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एक पैर से दुनिया भर में कमाल दिखा रहा होनहार, बचाई थी लड़की की जान

राजधानी लखनऊ के रहने वाले रियाज अपने साहस से दुनिया भर में नाम रोशन किया है।

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लखनऊ. कहते हैं नामुमकिन कुछ भी नहीं बस कुछ कर दिखाने का हौसला होना चाहिए। राजधानी लखनऊ के रहने वाले रियाज अपने साहस से दुनिया भर में नाम रोशन किया है। उन्हें 2003 में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। आपको बता रहे हैं लखनऊ के रियाज अहमद के बारे में, जिन्होंने 8 साल की उम्र में अपनी जान की बाजी लगाकर दूसरों की जान बचाई थी। इस दौरान उन्होंने अपने दोनों हाथ और एक पैर गंवा दिए थे। इसके बाद उन्हें 2003 में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

लड़की की बचाई थी जान

रियाज अहमद बताते हैं, "2003 में मैंने डालीगंज क्रॉसिंग पर एक लड़की को रेलवे ट्रैक क्रास करते देखा।" मैंने लड़की को गोद में उठाया और उसे ट्रैक से दूर फेंक दिया। साथ ही बाकी के दोनों लोगों को धक्का देकर ट्रैक से बाहर ढकेल दिया। लेकिन, मेरा पैर ट्रैक में फंस गया।"मैं जब तक कुछ सोच पाता तब तक ट्रेन मेरे उपर से गुजर चुकी थी। मेरे दोनों हाथ और एक पैर कटकर अलग हो चुके थे। इस तरह मैंने एक साथ तीन जिंदगियां बचा ली थी।"

इन अवॉर्ड्स से हुए सम्मानित

-रियाज को 26 जनवरी 2003 को मुझे तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम के हाथो संजय चोपड़ा राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार मिला था।24 जनवरी 2003 को तत्कालीन पीएम अटल बिहारी बाजपेयी ने मुझें दिल्ली में रास्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया।"रियाज बताते है, "2010 में उन्हें मॉरीशस के राष्ट्रपति ने ग्रेट हीरोज ग्लोबल ब्रेवरी अवार्ड से सम्मानित किया था।"

पिता लगाते हैं ठेला

रियाज ने बताया कि "मेरा जन्म 10 अक्टूबर 1996 को लखनऊ के तेलीबाग में हुआ था।" "पिता मोहम्मद अहमद अंडे का ठेला लगाते हैं और मां हाउस वाइफ हैं।" "घर में हम 6 भाई और बहन है। मैं उनमें सेकेण्ड नम्बर का हूं।"रियाज बताते हैं कि पिता की कोई फिक्स जॉब नहीं है इसलिए बचपन में पढ़ाई के दौरान काफी मुश्किलें आई थी।इंटर का एग्जाम मैंने पैर से लिखकर फर्स्ट डीविजन से पास किया था। अभी केकेसी से ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहा हूं।

केकेसी में कर रहे पढ़ाई

रियाज बताते है, "मैं अभी केकेसी से ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहा हूं। पिता अंडे का ठेला लगाते हैं। इससे बड़ी मुश्किल से घर का गुजारा चल पाता है।2014 में मैं लखनऊ के प्राइवेट स्कूल से ग्रेजुएशन की पढ़ाई करना चाहता था, लेकिन वहां तीन साल की बीए की फीस 1 लाख रुपये से ज्यादा थी। मेरे घर वालों के पास इतने अधिक पैसे नहीं थे। इस वजह से मेरा एडमिशन उस कॉलेज में नहीं हो पाया। मैंने किसी तरह पैसों का अरेंजमेंट करके केकेसी में एडमिशन लिया। मेरे घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। मुझे कहीं भी आने-जाने में काफी प्रॉबलम फेस करनी पड़ती है। मैंने एक पैर से लिखकर हाईस्कूल और इंटर का एग्जाम फर्स्ट डिविजन से पास किया था। मेरे दोनों हाथ और एक दाहिना पैर आर्टिफिसियल हैं। मैं अभी एक पैर से लिखकर पढ़ाई कर रहा हूं।"