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Christmas Day : जानिए क्या है क्रिसमस का पूरा इतिहास, 25 दिसंबर को ही क्यों मनाया जाता है

Christmas Day : क्रिसमस पर्व ईसाई धर्म में प्रभु यीशु के जन्मदिन के अवसर पर पूरे देश में हरसाल 25 दिसम्बर को बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है।

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लखनऊ

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Neeraj Patel

Dec 24, 2018

know history why and how christmas is celebrated on 25th december

Christmas Day : जानिए क्या है क्रिसमस का पूरा इतिहास, क्यों और कैसे मनाया जाता है ?

लखनऊ. क्रिसमस पर्व ईसाई धर्म में प्रभु यीशु के जन्मदिन के अवसर पर पूरे देश में हरसाल 25 दिसम्बर को बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। ईसाई धर्म में क्रिसमस पर्व सबसे बड़ा पर्व माना जाता है इसलिए ईसाई धर्म के लोगों के लिए क्रिसमस का त्यौहार सबसे लोकप्रिय त्योहार हैं।

हिन्दू धर्म में क्रिसमस पर्व को बड़े दिन के नाम से जाना जाता है। हिन्दू धर्म के लोगों का मानना है कि क्रिसमस पर्व के दिन से ही दिनों के बढ़ने की शुरूआत हो जाती है। ईसाई धर्म में क्रिसमस पर्व को मान्यता दी गई है और हिन्दू धर्म में क्रिसमस पर्व को बड़े दिन के रूप में मनाते हैं।

ऐसे फेमस हुए सांता निकोलस

सांता निकोलस को बच्चे-बच्चे जानते हैं। इस दिन खासकर बच्चों को इनका इंतजार रहता है। संत निकोलस का जन्म तीसरी सदी में जीसस की मौत के 280 साल बाद मायरा में हुआ था। बचपन में माता पिता के देहांत के बाद निकोल को सिर्फ भगवान जीसस पर यकीं था। बड़े होने के बाद निकोलस ने अपना जीवन भगवान को अर्पण कर लिया। वह एक पादरी बने फिर बिशप, उन्हें लोगों की मदद करना बेहद पसंद था। वह गरीब बच्चों और लोगों को गिफ्ट दिया करते थे। निकोलस को इसलिए संता कहा जाता है क्योंकी वह अर्धरात्री को गिफ्ट दिया करते थे कि उन्हें कोई देख न पाए। आपको बता दें कि संत निकोलस के वजह से हम आज भी इस दिन संता का इंतजार करते हैं।

बता दें कि 24 दिसम्बर की रात से ही ‘हैप्पी क्रिसमस-मेरी क्रिसमस’ से लोगों के बीच बधाइयों का सिलसिला शुरू हो जाता है। इसके साथ ही देश के सभी शहरों में लोगों के घरों में ‘क्रिसमस का पेड़’ सजाया जाता है और वहीं दूसरी ओर सांता निकोलस सभी को उपहार देकर सुख प्राप्ति का संदेश देता है।

हरसाल 25 दिसम्बर को ही क्यों मनाया जाता है क्रिसमस का पर्व

क्रिसमस का आरंभ करीबन चौथी सदी में हुआ था। इससे पहले प्रभु यीशु के अनुयायी उनके जन्म दिवस को त्योहार के रूप में नहीं मनाते थे। यीशु के पैदा होने और मरने के सैकड़ों साल बाद जाकर कहीं लोगों ने 25 दिसम्बर को उनका जन्मदिन मनाना शुरू किया। मगर इस तारीख को यीशु का जन्म नहीं हुआ था क्यूंकि सबूत दिखाते हैं कि वह अक्टूबर में पैदा हुए थे। दिसम्बर में नहीं। ईसाई होने का दावा करने वाले कुछ लोगों ने बाद में जाकर इस दिन को चुना था क्योंकि इस दिन रोम के गैर ईसाई लोग अजेय सूर्य का जन्मदिन मनाते थे और ईसाई चाहते थे की यीशु का जन्मदिन भी इसी दिन मनाया जाए।

सर्दियों के मौसम में जब सूरज की गर्मी कम हो जाती है तो गैर ईसाई इस इरादे से पूजा पाठ करते और रीति- रस्म मनाते थे कि सूरज अपनी लम्बी यात्रा से लौट आए और दोबारा उन्हें गरमी और रोशनी दे। उनका मानना था कि दिसम्बर 25 को सूरज लौटना शुरू करता है। इस त्योहार और इसकी रस्मों को ईसाई धर्म गुरुओं ने अपने धर्म से मिला लिया औऱ इसे ईसाइयों का त्योहार नाम दिया यानि (क्रिसमस-डे)। ताकि गैर ईसाईयों को अपने धर्म की तरफ खींच सके।

पूरे 13 दिनों तक मनाया जाता है क्रिसमस पर्व

क्रिसमस पर्व का सेलिब्रेशन पूरे 13 दिनों तक चलता हैं। क्रिसमस पर्व 24 दिसंबर की शाम से शुरू हो जाता है और 5 जनवरी तक चलता है। 24 दिसंबर को लोग क्रिसमस के आने, यानि ईसा मसीह के जन्म की इंतजार करते हैं।
- 24 दिसंबर से ईसा मसीह के जन्मदिन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं।
- 25 दिसंबर को ईसा मसीह का जन्म दिवस मनाया जाता है।
- 26 दिसंबर को बॉक्सिंग डे भी कहा जाता है, इसे सेंट स्टीफन्स डे के रूप में मनाया जाता है।
- 27 दिसंबर सेंट जॉन, द एपोस्टल (ईसा के शिष्य और दोस्तों में से एक) को समर्पित है।
- 28 दिसंबर को पवित्र दावतों का पर्व कहा जाता है। इस दिन तरह-तरह के व्यंजन पकते हैं।
- 29 दिसंबर सेंट थोमस बैकेट के लिए समर्पित है। सदियों पहले इसी दिन उन्होंने चर्च पर राजा के अधिकार को चुनौती देने के कारण अपनी जान गंवा दी थी।
- 30 दिसंबर का दिन वॉर्सेस्टर के सेंट एगविन के लिए।
- 31 दिसंबर। न्यू ईयर ईव के रूप में मनाया जाता है।
- 1 जनवरी। ईसा मसीह की मां मैरी को समर्पित।
- 2 जनवरी। सेंट बेसिल, द ग्रेट और सेंट ग्रेगरी नाज़ियान, चौथी शताब्दी में ईसाई धर्म के दो महत्वपूर्ण व्यक्ति।
- 3 जनवरी। ईसा मसीह के नामकरण का दिन। इस दिन ईसा को आधिकारिक रूप से यहूदी मंदिर में नाम दिया गया था।
- 4 जनवरी। सेंट एलिजाबेथ एन सेटन, पहले अमेरिकी संत, 18वीं और 19वीं शताब्दी।
- 5 जनवरी। इसे एपिफेनी ईव के नाम से भी जाना जाता है। यह दिन सेंट जॉन न्यूमैन को समर्पित है जो अमेरिकी में पहले धर्माध्यक्ष थे।

ऐसे हुई थी क्रिसमस ट्री सजाने की शुरूआत

जब भगवान ईसा का जन्म हुआ था तब सभी देवता उन्हें देखने और उनके माता पिता को बधाई देने आए थे। उस दिन से आज तक हर क्रिसमस के मौके पर सदाबहार क्रिसमस के पेड़ को अच्छे से सजाया जाता है और इसे क्रिसमस ट्री कहते है। क्रिसमस ट्री को सजाने की शुरुआत करने वाला पहला व्यक्ति बोनिफेंस टुयो नामक एक अंग्रेज धर्म प्रचारक था। यह पहली बार जर्मनी में दसवीं शताब्दी के बीच शुरू हुआ था।

कार्ड देने की परंपरा दुनिया का सबसे पहला क्रिसमस कार्ड विलियम एंगले द्वारा 1842 में भेजा गया था। अपने परिजनों को खुश करने के लिए। इस कार्ड पर किसी शाही परिवार के सदस्य की तस्वीर थी। इसके बाद जैसे की सिलसिला सा लग गया एक दूसरे को क्रिसमस के मौके पर कार्ड देने का और इस से लोगो के बीच मेलमिलाप बढ़ने लगा।

ऐसे मनाया जाता है क्रिसमस पर्व

1. सारी दुनिया के गिरजाघरों में यीशु की जन्मगाथा झांकियों के रूप में प्रदर्शित की जाती है।
2. 24-25 दिसंबर के बीच की रात को पूरे समय आराधना-पूजा की जाती है। भक्तिभावपूर्ण गीत गाए जाते हैं। दूसरे दिन सवेरे से ही जन्मदिन का समारोह होता है।
3. लोग एक-दूसरे को गले लगाते हैं, बधाइयां देते हैं तथा रोटी व पवित्र मदिरा का प्रसाद ग्रहण करते हैं।
4. गिरजाघरों में मंगल कामना का प्रतीक क्रिसमस-ट्री सजाया जाता है।
5. पूजा स्थलों के परिसरों को इस तरह सजाया जाता है मानो दिवाली मनाई जा रही है।
6. अंग्रेजी भाषी देशों में विशेष प्रकार की पुडिंग, केक इत्यादि से यह पर्व मनाया जाता है।