है। उन्होंने पूछा कि यह क्या दोहराव है?

आगे क्या होगा?

वारिस पठान ने कहा कि इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी। मुस्लिम पक्ष ने भी स्पष्ट कर दिया है कि वे हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएंगे और न्याय की उम्मीद रखते हैं।

लंबे समय से चल आ रहा विवाद

यह फैसला भोजशाला को लेकर लंबे समय से चले आ रहे विवाद में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। हिंदू पक्ष इसे अपनी जीत बता रहा है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे 1991 के कानून का उल्लंघन मान रहा है। अब सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं, जहां यह मामला फिर से सुनवाई के लिए जाएगा।