
Ground Report : चीनी उद्योग को करोड़ों का पैकेज, किसानों को नहीं मिल रहा गन्ना मूल्य का भुगतान
लखनऊ. उप्र की चीनी मिलों से धुआं निकलना बंद हो गया है। इसी के साथ शुगर इंडस्ट्री के इतिहास में एक नया अध्याय दर्ज हो गया है। गन्ना पेराई सत्र 2017-18 इस मायने में अलग रहा कि इस साल सबसे लंबे समय तक पेराई चली। उप्र ने देश में सर्वाधिक गन्ना व चीनी उत्पादन का रिकार्ड भी बनाया। केंद्र सरकार ने चीनी उद्योग के लिए 8500 करोड़ का राहत पैकेज जारी किया है। इससे मिल मालिकों को तो राहत मिल गयी। लेकिन किसान अपने गन्ना भुगतान के लिए मिलों का चक्कर लगा रहे हैं। सरकार दावा कर रही है कि पिछले 15 माह में किसानों को 33,560 करोड़ का भुगतान किया जा चुका है लेकिन हकीकत यह है कि अभी किसानों का 23 हजार करोड़ मिलों पर बकाया है। नियमत: गन्ना खरीद के 14 दिन के भीतर किसानों को भुगतान मिल जाना चाहिए लेकिन तमाम किसानों को 25 दिसंबर 2017 के बाद से भुगतान नहीं मिला है। वे बकाये के लिए धरना-प्रदर्शन और भूख हड़ताल कर रहे हैं। लेकिन योगी सरकार चुप है।
हर चीज में बना रिकॉर्ड
इस साल उप्र की अधिकतर चीनी मिलों में अक्टूबर के आखिरी तक पेराई शुरू हो गयी थी। पेराई सीजन का समापन 24 जून को हुआ। प्रदेश की सभी 119 चीनी मिलों ने इस साल 1110.33 लाख टन गन्ने की पेराई की। राज्य सरकार ने पिछले 15 महीनों में किसानों को 33,560 करोड़ रुपए गन्ना मूल्य का भुगतान किया। इस साल उप्र के किसानों ने 22.99 लाख हेक्टेयर में गन्ना बोया था। जिसमें 1707 लाख मीट्रिक टन गन्ना उत्पादन हुआ।
14 दिन में भुगतान की बात बेमानी
गत उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में 14 दिन में गन्ना खरीदने के बाद भुगतान कराने की बात कही थी। लोकसभा चुनावों के दौरान पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी भी 14 दिन में भुगतान करने और किसानों को 500 रुपए कुंटल गन्ना मूल्य दिलाने की बात करते थे, लेकिन पांच सौ तो दूर मौजूदा समय के रेट के हिसाब से भी किसानों को भुगतान नहीं मिल रहा है। जबकि गन्ना अधिनियम के मुताबिक 14 दिन में किसानों को भुगतान की बात कही गई है। लेकिन प्रदेश के अधिकांश किसानों को 25 दिसंबर 2017 के बाद दिए गए गन्ने का भुगतान नहीं मिला है।
आत्महत्या कर रहे किसान
इस वक्त उप्र में गन्ना मिलों पर किसानों का 12,000 करोड़ रुपए से अधिक का बकाया है। सवाल है इतनी बड़ी रकम गन्ना मिलें किसानों को कैसे और कब देंगी?
पश्चिमी उप्र के एक किसान ने चीनी मिल पर तीन लाख रुपए बकाया होने और पैसा न मिलने के चलते आत्महत्या कर ली थी। मान लें इस सत्र में गन्ने का आवश्यकता से अधिक उत्पादन हुआ है। चीनी सस्ती हो गई है। इसलिए मिलें किसानों का भुगतान नहीं कर पा रही है। लेकिन सवाल है कि क्या मिलें पिछले साल तक किसानों को समय से भुगतान कर देती थीं तो जवाब है नहीं।
एक उदाहरण काफी
उदाहरण के लिए लखीमपुर और खीरी मुख्यालय से 35 किमी दूर बहराइच रोड पर खमरिया इलाके में ही 9 गन्ना मिलें हैं। यहां की एक शुगर मिल गोविंद शुगर मिल्स लिमिटेड ऐरा है। इस मिल से करीब 70 हजार किसान जुड़े हैं। मिल ने पिछले सत्र में 93 लाख कुंटल गन्ने की पेराई की थी। इस बार 152 लाख कुंटल की पेराई की। इस 60 लाख कुंटल अधिक गन्ने की खरीद पर करीब दो अरब रुपये नगद लगाए गए। लेकिन मिल ने किसानों का पुराना बकाया चुकता नहीं किया। किसानों की जमीन की गलत फीडिंग करके मिल अधिकारियों ने बड़े पैमाने पर काले धन को सफेद किया। इस मिल से जुड़े किसानों को 25 दिसंबर 2017 के बाद दिए गए गन्ने का भुगतान नहीं मिला है। किसान परेशान हैं। किसान रोड जाम कर रहे हैं। हड़ताल कर रहे हैं लेकिन सरकार गन्ना भुगतान संघर्ष समिति के धरना और प्रदर्शन पर ध्यान नहीं दे रही। कुछ किसान तो आमरण अनशन पर भी बैठे लेकिन नतीजा कुछ भी नहीं निकला।
हर मिल में डंप पड़ा है सीरा
मिलों के सामने एक समस्या सीरा की भी है। कुछ राज्यों में शराब पर प्रतिबंध लगने के कारण सीरे की खपत नहीं हो रही। इससे भी मिलों को नुकसान हो रहा है। पिछले साल तक 150 रुपये से 170 रुपये कुंटल तक सीरा बिका था। इस साल 75 रुपये कुंटल के भी खरीददार नहीं मिल रहे। मिलों के टैंक सीरे से भरे पड़े हैं। एक टन गन्ने की पेराई से 107 किग्रा चीनी निकलती है तो 46 किग्रा सीरा निकलता है। इस तरह हर चीनी मिल के पास सैकड़ों टन सीरा जमा है।
रंगराजन कमेटी की सिफारिशें दरकिनार
उत्तर प्रदेश सरकार चीनी क्षेत्र के लिए बनी रंगराजन कमेटी के सुझाए सुधारों को भी नहीं लागू कर रही। जबकि, महाराष्ट्र और कर्नाटक इस सुधार को लागू कर चुके हैं। इसके तहत मिलें किसानों को केंद्र सरकार की ओर से निर्धारित उचित लाभकारी मूल्य (एफआरपी) पहले अदा कर देती हैं। शेष रकम चीनी बिक्री से मिलने वाली राशि से अदा की जाती है।
चीनी मिल मालिकों की अपनी कहानी
रिकॉर्ड गन्ना उत्पादन के बावजूद उप्र में चीनी उद्योग गंभीर संकट से गुजर रहा है। इस गन्ना सीजन (अक्टूबर-सितम्बर) के अंतिम दिनों में मिल से निकलते समय चीनी का मूल्य 25 से 26 रुपये प्रति किलो चल रहा था। यह मूल्य चीनी की उत्पादन लागत से नीचे का है। चीनी की आपूर्ति बढऩे से बाजार भाव गिर गया, जिससे मिलों को घाटा हुआ। हालांकि सरकार ने घरेलू बाजार में चीनी की घटती कीमतें रोकने के लिए चीनी के आयात पर दोगुना शुल्क कर उसे 100 फीसदी कर दिया है। निर्यात पर शुल्क पूरी तरह समाप्त कर दिया है। लेकिन चीनी मिल मालिक रो रहे हैं। मिलों पर 2017 और 18 सीजन का 23,000 करोड़ रुपए से अधिक का बकाया है।
एक माह में भुगतान के निर्देश
चीनी मिलों के प्रबंधकों को एक माह के भीतर किसानों के गन्ना मूल्य का भुगतान करने का निर्देश दिए गए हैं। साथ ही पेराई में पिछड़ी मिलों का ऑडिट प्रबंधकों के संघ से ही करवाने के आदेश दिए गए हैं।
सुरेश राणा, गन्ना विकास और चीनी उद्योग मंत्री
Published on:
27 Jun 2018 02:36 pm
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