
अली सरदार जाफरी
मैं जहाँ तुम को बुलाता हूँ वहाँ तक आओ
मेरी नज़रों से गुज़र कर दिल-ओ-जाँ तक आओ
फिर ये देखो कि ज़माने की हवा है कैसी
साथ मेरे मिरे फ़िरदौस-ए-जवाँ तक आओ
हौसला हो तो उड़ो मेरे तसव्वुर की तरह
मेरी तख़्ईल के गुलज़ार-ए-जिनाँ तक आओ
तेग़ की तरह चलो छोड़ के आग़ोश-ए-नियाम
तीर की तरह से आग़ोश-ए-कमाँ तक आओ
फूल के गिर्द फिरो बाग़ में मानिंद-ए-नसीम
मिस्ल-ए-परवाना किसी शम-ए-तपाँ तक आओ
लो वो सदियों के जहन्नम की हदें ख़त्म हुईं
अब है फ़िरदौस ही फ़िरदौस जहाँ तक आओ
छोड़ कर वहम-ओ-गुमाँ हुस्न-ए-यक़ीं तक पहुँचो
पर यक़ीं से भी कभी वहम-ओ-गुमाँ तक आओ
इसी दुनिया में दिखा दें तुम्हें जन्नत की बहार
शैख़-जी तुम भी ज़रा कू-ए-बुताँ तक आओ
मशहूर शायर अली सरदार जाफ़री का जन्म 29 नवम्बर,1913 को हुआ था। सरदार का जन्म बलरामपुर जिले के एक गांव में हुआ था। गावं में ही इनकी हाईस्कूल की शिक्षा पुरी हुई थी। आगे की पढा़ई के लिए उन्होंने अलीगढ़ की मुस्लिम विश्वविद्यालय में एडमिशन लिया।
वहां पर उनको उस समय के मशहूर और उभरते हुए शायरों की संगत मिली। इनमें अख्तर हुसैन रायपुरी, सिब्ते-हसन,जज्बी,मजाज, जानिसार अख्तर और ख्वाजा अहमद अब्बास जैसे मशहूर शायर शामिल थे। उस समय तक देश में अंग्रेज़ों के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन की शुरुआत हो चुकी थी।
इस आंदोलन में कई नौजवान शामिल हुए थे। स्टूडेंट कॉउंसिल के सदस्यों के खिलाफ हड़ताल करने के लिए सरदार को यूनिवर्सिटी से निकाल दिया गया था। अपनी पढा़ई जारी रखते हुए उन्होंने एंग्लो-अरेबिक कालेज दिल्ली से बी.ए. पास किया। फिर बाद में लखनऊ विश्वविद्यालय से MA की डिग्री हासिल की।
काम अब कोई न आएगा बस इक दिल के सिवा
रास्ते बंद हैं सब कूचा-ए-क़ातिल के सिवा
छात्र आंदोलन में रहे सक्रिय थे सरदार
सरदार जाफरी का छात्र आंदोलनों में भाग लेने का हौसला कभी कम नहीं हुआ। इसके लिए उन्हें जेल भी जाना पडा़ था। इसी जेल में सरदार को साहित्य के अध्ययन का अवसर मिला। उनकी मुलाकात प्रगतिशील लेखक संघ के सज्जाद जहीर से हुई। यहीं से उनके चिंतन और मार्ग-दर्शन का विकास हुआ।
अपनी सामाजिक-राजनीतिक विचारधारा के कारण वे प्रगतिशील लेखक संघ से जुडे़। यहां उन्हें प्रेमचंद, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, फैज अहमद फ़ैज़, मुल्कराज आनंद जैसे भारतीय सहित्यकारों और नेरूदा, लुई अरांगा जैसे विदेशी चिंतकों के विचारों को जानने का मौका मिला।
सरदार पर संगत का ऐसा असर हुआ वह लीग से हटकर अलग शायर बन गए। उनके दिल में मेहनतकशों के दुख-दर्द बसे हुए थे। सरदार जाफरी ने नए शब्दों और विचारों के साथ कईयादगार रचनाएं लिखी थी। भारतीय सिनेमा में भी उनका काफी योगदान रहा है।
उनकी शायरी को फिल्मों ने लोगों की जुबान पर ला दिया। इन फिल्मों की लिस्ट में ‘परवाज़’ (1944), ‘जम्हूर’ (1946), ‘नई दुनिया को सलाम’ (1947), ‘खूब की लकीर’ (1949), ‘अम्मन का सितारा’ (1950), ‘एशिया जाग उठा’ (1950), ‘पत्थर की दीवार’ (1953), ‘एक ख्वाब और (1965) पैराहने शरर (1966), ‘लहु पुकारता है’ (1978) जैसे नाम शामिल हैं।
सरदार साहब को कई पुरस्कार और उपाधियां भी दी गई। उन्हें पद्मश्री, ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया था। इसके अलावा उन्हें इकबाल सम्मान, उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार, रूसी सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार जैसे सम्मान मिले थे।
सरदार ने अपने पूरे जीवन सफर में मेहनतकश और गरीबों की समस्याओं को उजागर करने के लिए अपनी कलम का करिश्मा दिखाया। इस वजह से उन्हें निजी यातनाएं भी झेलनी पडी़। 86 साल की उम्र में उन्हें ब्रेन ट्यूमर की जानलेवा बीमारी हो गई। कई महीनों तक मुंबई अस्पताल में वे मौत से जूझते रहे। फिर 1 अगस्त, 2000 को मुंबई में उनका निधन हो गया।
Updated on:
29 Nov 2022 08:34 pm
Published on:
29 Nov 2022 08:30 pm
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