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धोरहरा लोकसभा सीट- इस क्षेत्र की जनता ने नेताओं के बारे में कुछ ऐसा बोला, सुनकर रह जाएंगे हैरान

मोदी इनका दीन्ह, हमका एकव पैसा मिला

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लखनऊ

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Anil Ankur

Apr 28, 2019

Election 2019 vote for awards Kota vyapariyo ki anuthi pahal

Dhaurhara loksabha seat - people statement against leaders were worst


अनिल के. अंकुर
लखीमपुर। लखीमपुर, सीतापुर और शाहजहांपुर के जिले को तोड़कर बनाई गई लोकसभा सीट धौरहरा में कांग्रेस नेता जतिन प्रसाद अपने वजूद के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मौजूदा सासंद भाजपा की रेखा वर्मा और बसपा बसपा गठबंधन के उम्मीदवार राजेश वर्मा से उनका सीधा संघर्ष है। जनता भी यहां की ऐसी है कि वह किसी एक व्यक्ति के लिए अंधाधुंध वोट देने के मूड में नहीं है। किसी गरीब किसान के खाते में 2000 रुपए आ गए तो वह मोदी-मोदी चिल्ला रहा है और जिसके खाते में नहीं गए वह मुहं फुलाए दूसरी पार्टी का झंडा लिए इन्कलाब का नारा दे रहा है।

जतिन शाहजहांपुर से क्यों आए धौरहरा
कांग्रेस सरकार में राजीव गांधी के नजदीकी रहे जितेन्द्र प्रसाद के बेटे जतिन प्रसाद पहले अपनी पारम्परिक सीट शाहजहां पुर से लड़ते थे। लेकिन 2008 परिसीमन के बाद शाहजहांपुर सुरक्षित सीट हो गई और वर्चस्व में आई धौरहरा लोकसभा सीट से 2009 में जतिन ने चुनाव जीता। 2014 के चुनाव में वे हार गए। इस समय यह सीट भारतीय जनता पार्टी के खाते में है। मौजूदा हालत यह है कि 2019 के चुनाव में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन होने के साथ ही यहां की लड़ाई दिलचस्प हो गई है। कोई भी पार्टी का नेता यह कहने की स्थिति में यह नहीं है कि उनकी जीत सुनिश्चित है।

पिछड़े इलाके के कारण लोग के लिए पैसा महत्वपूर्ण

यूं तो धौरहरा लोकसभा सीट सीतापुर जिले के अंतर्गत आती है। 2014 के चुनाव में यहां पर करीब 17 लाख मतदाता थे। इनमें से 8.4 लाख पुरुष और 7 लाख से अधिक मतदाता महिला हैं। उल्लेखनीय है कि सीतापुर जिला देश के 250 सबसे पिछड़े जिलों में से एक है। यह सब तब है जब यह यूपी की राजधानी लखनऊ से सटा हुआ जिला है।
इस लोकसभा क्षेत्र में कुल 5 विधानसभा सीटें आती हैं. जिसमें धौरहरा, कास्ता, मोहम्मदी, मोहाली और हरगांव शामिल हैं। यह भी उल्लेखनीय होगा कि बीते 2017 के विधानसभा चुनाव में इन पांचों सीटों पर भाजपा ने जीत हासिल की थी। पिछड़े पन के कारण यहां लोग पैसे को ज्यादा तरहजीह देते हैं।

नौकरी और गांव में सुविधाओं की फरमाईश
इस लोकसभा सीट के लोग खुलकर बोलते हैं। हरगांव के पहले मुख्य मार्ग से चार किलोमीटर अंदर टिढिया गांव में दलित, पिछड़ों और ब्राह््मणों की मिली जुली जनसंख्या रहती है। यहां एक बूढ़ी बुआजी मिलीं। वह अनपढ़ जरूर थीं लेकिन उत्तर पढ़े लिखों से बेहतर थे। यह पूछे जाने पर कि शौचालयों का उपयोग नहीं होता तो फिर मोदी को वोट क्यों जाएगा। इस पर वह बोलीं कि मोदी शौचालय दे सकते हैं, पर सबको शौचालय के अंदर तो नहीं भेज सकते। हां, मुझे कोई सुविधा मोदी से नहीं मिली है। पर हम उन्हें ही वोट देंगे। वहीं पर खड़े बारिश लाल बोले भाजपा सांसद रेखा वर्मा पांच साल में कभी नहीं आईं। अब वोट मांगने आ रही हैं। पासी समाज के राम केवल का कहना था कि मोदी सरकार ने उनके लिए बहुत कुछ किया। खाते में रुपए भी आए और पांच लाख का कार्ड भी बन गया। उसकी बात सुनते ही सियाराम ने कहा कि हमे तो कुछ नहीं मिला, हम काहे वोट दें। हमारा वोट तो कांग्रेस को जाएगा। कुल मिलाकर लाभा और हानि के आधार पर यहां वोट बट रहे हैं।

मौजूदा सांसद का हाल

स्थानीय सांसद रेखा वर्मा ने 2014 के चुनाव में ही संसदीय राजनीति में आईं। चुनाव जीतने के बाद वह संसद की कमेटियों की सदस्य भी बनीं। 16वीं लोकसभा में अगर उनके प्रदर्शन की बात करें तो उन्होंने लोकसभा में होने वाली कुल 51 बहस में हिस्सा लिया है और 200 से अधिक सवाल पूछे। वर्ष 2014 में जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, रेखा वर्मा के पास 1 करोड़ से अधिक की संपत्ति है। अपनी सांसद निधि में से उन्होंने 85 फीसदी से अधिक की राशि खर्च की है। इसके बाद भी इलाके की जनता नाराज है कि सांसद उनसे दोबारा मिलने नहीं आईं।