
Ganga Putra Death
लखनऊ. नमामि गंगे, हर-हर गंगे, गंगा मैया के नाम पर न जाने और कितने जुमले बनेंगे, लेकिन क्या कभी गंगा साफ भी होगी? यह सवाल लोगों के दिलों-दिमाम में घर कर गया है, वो भी आज से नहीं बल्कि बड़े अरसे से। हां, मोदी सरकार के आने के बाद कुछ लोगों को शायद उसका संभावित जवाब भी मिल गया होगा, लेकिन वह केवल संभावना भर ही थी। 2014 के बाद अब 2018 भी आ गया है, लेकिन गंगा मैया अभी भी तमाम फैक्ट्रियों से निकल रहे जहर से लड़ रही है। तमाम दावे किए गए। गांग को 2019 से पहले बिल्कुल स्वच्छ करने के लिए। गंगा मैया तो नहीं, लेकिन हां इस कड़ी में 'गंगा पुत्र' का सफाया जरूर हो गया। हम बात कर रहे हैं स्वामी जी की, जो अनशन करते-करते अपने प्राण त्याग चुके हैं। जी हां, वहीं स्वामी जो 11 अक्टूबर को गंगा सफाई की लड़ाई लड़ते-लड़ते जिंदगी की जंग हार गए। 'गंगा पुत्र' नाम से विख्यात पर्यावरणविद् प्रोफेसर जीडी अग्रवाल उर्फ स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद 112 दिनों तक अनशन पर बैठे रहे। उम्मीद करते रहे कि आखिर में सरकार उनकी बात मानेगी और विधेयक पारित करेगी। लेकिन खाली हाथ ही उनको परलोक सिधारना पड़ा। अंत में एक और गंगा पुत्र का सफाया हो ही गया। आपको बता दें कि इससे पहले भी गंगा के ही मुद्दे पर 2011 में 115 दिन के अनशन के बाद स्वामी निगमानंद ने भी दम तोड़ दिया था।
खर्च हुए अब तक इतने करोड़-
कुल मिला कर 2014 से जून 2018 तक गंगा नदी की सफाई के लिए 3,867 करोड़ रुपये से अधिक राशि खर्च की जा चुकी है और इसमें और भी इजाफा होना संभावित है। लेकिन क्या मां गंगा या उनसे जुड़ी नदियों की हालत में जरा भी परिवर्तन आया? सरकार ने कहा जिन शहरों को गंगा नदी का स्पर्श आसानी से हो जाता है वहां के घरों में हम वेस्टेज को रिसाइकिल करने वाले डब्बे या मशीन लगवाएंगे। ऐसे में घरों ने निकनले वाला कूड़ा कचड़ा वहीं तक ही सीमित रह जाएगा। लेकिन भैया, नालों का क्या? वहां से निकलने वाली गंदगी ये वेस्टेज को कैसे रोकोेगे या क्यों नहीं रोक पाए हो?
राज्यों में नहीं हो रहा नियम लागू-
जीडी अग्रवाल कानपुर के इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के फैकल्टी मेंबर थे। वहीं कानपुर जो चमड़े से लेकर न जाने कितने पदार्थों का निर्माता है। बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां हैं वहां। पहुंचते ही पता चल जाएगा की वहां पर गंगा मैया का हाल क्या है। रोकने वाला तो कोई है नहीं। तो अंधाधुंद किए जाए अपने मन की। हां, एक बात यहां बताना बेहद जरूरी है। जरा ध्यान देें, मौजूदा स्थिति ये बताती है कि सीवर परियोजनाओं से संबंधित कार्यक्रमों को राज्य द्वारा सही तरीके से लागू नहीं किया जा रहा है और न ही पहले किया गया। अब यह सरकार का गैरजिम्मेदाराना रवैया ही है। यह हम नहीं बल्कि एक संसदीय समिति, जिसने गंगा सफाई के लिए सरकार के प्रयासों का मूल्यांकन किया था, उसका कहना है कि गंगा सफाई के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदम काफी नहीं हैं। सीवर परियोजना सीवेज ट्रीटमेंट और जल निकायों में सीवेज के डंपिंग के मुद्दों का हल नहीं निकाला जा सका है। वैसे यह एक रिपोर्ट है, ऐसी कई रिपोर्ट्स हैं जिनका यह हूबहू यही कहना है।
तो कैसे होगी गंगा स्वच्छ?-
गंगा और इसकी सह-नदियों के आस-पास बन रहे हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट के निर्माण को बंद करने और गंगा संरक्षण प्रबंधन अधिनियम को लागू करने के जिस उद्देश्य से अग्रवाल कोशिश कर रहे थे, उसमें वह नाकाम हुए। और लगता भी नहीं कि आगे सरकार किसी और की सुनेगी। तो अब क्या करे? सोशल मीडिया पर इस मुद्दे पर वायरल एक जोक के अनुसार, अमरीकी राष्ट्रपति अगर गंगा में डुबकी लगाने की इच्छा जाहिर करें तब शायद भारत की पूरी ताकत एक ही दिन में बरसो पुरानी मैली गंगा को स्वच्छ करने में लग जाएगी। अब ऐसा तो हो नहीं सकता? वैसे मुमकिन है कि चुनाव आते-आते इस सवाल को सत्ता में बैठे देश के आलाकमान भूल भी जाए। और गल्ती से किसी ने उन्हें याद दिला भी दिया तो #MeToo जैसे मुद्दे तो हैं ही पूछने वाले का ध्यान इस सवाल से हटाने के लिए।
Updated on:
14 Oct 2018 05:31 pm
Published on:
14 Oct 2018 05:20 pm
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