श्रीकृष्ण जन्म अष्टिमी पर 52 साल बाद बन रहा त्रिगुण संयोग, यह है शुभ पूजा का समय
पुराणों में बताया गया है कि जब श्री कृष्ण का स्वर्गवास हुआ तब कलयुग का आगमन हुआ। जब चारों ओर पाप हो रहे थे तब भगवान ने द्वापर में श्रीकृष्ण के रूप में देवकी के गर्भ से मथुरा के कारागर में जन्म लिया था।
लखनऊ. हिन्दू कालगणना के अनुसार कृष्ण का जन्म आज से लगभग 5,243 वर्ष पूर्व हुआ था। पुराणों में बताया गया है कि जब श्री कृष्ण का स्वर्गवास हुआ तब कलयुग का आगमन हुआ। जब चारों ओर पाप हो रहे थे तब भगवान ने द्वापर में श्रीकृष्ण के रूप में देवकी के गर्भ से मथुरा के कारागर में जन्म लिया था। ब्रह्मा तथा शिव-प्रभृत्ति देवता जिनके चरणकमलों का ध्यान करते थे, ऐसे श्रीकृष्ण का गुणानुवाद अत्यंत पवित्र है। श्रीकृष्ण से ही प्रकृति उत्पन्न हुई। श्री कृष्ण के अवतीर्ण होने का मात्र एक उद्देश्य था कि इस पृथ्वी को पापियों से मुक्त किया जाए। अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने जो भी उचित समझा वही किया। उन्होंने कर्मव्यवस्था को सर्वोपरि माना, कुरुक्षेत्र की रणभूमि में अर्जुन को कर्मज्ञान देते हुए उन्होंने गीता की रचना की जो कलिकाल में धर्म में सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। कृष्ण जन्म अष्टिमी का पर्व पूरे भारत में बहुत ही धूम-धाम से मनाया जाता है। इस बार कृष्ण जन्म अष्टिमी 25 अगस्त को मनाई जाएगी। लड्डू गोपाल का जन्मदिन मनाने के लिए राजधानी में तैयारियां शुरू हो गई हैं। अलग-अलग जगह पर इस खास दिन के लिए विशेष इंतजाम किए जा रहे हैं। डालीगंज के माधव मंदिर को जन्माष्टमी पर 1111 गुब्बारों, एलईडी लाइट्स और लेजर लाइट से सजाया जाएगा।
वहीं, भगवान कृष्ण को खूबसूरत बनारसी वस्त्र पहनाए जाएंगे। इसके अलाव दक्षिणावर्त शंख से पूजन किया जाएगा और दही हांडी का खेला भी होगा। खास बात ये है कि पहली बार कृष्ण जन्म के समय भक्त अपने घर से लाए गए मिष्ठान का भोग भी लगा सकेंगे। श्रीमाधव मन्दिर के अध्यक्ष बिहारी लाल साहू ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी की आधी रात में मनाया जाएगा। 52 साल बाद आ रहा है अनूठा संयोग इस बार श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पर्व 52 साल बाद अनूठा संयोग लेकर आ रहा है जब माह, तिथि, वार और चंद्रमा की स्थिति वैसी ही बनी है, जैसी कृष्ण जन्म के समय थी। श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, बुधवार, रोहिणी नक्षत्र और वृषभ के चंद्रमा की स्थिति में हुआ था। इससे पहले ऐसा योग 1958 में बना था। 52 साल बाद ऐसा संयोग दोबारा आया है। पंडितों के मुताबिक, कृतिका नक्षत्र का काल क्रम 9 घंटे 32 मिनट का होता है। मान्यता है कि भगवान कृष्ण का जन्म अष्टमी की रात्रि रोहिणी नक्षत्र के आरंभ काल के संयोग में हुआ। रोहिणी नक्षत्र की स्थिति में मामूली अंतर भर आया है। यह है व्रत के नियम जन्माष्टमी उपवास के दौरान एकादशी उपवास के दौरान पालन किये जाने वाले सभी नियम पालन किये जाने चाहिये। जन्माष्टमी के व्रत के दौरान किसी भी प्रकार के अन्न का ग्रहण नहीं करना चाहिये। जन्माष्टमी का व्रत अगले दिन सूर्योदय के बाद एक निश्चित समय पर तोड़ा जाता है जिसे जन्माष्टमी के पारण समय से जाना जाता है। यदि अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में से कोई भी सूर्यास्त तक समाप्त नहीं होता तब जन्माष्टमी का व्रत दिन के समय नहीं तोड़ा जा सकता। जन्माष्टमी का पारण सूर्योदय के पश्चात अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने के बाद किया जाना चाहिये। यदि अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र सूर्यास्त तक समाप्त नहीं होते तो पारण किसी एक के समाप्त होने के पश्चात किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में व्रती को किसी एक के समाप्त होने के बाद ही व्रत तोड़ना चाहिये। हिन्दु ग्रन्थ धर्मसिन्धु के अनुसार, जो श्रद्धालु-जन लगातार दो दिनों तक व्रत करने में समर्थ नहीं है, वो जन्माष्टमी के अगले दिन ही सूर्योदय के पश्चात व्रत को तोड़ सकते हैं। जन्माष्टमी के दिन, श्री कृष्ण पूजा निशीथ समय पर की जाती है। वैदिक समय गणना के अनुसार निशीथ मध्यरात्रि का समय होता है। निशीथ समय पर भक्त लोग श्री बालकृष्ण की पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। विस्तृत विधि-विधान पूजा में षोडशोपचार पूजा के सभी सोलह (16) चरण सम्मिलित होते हैं। जन्माष्टमी की विस्तृत पूजा विधि, वैदिक मन्त्रों के साथ जन्माष्टमी पूजा विधि पृष्ठ पर उपलब्ध है। यह है पूजा का समय -भगवान श्रीकृष्ण का 5243वाँ जन्मोत्सव, -अष्टमी तिथि प्रारम्भ24/अगस्त/2016 को 22:17 बजे, अष्टमी तिथि समाप्त- 25/अगस्त/2016 को 20:07 बजे -निशिता पूजा का समय 24:00+ से 24:45+ अवधि = 0घण्टे 44 मिनट्स -मध्यरात्रि का क्षण 24:23+26th को, पारण का समय-10:52 के बाद पारण के दिन अष्टमी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो -पारण के दिन रोहिणी नक्षत्र का समाप्ति समय 10:52, दही हाण्डी - 26 अगस्त