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21 अप्रैल को गणपतराय को क्यों दी गई थी फांसी जाने उनके बारे में

तीर कमान से अंग्रेजो के छक्के छुड़वा दिए।

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लखनऊ

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Hariom Dwivedi

Apr 21, 2019

 Ganpat Rai's sacrifice

21 अप्रैल को गणपतराय को क्यों दी गई थी फांसी जाने उनके बारे में

ritesh singh
लखनऊ ,हमारे देश में बहुत से देश भक्तो ने जन्म लिया और उन्होने ने अपना एक अलग इतिहास बनाया। देश के अभिमान के खातिर उन शहीदों ने अपने घर - परिवार तक को पीछे छोड़ दिया। लेकिन देश के लिए कुर्बान हो गए। अंग्रेजो ने बहुत कष्ट दिए फिर भी देश का सर नहीं झुकने दिया ऐसे थे हमारे देश के शहीद। उनमें से एक थे गणपतराय जिन्होंने अपने तीर कमान से अंग्रेजो के छक्के छुड़वा दिए।

गणपतराय का इतिहास

गणपतराय का जन्म 17 जनवरी, 1808 को ग्राम भौरो (जिला लोहरदगा, झारखंड) में एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। इनके पिता किसनराय तथा माता सुमित्रादेवी थीं। बचपन से ही वनों में घूमना, घुड़सवारी, आखेट आदि उनकी रुचि के विषय थे। इस कारण उनके मित्र उन्हें ‘सेनापति’ कहते थे।

बचपन से ही इनका मन अपने देश और जागीरों पर अंग्रेजों के शासन को देखकर बहुत चिढ़ता था। वे इसकी चर्चा अपने साथियों और माता-पिता से करते थे पर सब इसे उनका बचपना समझकर टाल देते थे। कुछ बड़े होने पर वे पढ़ने के लिए अपने चाचा सदाशिव पांडेय के पास पालकोट आ गये। उनके चाचा पालकोट रियासत के दीवान थे। गणपतराय की योग्यता देखकर चाचा की मृत्यु के बाद उनको ही रियासत का दीवान बना दिया गया।

रियासत के शासक जगन्नाथ पांडेय सदा अंग्रेजों की चमचागीरी करते रहते थे। गणपतराय उन्हें अंग्रेजों से डटकर मुकाबला करने का परामर्श देते थे। पर कायर राजा इसके लिए तैयार नहीं हुआ। 1829 में अंग्रेजों ने राजा जगन्नाथ को गद्दी से हटाकर उनकी जागीर पर कब्जा कर लिया।

राजा ने स्वभाववश कोई विरोध नहीं किया। वह चुप होकर बैठ गये। गणपतराय का मन विद्रोह कर उठा; पर वे कुछ कर नहीं सकते थे। अतः दीवान के पद से त्यागपत्र देकर वे गाँव वापस आ गये तथा अपने पुराने मित्र ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव के साथ मिलकर अंग्रेजों का विरोध करने लगे।

दो अगस्त, 1857 को उन्होंने अपने साथियों के साथ राँची जेल तोड़कर 300 वीरों को मुक्त करा लिया और वहाँ तैनात अंग्रेजों को मार डाला। राँची न्यायालय के पास स्थित कुआँ अंग्रेजों की लाशों से भर गया। 21 दिन तक छोटा नागपुर, खूँटी तथा राँची का क्षेत्र स्वतन्त्र रहा। यह सुनकर हजारीबाग के सन्थाल वनवासियों ने भी विद्रोह कर दिया। वे अपने तीर-कमान लेकर सड़कों पर उतर आये। यद्यपि वे पूर्णतः सफल नहीं हो पाये।

गणपतराय की इच्छा थी कि वे जगदीशपुर के क्रान्तिवीर कुँवरसिंह से मिलकर अस्त्र-शस्त्र का संग्रह करें। इसी योजना के अन्तर्गत वे 200 साथियों को लेकर 11 सितम्बर, 1857 को राँची से चल दिये। चतरा नामक स्थान पर मेजर इगलिश की सशस्त्र टुकड़ी से उनकी मुठभेड़ हुई। इसमें 150 क्रान्तिकारी तथा 58 अंग्रेज मारे गये। अंग्रेजों ने लोगों को आतंकित करने के लिए इन सबके शवों को एक तालाब के आसपास लगे वृक्षों पर टाँग दिया। आज भी वह तालाब ‘फाँसी का तालाब’ कहलाता है।

गणपतराय इस युद्ध में बच गये। वे अपने गाँव वापस आकर फिर से साथियों एवं शस्त्रों का संग्रह करने लगे। अंग्रेजों ने उनकी सब सम्पत्ति जब्त कर ली थी। एक रात अंग्रेजों ने उनके गाँव को घेर लिया; पर गणपतराय अपने पुरोहित उदयनाथ पाठक के साथ लोहरदगा की ओर चल दिये।

दुर्भाग्यवश अंधेरे के कारण वे रास्ता भटक गये और परहेपाट गाँव में जा पहुँचे। वहाँ के देशद्रोही जमींदार महेश शाही ने उन्हें पकड़वा दिया। राँची लाकर उन पर अभियोग चलाया गया। राँची के तत्कालीन हाईस्कूल के पास एक कदम्ब का पेड़ था। उसी पेड़ पर 20 अप्रैल, 1858 को क्रान्तिकारी विश्वनाथ शाहदेव को तथा 21 अप्रैल को गणपतराय को फाँसी दे दी गयी। राँची का यह स्थान आज ‘शहीदी चौक’ के नाम से जाना जाता है।