
Ramveer Upadhyay : यूपी सरकार में पूर्व कैबिनेट मंत्री और हाथरस की सीट से पांच बार विधायक रहे ब्राह्मण नेता रामवीर उपाध्याय 14 महीने बाद कैंसर से चल रही जिंदगी की जंग हार गए हैं। उनके निधन पर सियासी गलियारों में शोक की लहर है। आज हाथरस में उनकी शवयात्रा निकालकर अंतिम संस्कार किया जाएगा। उनके निधन पर राज्यपाल आनंदीबेन पटेल के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने दुख जताते हुए अपूरणीय क्षति बताया है।
राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने वरिष्ठ नेता रामवीर उपाध्याय के निधन पर दुख व्यक्त करते हुए ईश्वर से दिवंगत आत्मा की चिर शांति के लिए प्रार्थना करते हुए परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त की है। वहीं, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ट्वीट करते हुए लिखा है कि यूपी के पूर्व मंत्री और वरिष्ठ नेता रामवीर उपाध्याय का निधन अत्यंत दुखद है। प्रभु श्रीराम दिवंगत आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दें। साथ ही शोकाकुल परिवार को इस अथाह दुख सहन करने की शक्ति दें। ॐ शांति
उपाध्याय का निधन अपूरणीय क्षति - अखिलेश यादव
समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने रामवीर उपाध्याय के निधन पर ट्वीट करते हुए लिखा है कि अत्यंत दुखद। यूपी के पूर्व कैबिनेट मंत्री रामवीर उपाध्याय का निधन एक अपूरणीय क्षति है। शोक संतप्त परिजनों के प्रति उनकी गहन संवेदना। भगवान दिवंगत आत्मा को शांति दें। भावभीनी श्रद्धांजलि
भगवान परिवार और समर्थकों को दुख को सहन करने की शक्ति दें - डिप्टी सीएम
वहीं, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने निधन पर शोक जताते हुए ट्वीट में लिखा है कि यूपी सरकार के पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय का आकस्मिक निधन अत्यंत दुखद है। ईश्वर उनकी आत्मा को श्रीचरणों में स्थान दें और शोक संतृप्त परिवार और समर्थकों को दुख को सहन करने की शक्ति दें। ॐ शांति
यह भी पढ़ें - नीलम शुक्ला हत्याकांड का खुलासा, बच्चों के स्कूल जाते ही घुसा घर में
रामवीर उपाध्याय का राजनीतिक सफर
बता दें कि रामवीर उपाध्याय हाथरस जिले की सीट से पांच बार बसपा से विधायक रहे हैं। 2022 के चुनाव से पूर्व वह भाजपा में शामिल हुए थे। उन्हें सादाबाद सीट से टिकट दिया गया, लेकिन वह जीत नहीं हासिल कर सके। ढाई दशक तक हाथरस उनकी राजनीति का केंद्र बिंदू रहा। रामवीर उपाध्याय 1989 में गाजियाबाद से हाथरस पहुंचे और राजनीति में सक्रियता बढ़ाई। राम मंदिर की लहर में वह भाजपा के रथ पर सवार थे। संघ में अपनी पकड़ बनाने के लिए उन्होंने अपने पैतृक गांव बामौली में आरएसएस का कैंप भी लगवाया। लेकिन, 1993 के चुनाव में भाजपा ने उन्हें टिकट नहीं दिया। इसके बाद वह बागी हो गए और ब्राह्मणों को एकजुट करते रहे। ब्राह्मणों की एकजुटता के बूते वे वेस्ट यूपी के बड़े ब्राह्मण नेता के रूप में उभरे।
Published on:
03 Sept 2022 12:24 pm
बड़ी खबरें
View Allलखनऊ
उत्तर प्रदेश
ट्रेंडिंग
