18 जनवरी 2026,

रविवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

जलवायु परिवर्तन और कार्बन डाई ऑक्‍साइड के उत्‍सर्जन में वृद्धि से ख़त्म हो रहा है हमारे भोजन से पोषण

जलवायु परिवर्तन और कार्बन डाई ऑक्‍साइड के उत्‍सर्जन में वृद्धि से ख़त्म हो रहा है हमारे भोजन से पोषण

3 min read
Google source verification

लखनऊ

image

Ruchi Sharma

Aug 28, 2018

news

जलवायु परिवर्तन और कार्बन डाई ऑक्‍साइड के उत्‍सर्जन में वृद्धि से ख़त्म हो रहा है हमारे भोजन से पोषण

लखनऊ. ‘हार्वर्ड टी एच चान स्‍कूल ऑफ पब्लिक हेल्‍थ’ की एक नयी अध्‍ययन रिपोर्ट से पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन और कार्बन डाई ऑक्‍साइड (सीओ2) के उत्‍सर्जन में वृद्धि से खाद्य सुरक्षा को खतरा पैदा होता है। चावल तथा गेहूं जैसी प्रमुख फसलों के पोषक तत्‍वों को नष्‍ट कर रहा है। यही स्थिति रही तो वर्ष 2050 तक दुनिया के 17.5 करोड़ लोगों में जिंक की कमी हो जाएगी, वहीं 12.2 करोड़ लोग प्रोटीन की कमी से ग्रस्‍त होंगे। जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम में बदलाव के परिणामस्‍वरूप पड़ने वाले सूखे, गर्मी और अत्‍यधिक बारिश से फसलों की उत्‍पादकता और उपलब्‍धता ही नहीं बल्कि उनका पोषण पर भी बेहद बुरा असर पड़ सकता है।

कार्बन डाई ऑक्‍साइड के बढ़ते स्‍तर से फसलों में मौजूद पोषक तत्‍वों के स्‍तर में कमी आती है। इससे मानव को मिलने वाले पोषण पर सीधा असर पड़ सकता है। ‘हार्वर्ड टी एच चान स्‍कूल ऑफ पब्लिक हेल्‍थ’ की रिपोर्ट में किये गये अनुसंधानों से यह संकेत मिलते हैं कि अधिक कार्बन डाई ऑक्‍साइड के स्‍तर वाले क्षेत्रों में उगायी गयी फसलों में आयरन, जिंक, प्रोटीन तथा कुछ विटामिनों का स्‍तर कम पाया गया है।कुछ निश्चित क्षेत्रों में रहने वाले और सामाजिक तथा आर्थिक लिहाज से निम्‍न पृष्‍ठभूमि में रहने वाले लोगों पर सबसे ज्‍यादा दुष्‍प्रभाव पड़ने की आशंका है।

रिपोर्ट के मुताबिक इस शताब्‍दी के मध्‍य तक मानव की गतिविधियों के कारण उत्‍पन्‍न होने वाली कार्बन डाई ऑक्‍साइड के उत्‍सर्जन से 17.5 करोड़ लोगों में जिंक की, जबकि 12.2 करोड़ लोगों में प्रोटीन की कमी हो सकती है। दुनिया में इस वक्‍त एक अरब से ज्‍यादा लोग इन तत्‍वों की कमी से जूझ रहे हैं और जो आसार हैं, उन्‍हें देखते हुए स्थि‍ति बदतर होने की प्रबल आशंका है।

अध्‍ययन के अनुसार मोटे तौर पर पांच साल तक के बच्‍चे और 15 से 50 साल की उम्र वाली औरतों सहित 1.4 अरब लोग एनीमिया के गम्‍भीर खतरे वाले क्षेत्रों में रहते हैं और सीओ2 के बढ़ते प्रभाव के परिणामस्‍वरूप उनके भारी मात्रा में आयरन से वंचित होने का खतरा है। कार्बन डाई ऑक्‍साइड के उच्‍च प्रभाव वाले क्षेत्रों में उगायी जाने वाली फसलों में प्रोटीन, आयरन और जिंक की मात्रा में क्रमश: 10 प्रतिशत, 6 प्रतिशत और 7 प्रतिशत की कमी हो जाती है।


अध्‍ययन के अनुसार एशिया, अफ्रीका और मिडिल ईस्‍ट पर सबसे ज्‍यादा खतरा

मानव की गतिविधियों के कारण होने वाले सीओ2 के उत्‍सर्जन का फसलों की पोषणीयता पर पड़ने वाले प्रभाव को दुनिया भर में महसूस किया जाएगा लेकिन अफ्रीका, दक्षिणपूर्वी एशिया और पश्चिम एशिया में रहने वाली आबादी पर सबसे ज्‍यादा असर पड़ने का खतरा है। इन क्षेत्रों में भी भारत पर जोखिम सबसे ज्‍यादा है क्‍योंकि यहां कुपोषण की दर ऊंची है और यहां का खान-पान यहां के लोगों को एक खास जोखिम के सामने ला खड़ा करता है।

कार्बन डाई ऑक्‍साइड का बढ़ता हुआ स्‍तर अरबों लोगों में मौजूद कुपोषण की स्थिति को और भी बदतर कर सकता है। साथ ही यह करोड़ों नये लोगों को भी इस खतरे के दायरे में ला सकता है। दुष्‍प्रभाव में आये ऐसे नये जनसमूह जिनमें किसी एक पोषक तत्‍व की कमी थी, वे एक से ज्‍यादा पोषक तत्‍वों की कमी के शिकार हो सकते हैं। कुपोषण के ज्‍यादा होने से उसके स्‍वास्‍थ्य पर और भी गम्‍भीर प्रभाव पड़ सकते हैं।


कार्बन डाई ऑक्‍साइड का बढ़ता हुआ स्‍तर अरबों लोगों में मौजूद कुपोषण की स्थिति को और भी बदतर कर सकता है। साथ ही यह करोड़ों नये लोगों को भी इस खतरे के दायरे में ला सकता है। दुष्‍प्रभाव में आये ऐसे नये जनसमूह जिनमें किसी एक पोषक तत्‍व की कमी थी, वे एक से ज्‍यादा पोषक तत्‍वों की कमी के शिकार हो सकते हैं। कुपोषण के ज्‍यादा होने से उसके स्‍वास्‍थ्य पर और भी गम्‍भीर प्रभाव पड़ सकते हैं।


कार्बन डाई ऑक्‍साइड उत्‍सर्जन का स्‍तर लगातार बढ़ रहा है, लिहाजा सभी देशों की सरकार को चाहिये कि वह अपने यहां उगायी जाने वाली फसलों की निगरानी करे ताकि उनमें पोषण के स्‍तर का पता लगाया जा सके। पोषक तत्‍वों के मामले में अधिक लचीली फसल की इन किस्‍मों के उत्‍पादन पर ध्‍यान देने से स्‍थानीय आबादी पर पड़ने वाले स्‍वास्‍थ्‍य सम्‍बन्‍धी जोखिमों को कम किया जा सकता है।

इंसानी गतिविधियों के कारण निकलने वाली कार्बन डाई ऑक्‍साइड की वजह से उत्‍पन्‍न कुपोषण को टालने का सबसे सीधा रास्‍ता यही है कि इसके उत्‍सर्जन में तेजी से कमी लायी जाए। इसके अलावा, जोखिम की आशंका वाली आबादियों में आहार सम्‍बन्‍धी विविधीकरण को बढ़ावा देने, पूरक आहार देने, बायोफोर्टिफाइड फसलें उगाने और सीओ2 के बढ़े हुए स्‍तर के प्रति कम संवेदनशीलता दिखाने वाली फसलें उगाये जाने से स्थिति पर नियंत्रण किया जा सकता है। लेकिन ये कोई रामबाण इलाज नहीं है। इन सभी उपायों को जमीन पर उतारने के लिये अनुसंधान कार्य में उल्‍लेखनीय निवेश की आवश्‍यकता होगी। साथ ही नये तौर-तरीकों को लागू करना होगा।