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‘IAS दुर्गा शक्ति नागपाल को तुरंत पद से हटाया जाए’, पूर्व IPS अमिताभ ठाकुर ने हाई कोर्ट की टिप्पणी के बाद उठाई मांग

Amitabh Thakur and Durga Shakti Nagpal News: इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद पूर्व IPS अमिताभ ठाकुर ने मुख्य सचिव को पत्र भेजकर IAS दुर्गा शक्ति नागपाल के तत्काल तबादले और पूरे मामले की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
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लखनऊ

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Harshul Mehra

Aug 24, 2026

durga shakti nagpal high court amitabh thakur demand

पूर्व IPS अमिताभ ठाकुर और IAS दुर्गा शक्ति नागपाल। फोटो सोर्स-पत्रिका न्यूज

Amitabh Thakur and Durga Shakti Nagpal News: आजाद अधिकार सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व IPS अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को पत्र भेजकर देवीपाटन मंडल की मंडलायुक्त एवं वरिष्ठ IAS अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल के तत्काल स्थानांतरण की मांग की है। उन्होंने पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराने की भी मांग उठाई है। यह मांग इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ द्वारा 21 अगस्त 2026 को पारित आदेश के बाद की गई है।

दरअसल, हाईकोर्ट ने गोंडा की सिविल जज सीनियर डिवीजन शबीना खान और मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल के बीच हुई कथित टेलीफोन बातचीत को गंभीरता से लेते हुए इसे न्याय-प्रशासन में अनुचित हस्तक्षेप माना है। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि बातचीत के जरिए न्यायिक अधिकारी को प्रभावित करने का प्रयास किया गया हो सकता है।

क्या है पूरा मामला?

पूरा विवाद गोंडा में लंबे समय से लंबित एक भूमि विवाद से जुड़ा है। ज्योति विद्या मंदिर की ओर से नगर पालिका परिषद गोंडा के खिलाफ दायर नियमित मुकदमा साल 1997 से लंबित है। इसी मुकदमे को देवीपाटन मंडल से बाहर किसी दूसरी अदालत में स्थानांतरित करने की मांग को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। केस की सुनवाई के दौरान न्यायिक अधिकारी और मंडलायुक्त के बीच हुई कथित बातचीत का मामला सामने आया। सिविल जज शबीना खान के अनुसार, 15 जुलाई को मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल ने उनसे फोन पर बातचीत की थी। इस बातचीत में उनकी छुट्टी के साथ-साथ उनकी अदालत में लंबित एक मुकदमे का भी संदर्भ आया था।

जज से फोन पर बातचीत को हाईकोर्ट ने माना गंभीर

सिविल जज द्वारा बातचीत की जानकारी दिए जाने के बाद मामले ने गंभीर रूप ले लिया। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी लंबित मुकदमे के संबंध में प्रशासनिक पद पर बैठे अधिकारी द्वारा सीधे न्यायिक अधिकारी से संपर्क करना न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिहाज से गंभीर विषय है। अदालत ने जज द्वारा बताए गए बातचीत के लहजे और भाषा का उल्लेख करते हुए प्रथम दृष्टया कहा कि इससे यह आभास मिलता है कि पीठासीन अधिकारी को प्रभावित करने का प्रयास किया गया।

आपराधिक अवमानना के लिए मामले को भेजने का निर्देश

हाईकोर्ट ने मंडलायुक्त की ओर से फोन किए जाने से इनकार नहीं किए जाने को भी अपने आदेश में महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक मामलों में किसी न्यायिक अधिकारी पर दबाव या प्रभाव डालने की कोई भी कोशिश न्याय प्रशासन में बाधा पैदा कर सकती है। अदालत ने इस मामले को आपराधिक अवमानना के दृष्टिकोण से विचार योग्य माना है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि मुख्य न्यायाधीश अथवा वरिष्ठ न्यायाधीश से आवश्यक दिशा-निर्देश प्राप्त करने के बाद मामले को सक्षम न्यायालय के समक्ष रखा जाए।

जमीन विवाद से जुड़ा है मामला

विवादित भूमि देवीपाटन मंडल के कमिश्नर के नाम से दर्ज नजूल भूमि से संबंधित बताई गई है। मंडलायुक्त की ओर से अदालत में रखे गए पक्ष के अनुसार, यह भूमि कार्यालय भवन और अन्य सरकारी उद्देश्यों के लिए आरक्षित थी। राज्य सरकार की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि उक्त भूमि पर स्कूल भवन का निर्माण कर लिया गया। इस जमीन को लेकर विवाद करीब 3 दशक से सिविल कोर्ट में लंबित है और मुकदमा साक्ष्य के स्तर पर था। मामले में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश भी जारी किया गया था।

स्कूल ने लगाया था अधिकारियों पर दबाव बनाने का आरोप

ज्योति विद्या मंदिर की ओर से आरोप लगाया गया था कि राज्य के अधिकारी अपने पद का इस्तेमाल कर न्यायालय पर अनुचित दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसी आधार पर स्कूल ने मुकदमे को देवीपाटन मंडल से बाहर स्थानांतरित करने की मांग की थी। मामले में तब नया मोड़ आया जब सिविल जज शबीना खान ने मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल के साथ 15 जुलाई को हुई कथित फोन बातचीत का उल्लेख किया।

जिला जज ने दूसरी अदालत में ट्रांसफर किया मुकदमा

बातचीत के बाद सिविल जज शबीना खान ने 4 अगस्त 2026 को जिला जज, गोंडा से मुकदमे को उनकी अदालत से स्थानांतरित करने का अनुरोध किया था। इसके बाद जिला जज ने मामले को समान क्षेत्राधिकार वाली गोंडा की दूसरी अदालत में स्थानांतरित कर दिया। मुकदमा दूसरी अदालत में स्थानांतरित होने के बाद स्कूल की ओर से हाईकोर्ट में दाखिल ट्रांसफर याचिका प्रभावहीन हो गई। हालांकि हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुकदमे के स्थानांतरण से मंडलायुक्त द्वारा न्यायिक अधिकारी से कथित फोन बातचीत का मुद्दा समाप्त नहीं हो जाता।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हाईकोर्ट ने जताई चिंता

हाईकोर्ट ने कहा कि अधीनस्थ अदालतों को किसी भी प्रकार के अपमान, दबाव या अनुचित प्रभाव से सुरक्षित रखा जाना चाहिए। पीठासीन अधिकारियों को बिना किसी भय या बाहरी दबाव के अपनी न्यायिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति, पक्षकार, अधिवक्ता या अन्य प्रभावशाली व्यक्ति की ओर से न्यायालय पर दबाव बनाने का प्रयास न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप माना जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें न्यायिक कार्रवाई से जुड़े मामलों में जजों को धमकी, दबाव या अनुचित प्रभाव से बचाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। अदालत ने माना कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है और न्यायिक अधिकारियों को बाहरी प्रभाव से मुक्त वातावरण मिलना जरूरी है।

अमिताभ ठाकुर ने मुख्य सचिव को भेजा पत्र

वहीं, हाईकोर्ट के आदेश के बाद आजाद अधिकार सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व IPS अमिताभ ठाकुर ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को पत्र भेजा। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट की गंभीर टिप्पणियों के मद्देनजर दुर्गा शक्ति नागपाल को तत्काल मंडलायुक्त पद से हटाया जाना चाहिए। अमिताभ ठाकुर का कहना है कि निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए संबंधित अधिकारी का उसी जिले या मंडल में पद पर बने रहना उचित नहीं होगा।

निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच की मांग

अमिताभ ठाकुर ने मुख्य सचिव से महिला न्यायिक अधिकारी और मंडलायुक्त के बीच हुई बातचीत के साथ-साथ उसके बाद सामने आए पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र और उच्चस्तरीय प्रशासनिक जांच कराने की मांग की है। उन्होंने कहा कि जांच ऐसी व्यवस्था के तहत होनी चाहिए, जिससे किसी भी पक्ष पर प्रभाव या दबाव की आशंका न रहे और पूरे मामले के तथ्यों की निष्पक्षता से पड़ताल हो सके।

भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए प्रोटोकॉल की मांग

पूर्व IPS अधिकारी ने शासन से न्यायिक मामलों को लेकर प्रशासनिक अधिकारियों और न्यायिक अधिकारियों के बीच संपर्क के संबंध में स्पष्ट नियम बनाने की भी मांग की है। उनका कहना है कि लंबित न्यायिक मामलों के संबंध में कार्यपालिका के प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा न्यायिक अधिकारियों से सीधे संपर्क या बातचीत को लेकर सख्त, पारदर्शी और स्पष्ट प्रोटोकॉल तैयार किया जाना चाहिए। इससे भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के साथ न्यायपालिका की गरिमा और स्वतंत्रता को भी सुरक्षित रखा जा सकेगा।

अब आगे क्या?

हाईकोर्ट के आदेश के बाद मामला केवल भूमि विवाद तक सीमित नहीं रह गया है। न्यायिक अधिकारी से कथित बातचीत और उसे न्याय-प्रशासन में हस्तक्षेप मानने वाली अदालत की टिप्पणियों ने प्रशासनिक और न्यायिक स्तर पर नए सवाल खड़े किए हैं। वहीं, अमिताभ ठाकुर की ओर से मंडलायुक्त के स्थानांतरण और उच्चस्तरीय जांच की मांग के बाद अब शासन की प्रतिक्रिया पर भी नजर रहेगी।

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