लखनऊ. कुरबानी का पर्व बकराईद आने वाली 13 सितंबर को मनाई जाएगी। ईद-उल-अजहा का चांद शुक्रवार को नहीं दिखाई दिया। मरकजी चांद कमेटी के अध्यक्ष मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली, शिया चांद कमेटी के अध्यक्ष मौलाना सैफ अब्बास और काजी शहर मुफ्ती इरफान मियां फरंगी महली ने एलान किया कि शुक्रवार को ईद-उल-अजहा का चांद नहीं दिखाई दिया, इसलिए इस माह की पहली तारीख चार सितंबर को होगी और बकरीद का त्योहार 13 सितंबर को मनाया जाएगा।
आने वाले 13 सितंबर को ‘ईद-उल-जुहा’ दुनिया भर में धूमधाम से मनाया जाएगा। भारत में इस त्योहार को बकरीद के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इस दिन बकरे की कुर्बानी दी जाती है। बकरा ईद में एक बकरे की कुर्बानी देकर मनाया जाने वाला यह त्यौहार हमेशा लोगों की चर्चा का विषय बन जाता है। लेकिन जिन लोगों को इस धर्म तथा इससे जुड़े बकरीद के त्यौहार का पूर्ण ज्ञान नहीं है, वे नहीं जानते कि क्यों बकरे की कुर्बानी देने का महत्व है।
बकरे के साथ की भी देते हैं कुर्बानी
इस दिन कुछ लोग ऊंट की कुर्बानी भी देते हैं। इस दिन जानवरी कि कुर्बानी देने के पीछे धार्मिक कथा है जिसके चलते आज के दिन जानवरों की कुर्बानी दी जाती है।
ये है वो कहानी
कहानी के अनुसार एक बार इब्राहीम अलैय सलाम नामक एक व्यक्ति थे, जिन्हें सपने में अल्लाह का हुक्म आया कि वे अपने बेटे इस्माइल अल्लाह की राह में कुर्बान कर दें। यह इब्राहीम अलैय सलाम के लिए एक इम्तिहान था, जिसमें एक तरफ थी अपने बेटे से मुहब्बत और एक तरफ था अल्लाह का हुक्म।
लेकिन अल्लाह का हुक्म ठुकराना अपने धर्म की तौहीन करने के समान था, जो इब्राहीम अलैय सलाम को कभी भी कुबूल ना था। इसलिए उन्होंने सिर्फ अल्लाह के हुक्म को पूरा करने का निर्णय बनाया और अपने बेटे की कुर्बानी देने को तैयार हो गए।
कहानी के अनुसार जैसे ही इब्राहीम अलैय सलाम छुरी लेकर अपने बेटे को कुर्बान करने लगे, वैसे ही फरिश्तों के सरदार जिब्रील अमीन ने बिजली की तेजी से