
विकास नहीं यूपी में जीत के लिए जातिय समीकरण है सबसे मजबूत कड़ी
लखनऊ. कोई भी पार्टी विकास करने और कराने के जितने भी दावे कर उसके दावे यहां पर अक्सर फेल हो जाते हैं क्योंकि यहां तो जीत का जुगाड़ जाति से तय होता है। हम बात कर रहे हैं अपने यूपी की राजनीति में जातिय समीकरण किसी भी पार्टी के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। जिस पार्टी ने जातिय जुगाड़ बैठा लिया उसकी जीत समझो पक्की है। यूपी में जीत के लिए जातिय समीकरण सबसे महत्पवूर्ण है। यहां जतीय समीकरण का ताना बाना जिस पार्टी ने बुन लिय उसकी सरकार बननी तय मानी जाती है। अब 2019 के लोकसभा के लिए राजनीतिक जोड़-तोड़ शुरू हो गया है। भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस ये पार्टियां अपनी जीत पक्की करने को जाती का जुगाड़ सेट करने में लग गई हैं।
यूपी में लोकसभा का चुनाव हो या विधानसभा का यहां पर जातीय समीकरण शुरू से ही अहम भूमिका निभाता आया है। यहां देखा जाए तो राजनीतिक पाटियां अपनी चुनावी रणनीति जातीय समीकरण को ही ध्यान में रखकर बनाती हैं। सियासी दल यहां विकास के जितने भी दावें करें ये दावे उस समय खोखले साबित हो जाते हैं जब टिकटों के बंटवारे का समय आता है।
अहम भूमिका निभाता है
यहां अगड़ी, पिछड़ी, दलित जाति का वोट बैंक हर पार्टी के लिए महत्वपूर्ण है। कोई दल पिछड़ी व दलित को लेकर तो कोई दल अगड़ी और दलित को लेकर तो कोई अगड़ी और पिछड़ी जाति को लेकर अपना समीकरण बनाते हैं। यूपी में 25 फीसदी वोट दलितों का है। यह वोट राजनीति में बड़ा मायने रखता है। वैसे तो इस वोट को बसपा का वोट माना जाता रहा है, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने इसमें सेंधमारी कर दी और यह वोट भाजपा के पक्ष में गया जिससे भाजपा की यूपी में भारी जीत हुई। इसके बाद अगड़ी जाति का वोट बैंक है जो कई जातियों में बंटा हुआ है। यह प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अगड़ी जातियों में मुख्यरुप से ब्राह्मण, ठाकुर आते हैं। इन दोनों के वोटों पर सभी राजनीति पार्टियों की नजरें होती हैं। इसके अलावा पिछड़ी जातियों का वोट बैंक भी यूपी के चुनाव में अहम भूमिका निभाता है।
कौन सी जाति और कितना प्रतिशत
यूपी में एक तरफ जहां दलितों का वोट बैंक 25 प्रतिशत है तो वहीं ब्राह्मणों का वोट 8 प्रतिशत, 5 प्रतिशत ठाकुर व अन्य अगड़ी जाति तीन प्रतिशत हैं। देखा जाए तो अगड़ी जाति का कुल वोट प्रतिशत 16 प्रतिशत है। वहीं पिछड़ी जाति के वोटों का प्रतिशत देखें तो करीब 35 प्रतिशत वोट हैं। इसमें 13 प्रशित यादव, 12 प्रतिशत कुर्मी और 10 प्रशित अन्य जातियों के लोग आते हैं। अब यहां पर सवाल यह उठता है कि जिस पार्टी ने यूपी में जातिय गणित को साध लिया उसकी जीत पक्की मानी जाती है।
इन पर भी तमाम दलों की नजरें
इन सभी जातियों में तमाम दलों का अलग-अलग वोट बैंक है। एक ओर जहां सपा को पिछड़ी जाति का अगुवा माना जाता है तो वहीं बसपा को दलित वोट बैंक का तो भाजपा को अगड़ी जाति के वोट का पैरोकार माना जाता है। वहीं जातिय समीकरण के अतिरिक्त यूपी में 18 प्रतिशत मुस्लिम वोट और पांच प्रतिशत जाट वोट हैं। ये दोनों भी प्रदेश की राजनीति में अहम भूमिका निभाते हैं। इन पर भी तमाम दलों की नजर रहती है।
ये दोनों जाति जिधर गई जीत उसकी पक्की
यूपी में 25 फीसदी दलित और 35 फीसदी पिछड़ी जाति का वोट किसी भी पार्टी के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। अगर ये दोनों वोट किसी भी दल की ओर जाएंगे तो समझो उसकी जीत पक्की।
तीस प्रतिशत वोट पर जीत तय
राजनीति में वैसे तो कई समीकरण मायने रखते हैं, लेकिन देखा जाए तो यूपी में जो भी पार्टी अगर तीस फीसदी वोट पा जाती है तो समझो उसकी सरकार बननी तय है और वह प्रदेश में सरकार बनाने में सफल हो जाती है। 2019 में लोकसभा के चुनाव होने वाले हैं तो ऐसे में भाजपा विकास के दावे चाहे जितने भी करे उसकी भी नजरें जाति के जुगाड़ पर टिक गई हैं। लोकसभा चुनाव सपा-बसपा मिल कर लडऩे की घोषणा कर चुकी हैं तो ऐसे में भाजपा के लिए 2019 का लोकसभा चुनाव 2014 की तरह आसान न होकर काफी कठिन होगा।
Published on:
04 Jul 2018 02:44 pm
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