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चंबल घाटी के बीहड़ बन रहे है फिल्मकारों की पहली पसंद, इन हिट फिल्मों की हो चुकी है शूटिंग

Bollywood News: चंबल के बीहड अब बॉलीवुड फिल्म मेकर्स की पहली पसंद बनती जा रही है। यही वजह है कि एक के बाद एक फिल्म की शूटिंग हो रही है।

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लखनऊ

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Snigdha Singh

May 29, 2022

Chambal Ghati Beehad becoming filmakers priority of Bollywood

Chambal Ghati Beehad becoming filmakers priority of Bollywood

सैकडों वर्षों से कुख्यात डाकुओं की शरणस्थली के तौर पर पहचानी जाने वाली चंबल घाटी के खूबसूरत बीहड फिल्मकारों की पहली पंसद बनते जा रहे है। इन बीहडों में पहले ही सैकड़ों फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है। अब वेब सीरीज के निर्माता निर्देशकों भी चंबलघाटी का रुख करने मे जुट गये है ।
इंसानों और जानवरों के रिश्तों से ताल्लुक रखने वाली ‘अरण्य’ फिल्म के तीसरे सीजन की शूटिंग चंबल घाटी में करने की तैयारी में निर्माता निर्देशक विनोद नागर जुट गए हैं। उनका कहना है कि अरण्य फिल्म के तीसरे सीजन की शूटिंग में इटावा के नवोदित कलाकार प्रवीण कुमार को मुख्य भूमिका मे लिया गया है। सैकड़ों फिल्मों की शूटिंग के बाद अब वेब सीरीज से जुड़े फिल्म मेकर्स की पसंद चंबल घाटी का बनना चंबल की अहमियत बयां कर रहा है। अरण्य के तीसरे सीजन की शूटिंग 15 जून के बाद इटावा और चंबल घाटी में शुरू होने की उम्मीद है।

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क्या है अरण्य की कहानी
विनोद नागर का कहना है कि उनकी फिल्म जंगल और इंसानो के रिश्तो पर आधारित है। असल मे वन्य जीवों के लिए तब मुश्किलें आना शुरू हो जाती हैं, जब इंसान जानवरों के बीच पहुंचना शुरू कर देते है। उन्होंने कहा कि यह खास मौका है जब किसी वेबसीरीज फिल्म की शूटिंग के लिए किसी फिल्म मेकर ने चंबल के खूबसूरत बीहडो को पसंद किया है ।

चंबल घाटी को बोलते हैं फिल्मलैंड
चंबल फाउंडेशन के संस्थापक शाह आलम का कहना है कि एक दौर ऐसा आया जब देश में बनने वाली हर चौथी फिल्म की कहानी या लोकेशन चंबल घाटी होती रही है। इसी वजह से चंबल घाटी को फिल्मलैंड कहा जाता है। जमींदारों के अत्याचार, आपसी लड़ाई और जर-जोरू और जमीन के झगड़ों को लेकर 1963 में आई फिल्म ‘मुझे जीने दो’ के बाद इस विषय पर सत्तर के दशक में बहुत सारी फिल्में, चंबल के बीहड़ और बागियों को लेकर बनीं।

चंबल में शूट हुईं ये हिट फिल्में व सीरीज
इनमें डाकू मंगल सिंह -1966, मेरा गांव मेरा देश-1971, चम्बल की कसम-1972, पुतलीबाई-1972, सुल्ताना डाकू-1972, कच्चे धागे-1973, प्राण जाएँ पर बचन न जाए-1974, शोले-1975, डकैत-1987, बैंडिट क्वीन-1994, वुंडेड -2007, पान सिंह तोमर-2010, दद्दा मलखान सिंह और सोन चिरैया-2019 आदि हैं।

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