
akhilesh yadav cm yogi rahul gandhi
UP POLITICS: भारतीय राजनीति में एक कहावत है कि दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर निकलता है। देश का सबसे बड़ा राज्य देश की सियासत का विद्यालय माना जाता है। जिसने यूपी जीत लिया। तो मान लिया जाता है कि दिल्ली में भी वहीं सरकार बनाएगा। तभी तो जब 2014 में भारतीय जनता पार्टी को केंद्र में सरकार बनानी थी। तो उसने अपने सबसे बड़े चेहरे नरेंद्र मोदी को उत्तर प्रदेश के वाराणसी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ाया। अब एक बार फिर यूपी पर ही सबसे ज्यादा चर्चा है। इस बार मौका 2024 लोकसभा चुनाव का है।
उत्तर प्रदेश को फतेह करने के लिए एक बार फिर से सभी पार्टियां जीन जान लगा रही हैं। चुनावी विश्लेषण तो कई हो चुके हैं। समीकरणों की जानकारी भी दे दी गई है। लेकिन एक ही स्थान पर और सरल भाषा में यदि उत्तर प्रदेश का पूरा ज्ञान मिल जाए। तो चुनाव के सियासी गणित को समझना और आसान हो जाएगा। हर दलों की रणनीति भी पकड़ में आ पाएगी। यहां पर उसी काम को पूरा करने की कोशिश की गई है।
लोकसभा की कुल 543 सीटों में से 80 सीट उत्तर प्रदेश की हैं। यूपी की राजनीति को समझने के लिए राजनीतिक जानकार इसे चार हिस्सों में बांटकर देखते हैं। जो इस प्रकार है- पश्चिमी यूपी, पूर्वांचल, अवध और बुंदेलखंड। इन सभी क्षेत्रों के अपने-अपने मुद्दे। अपने अपने जातीय समीकरण हैं और अपनी अपनी राजनीति भी चलती रहती है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत जाट, मुस्लिम और दलित समाज के जाटव समुदाय के इर्द-गिर्द घूमती है। पश्चिमी यूपी की खास बात यह है कि यहां पर इन जातियों का बोलबाला पूरे राज्य के लिहाज से सबसे ज्यादा है। इसे आसान भाषा में ऐसे समझ सकते हैं कि पूरे यूपी में मुस्लिम मतदाता 20 फीसदी के करीब हैं। लेकिन बात जब अकेले पश्चिमी उत्तर प्रदेश की आती है तो यहां ये आंकड़ा बढ़कर 32 फीसदी पहुंच जाता है। इसी तरह पूरे यूपी में जाट समाज की संख्या 4 प्रतिशत के करीब है। लेकिन पश्चिमी यूपी में इनकी संख्या बढ़कर 17 फीसदी हो जाती है। पूरे प्रदेश में दलित वर्ग आबादी 21 फीसदी है। लेकिन अकेले पश्चिम में ये 26 प्रतिशत के करीब है। यहां भी 80 फीसदी संख्या जाटव समुदाय की हैं।
उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल इलाका की एक अलग सियासी पहचान है। पूर्वांचल से लोकसभा की कुल 26 सीटें निकलती हैं। जबकि 130 विधानसभा की सीटें होती हैं। पूरे यूपी की 32 फीसदी जनसंख्या पूर्वांचल में रहती है। इसे प्रदेश का पिछड़ा इलाका भी माना जाता है। लेकिन पिछड़े होने के बावजूद देश को पांच प्रधानमंत्री देने वाला इलाका भी ये पूर्वांचल ही है। इस इलाके में पटेल ,राजभर, निषाद और चौहान जाति का बोलबाला रहता है। पूर्वांचल में वाराणसी, जौनपुर, गोरखपुर, कुशीनगर, सोनभद्र, कुशीनगर, देवरिया, महाराजगंज, संतकबीरनगर, बस्ती, आजमगढ़, भदोही, मिर्जापुर, मऊ, गाजीपुर, बलिया, सिद्धार्थनगर, चंदौली, अयोध्या, गोंडा जैसे जिले आते हैं।
पूर्वांचल के बाद यदि यूपी में किसी इलाके को सबसे बड़ा माना जाता है तो वो अवध है। जानकार इसे मिनी यूपी भी कहते हैं। इस क्षेत्र इलाके में किसी भी पार्टी के लिए जीत का मतलब होता है कि उस पार्टी की पूर्वांचल में भी अच्छा प्रदर्शन होने वाला है। इस क्षेत्र में ब्राह्मणों की आबादी 12 फीसदी के करीब रहती है। जबकि 7 फीसदी ठाकुर और 5 फीसदी बनिया समाज भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता है। ओबीसी वर्ग का 43 फीसदी हिस्सा भी अवध क्षेत्र में रहता है। यादव समाज की आबादी यहां 7 प्रतिशत के करीब है। कुर्मी समुदाय भी 7 फीसदी है। अवध से लोकसभा की कुल 18 सीटें निकलती हैं।
बुंदेलखंड प्रदेश का वो इलाका है जो कई बार जल संकट की वजह से सुर्खियों में बना रहता है। बुंदेलखंड से लोकसभा की 5 सीटें निकलती हैं। ये क्षेत्र ओबीसी और दलित वोटरों की वजह से निर्णायक माना जाता है। इस क्षेत्र में सामान्य वर्ग के कुल 22 फीसदी मतदाता हैं। जनरल वर्ग में ब्राह्मण, ठाकुर को शामिल किया जाता है। वैश्य समाज के लोग भी यहां अच्छी तादाद में रहते हैं। इस इलाके में ओबीसी की अहम जातियां जैसे कि कुर्मी, निषाद, और कुशवाहा की भी अच्छी खासी संख्या हैं। यहां ओबीसी की आबादी 43 प्रतिशत के करीब है। बुंदेलखंड में दलित वोटर की बात करें तो वो उनकी आबादी भी 26 फीसदी के आसपास है।
Published on:
20 Feb 2024 04:15 pm
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