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डिजिटल रैली हो सकती है तो ऑनलाइन वोटिंग क्यों नहीं?

तमाम देशों में इलैक्ट्रानिक वोटिंग आम बात है। तमाम कंपनियां किसी मुद्दे पर जनता का राय जानने के लिए एप का सहारा लेती हैं। ऐसे में बिना बिना कतार में लगे या फिर अपना समय खर्च किए बिना आसानी से वोटिंग क्यों नहीं की जा सकती है। वह भी तब जब कोरोना का संक्रमण तेजी से फैलता जा रहा है तब ऑनलाइन वोटिंग एक अच्छा विकल्प हो सकता है।

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E voting

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लखनऊ. उत्तराखंड हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को सुझाव दिया है कि वह कोरोना के खतरे को देखते हुए ऑनलाइन वोटिंग कराए। ई वोटिंग कोई नया शब्द नहीं है। तमाम देशों में इलैक्ट्रानिक वोटिंग आम बात है। तमाम कंपनियां किसी मुद्दे पर जनता का राय जानने के लिए एप का सहारा लेती हैं। ऐसे में बिना बिना कतार में लगे या फिर अपना समय खर्च किए बिना आसानी से वोटिंग क्यों नहीं की जा सकती है। वह भी तब जब कोरोना का संक्रमण तेजी से फैलता जा रहा है तब ऑनलाइन वोटिंग एक अच्छा विकल्प हो सकता है। वैसे भी जब डिजिटल रैलियां हो रही हैं तो ऑनलाइन वोटिंग क्यों नहीं हो सकती।

पहले भी उठ चुकी है मांग

कोरोना की पहली लहर के बाद नवंबर 2020 में बिहार में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान भी ऑनलाइन वोटिंग की बात उठी थी। तब यह तर्क दिया गया था कि ऑनलाइन मतदान तेज और विश्वसनीय नतीजे दे सकता है। इससे मतदान प्रतिशत भी बढ़ सकता है। इसके पहले सुप्रीम कोर्ट भी अनिवासी भारतीयों को अपना वोट डालने के लिए केंद्र सरकार को यह निर्देश दिया था कि वह अनिवासी भारतीयों को ई-वोटिंग का अधिकार दे। ताकि उन्हें वोट देने के लिए भारत न आना पड़े।

पोस्टल वोटिंग का विस्तार है ईवोटिंग

वैसे भी भारत में पोस्टल वोटिंग का प्रावधान शुरू से ही रहा है। जो लोग सेना में हैं या बाहर भारतीय दूतावासों में काम करते हैं, वे इस अधिकार का उपयोग करते हैं। यूपी समेत पांच अन्य राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में पहली बार विकलांग और बूढ़ों को घर बैठे वोटिंग की सुविधा दी गयी है। ऐसे में ई-वोटिंग इसी का विस्तार है। पोस्टल वोटिंग और ई-वोटिंग में अंतर यह है कि पोस्टल वोटिंग में चुनाव तिथि के सात दिन पहले तक वोट भेजने की अनुमति होती है जबकि ई-वोटिंग में उसी दिन, उसी समय वोटिंग संभव हो जाती है।

इस तरह दी जा सकती है सुविधा

ऑनलाइन वोटिंग के लिए फिक्स या मोबाइल इंटरनेट कनेक्शन के जरिये यह सुविधा दी जा सकती है। वोटिंग के लिए पहले वोटरों का ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करना होगा। उसी वक्त वोटर का फोटो भी रजिस्टर्ड कर दिया जाएगा। ऐसे मतदाताओं का नाम सामान्य मतदाता सूची से निकाल दिया जाएगा। यानी एक बार ई-वोटर के तौर पर रजिस्टर्ड होने के बाद वह व्यक्ति बूथ पर जाकर मतदान नहीं कर सकेगा।

हो सकती हैं यह गड़बडियां

ई-वोटिंग के वक्त मतदाता की पहचान नहीं हो पाएगी। यह भी सुनिश्चित नहीं हो पाएगा कि वोटिंग के वक्त वोटर को प्रभावित तो नहीं किया जा रहा है। बोगस वोटिंग की आशंका भी है। दूसरे फिक्स्ड इंटरनेट वोटिंग के लिए यह जरूरी है कि जिस कंप्यूटर से रजिस्ट्रेशन हुआ है वोटिंग भी उसी से की हो। यानी एक कंप्यूटर से एक ही वोटर मतदान कर सकेगा। ऐसे में अगर एक घर में छह वोटर होंगे तो सभी के लिए अलग-अलग कंप्यूटर की जरूरत होगी। जिनके पास खुद का कंप्यूटर नहीं होगा, उनके लिए ई-पोलिंग बूथ की व्यवस्था करनी होगी।

चुनाव आयोग कर चुका है पहल

चुनाव आयोग ई-वोटिंग की पहल कर चुका है। गुजरात नगरपालिका में 2010 और 2011 में मतदान कराया गया था। तब कहा गया था कि ऑनलाइन वोटिंग में वोटर आइडेंटिफिकेशन के लिए आधार कार्ड और नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) के डेटा का प्रयोग करके उसे ऑनलाइन लिंक किया जा सकता है। इससे वेरिफिकेशन आसान हो जाएगा।

अफ्रीकी देशों में सुविधा

अफ्रीकी देशों में ई वोटिंग पद्धति लंबे समय से ही। है क्योंकि वहां बड़ी आबादी दूसरे देशों में रहती है। ऑस्ट्रेलिया, नॉर्वे और कनाडा जैसे कुछ अन्य देशों में भी ऑनलाइन वोटिंग की सुविधा है। के प्रयोग शुरू हो चुके हैं। अमेरिका में भी इसकी मांग की जा रही है। कोरोना काल में ऑनलाइन मताधिकार का प्रयोग वोटिंग प्रतिशत बढ़ाने का अच्छा तरीका हो सकता है।