
लखनऊ. नवजात बच्चों की मृत्यु की दर में कमी लाना सरकार के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे के मुताबिक उत्तर प्रदेश में कुल 1000 नवजात में से 43 की मौत कुछ समय के भीतर ही हो जाती है। नवजातों की मौतों के प्रमुख कारण समय से पहले जन्म होना, वजन कम होना, सांस लेने में तकलीफ होना और निमोनिया है। ऐसे में अब नवजात बच्चों की देखरेख को बेहतर बनाकर इस मृत्यु दर को कम करने की कवायद शुरू की गई है। अब नवजात की देखरेख के लिए उसके घर तक पहुंचकर उसके स्वास्थ्य और वजन पर नजर रखने के आंगनबाड़ी वर्कर्स को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी जा रही है।
एक माह तक बच्चे की ख़ास देखभाल जरूरी
दरअसल महिलाएं और तीमारदार प्रसव के बाद ज्यादा समय तक अस्पताल में नहीं रहना चाहते। ऐसे में नवजात को शुरू के 24 घंटों की सुरक्षा और देखभाल तो मिल जाती है, लेकिन उसके बाद भी नवजात को पहले सप्ताह और पहले महीने तक विशेष देखभाल की जरूरत होती है। खासकर यदि प्रसव अस्पताल में न होकर घर पर हुआ हो तो और अधिक विशेष देखभाल की जरूरत होती है। जानकार मानते हैं कि एक सप्ताह से एक माह के दौरान थोड़ी सी भी लापरवाही नवजात के लिए घातक हो सकती है।
42 दिनों तक आशा वर्कर करती है बच्चे की निगरानी
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की ओर से नवजात शिशु की मृत्यु दर में कमी लाने के लिए प्रदेश में माँ और नवजात शिशु की देखभाल के लिए होम बेस्ड न्यू बॉर्न केयर कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इस कार्यक्रम में प्रसव के बाद 42 दिन तक 6-7 बार घर-घर जाकर भ्रमण कर नवजात शिशुओं व धात्री माताओं की घरेलू देखभाल करने के तरीके आशा वर्कर बताती है। होम बेस्ड न्यू बॉर्न या नवजात की घर पर देखभाल कार्यक्रम के तहत शिशु को उसके जन्म से शुरू के 6 सप्ताह में सुरक्षित रखने के लिए आशा विशेष प्रयास करती है। कुछ मुख्य स्वास्थ्य व्यवहारों पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है। मसलन शीघ्र स्तनपान, नाल की देखभाल, शरीर का तापमान नियंत्रण, संक्रमण की पहचान, साफ़-सफाई का ध्यान इत्यादि शामिल है।
लापरवाही और बीमारियों से जाती है बच्चों की जान
संस्थागत प्रसव के मामले में आशा वर्कर 6 बार गृह भ्रमण पहले, सातवें, चौदहवें, इक्कीसवें, अट्ठाईसवें तथा तेतालीसवें दिन करती है। घरेलू प्रसव के मामले में आशा सात बार गृह भ्रमण पहले, तीसरे, सातवें, चौदहवें, इक्कीसवें, अट्ठाईसवें तथा छियालिसवें दिन करती है। लेंसेट 2012 की रिपोर्ट के मुताबिक शिशु मृत्यु दर के कई कारण है जिनमें समय से पहले जन्म एवं कम वजन का होना प्रमुख कारण है। इसकी वजह से 35 प्रतिशत बच्चों की मृत्यु हो जाती है। इसी तरह 20 प्रतिशत निमोनिया, नवजात की सांस अवरुद्ध होने से मृत्यु होती है जबकि 16 प्रतिशत की घाव के सड़ना या सेप्सिस एवं 9 प्रतिशत विकलांगता से मृत्यु हो जाती है। सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे 2016 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में शिशु मृत्यु की कुल दर 43 प्रति हजार है।
बच्चे का कम वजन है खतरे की घंटी
होम बेस्ड न्यू बोर्न केयर के तहत लखनऊ में अप्रैल, 2017 से फरवरी, 2018 तक आशाओं को प्रशिक्षण दिया जा चुका है और आशाओं द्वारा 72 प्रतिशत विजिट्स की जा चुकी है, जिनमें बच्चे ऐसे मिले है जो 2.5 किलोग्राम से कम वजन के पाए गए। काकोरी सीएचसी की अधीक्षक डॉ ज्योति कामले के मुताबिक नवजात में होने वाले कुछ खतरे के लक्षणों की जानकारी सभी अभिभावकों को होनी चाहिए, जिनमें 1800 ग्राम से कम वजन का होना,तेज़ साँसे, पसली चलना, कुछ न खाना-पीना, सुस्त रहना, शारीरिक तापमान का कम या अधिक होना, शरीर के किसी भी अंग से रक्तस्राव, 24 घंटे से अधिक होने पर मूत्र एवं मलत्याग न करना एवं लगातार उल्टी करना प्रमुख हैं। इनमें से कोई भी लक्षण दिखने पर अभिभावकों को बिना देर किये चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए। काकोरी ब्लॉक के कम्युनिटी प्रोसेस मैनेजर प्रद्ध्युम्न बताते हैं कि लगातार चलाये जा रहे कार्यक्रम से बहुत सी भ्रान्तिया खत्म हुयी है।
Published on:
11 May 2018 02:57 pm
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