19 जनवरी 2026,

सोमवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

नाटक-कव्वाली देखकर गजलों की दुनिया में आ गए आईएएस डॉ. हरिओम

प्रशासनिक सेवा के साथ गजल के शगल को पूरा करना चुनौतीपूर्ण

3 min read
Google source verification

लखनऊ

image

Ruchi Sharma

Oct 04, 2019

नाटक-कव्वाली देखकर गजलों की दुनिया में आ गए आईएएस डॉ. हरिओम

नाटक-कव्वाली देखकर गजलों की दुनिया में आ गए आईएएस डॉ. हरिओम

रुचि शर्मा
लखनऊ. प्रशासनिक और कानून व्यवस्था संभालने के साथ-साथ अपने शौक और परिवार के साथ सामंजस्य बैठा पाना बड़ा मुश्किल काम होता है। यह चुनौती तब और बढ़ जाती है जब कोई आइएएस जैसी देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवा में हो। अपनी शासकीय जिम्मेदारियों के साथ अपने शौक को जिंदा रखते हुए देश-विदेश में नाम कमाने वाले ऐसे ही शख्स हैं डॉ. हरिओम। इन्होंने गजल और गायकी की दुनिया में भी खास पहचान अर्जित की है। आखिर कैसे प्रशासनिक सेवा के साथ अपने पैशन को भी जिंदा रखें हैं पत्रिका को बता रहे हैं डॉ. हरिओम..


सवाल- आइएएस से सिंगर बनने तक का सफर कैसा रहा?
उत्तर- मेरी शुरूआती पढ़ाई गांव में हुई। जहां लोक संगीत, नाटक-नौटंकी, कव्वाली और भजन-कीर्तन को नजदीक से सुनने और देखने का मौका मिला। यह सब बहुत अच्छा लगता था। यहीं से संगीत के साथ प्यार की शुरुआत हो गयी। छात्र जीवन में ही साहित्य के प्रति रुझान बढ़ा। और शायरी, गजल को पढऩे और गुनगुनाने लगा। धीरे-धीरे शायरी लिखना शुरू किया और 15 साल पहले शायरी पर मेरी पहली किताब आई। बाद में श्रेया घोषाल और कैलाश खेर जैसे बड़े कलाकारों के साथ मंच सांझा किया। इस तरह नौकरी और शायरी दोनों चलती रही।


सवाल- गजलों का शौक कैसे परवान चढ़ा?

उत्तर- 12वीं के बाद ग्रेजुएशन के लिए इलाहाबाद पहुंचा। यहां फिल्मी गानों के कंपटीशन में भाग लेना शुरू किया। उस वक्त गुलाम अली साहब बड़े हिट थे। चुपके-चुपके रात दिन, आंसू बहाना याद है। मेरी प्रिय गजल हुआ करती थी। उसी वक्त जगजीत सिंह भी आए। होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो, तुमको देखा तो ये खयाल आया जैसी गज़़लों ने खूब आकर्षित किया। इस तरह गजलों की परवान चढ़ता गया।


सवाल- प्रशासनिक सेवा के व्यस्त समय में कैसे खुद को इतना निखारा?
उत्तर- जब कोई चीज आपको पंसद होती है तो उसके लिए खुद-बा-खुद समय निकल आता है। बाकी समय से कुछ समय शायरी, कविताओं के लिए निकालता हूं। आफिस आने से पहले रियाज करता हूं। जब भी घर पर होता हूं रियाज में ही समय बीतता है।


सवाल- संगीत की दुनिया का आपका गुरू कौन है?
उत्तर- जब पढ़ाई कर रहा था तब यह तय नहीं था कि शायरी करूंगा। सर्विस में आया तो एक जगह स्थिर नहीं थे। ट्रांसफर होता रहता था। इसलिए किसी को गुरू बनाने का मौका ही नहीं मिला। ऑनलाइन, इंटरनेट का अब तो जमाना है तो वहीं से सबसे कुछ न कुछ सीखा।

सवाल- अभी तक आपके कितने म्यूजिक एलबम निकल चुके हैं?

उत्तर - 2006 में मेरा पहला म्यूजिक एलबम आया था। नाम था रंग पैराहन। तब मैं गोरखपुर में डीएम था। दूसरा एलबम 2011 मे इंतिसाब के नाम से आया। तब कानपुर का डीएम था। तीसरा एलबम अप्रैल 2015 में रोशनी के पंख। और चौथा एलबम रंग का दरिया आया। इसमें 6 गज़ल हैं। फिर पांचवा अलबम 'खनकते ख्याब' इसी साल फरवरी में आया।

सवाल- गजल, शायरी का क्या अब क्या भविष्य है?
उत्तर- साहित्य में सबसे अधिक लोकप्रियता हासिल गजल ने ही हासिल की है। गजल न सिर्फ मुशायरों के जरिए, बल्कि गायकी के सहारे भी खूब फली-फूली। एक जमाना था, जब फिल्मों में गजलों ने लोगों को खूब आकर्षित किया। गजल इंसानी जज्बातों के बयान का एक जरिया रही हैं और वक्त, माहौल के मुताबिक इसमें बदलाव होते रहे हैं। यह जरूर है कि इसकी शुरुआत इश्क-मुहब्बत के जज्बात से हुई थी। और आज भी यह कायम है। बस तोड़ा समय के हिसाब से उसको ढालना पड़ता है। मै तो यही कहूंगा कि गजल अभी खत्म नहीं हुई है। युवा इसमें और ज्यादा दिलचस्पी ले रहे है।

सवाल- अभी हाल ही में आपने गजल के बदशाह चंदन दास के साथ शो किया, कैसा रहा अऩुभव?

उत्तर- चंदन दास गजल गायकी के बादशाह हैं। मेरे लिए यह उनके साथ स्टेज में शो करना बहुत खुशी की बात थी।